मराठी साहित्य, संस्कृती आणि लेखनाचे व्यासपीठ

आदाब अर्ज है !( २६-०७-११) हार जाने का हौसला है मुझे.........

अश्फाक ·

II विकास II 28/03/2010 - 12:18
आवडले, तुम्ही सगळे वेगवेगळे भाषांतर धागे टाकण्यापेक्षा एकच धागा टाकाल काय? मला वाटते, वाचायला सोपे पडेल. असो ही विनंती आहे. -- प्रतिसादात आणि स्वाक्षरीत मराठी संकेतस्थळांची जाहीरात करुन मिळेल. विद्रोही संकेतस्थळांना खास सुट. योग्य बोली सह संपर्क करावा.

मुखालिफत से संवरती है शख्सियत मेरी ! मै दुश्मनो का बडा एहतेराम करता हु !! ( विरोधाने माझ्या व्यक्तिमत्वाला निखार येतो , मी माझ्या शत्रुंचा फारच आदर करतो ) क्या बात है ! अजून येऊ द्या. -दिलीप बिरुटे

शुचि 28/03/2010 - 21:07
मस्त ||विकास|| & बिरुटे यांच्या दोघांच्या वक्तव्याला +१ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ हम नहीं वह जो करें ख़ून का दावा तुझपर बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जायेंगे

अश्फाक 29/03/2010 - 20:05
विनंती - क्रुपया मला साहेब म्हणु नका , विशम( odd ) वाटते , अश्फाक भाउ/ भाइ म्हणु शकता.

अश्फाक 30/03/2010 - 19:48
३०-३-१० लोग टुट जाते है एक घर बनाने मे! तुम रहम नही खाते बस्तिया जलाने मे!! ( लोग उन्मळुन पडतात एक घर बनवन्यातच , तुम्हाला मुळीच करुणा येत नाही संपुर्ण वस्ती जाळतांना ) हर धडकते पथ्थर को लोग दिल समझते है ! उमरे बीत जाती है दिल को दिल बनाने मे !! ( प्रत्येक धड्धड्नार्‍या दगडाला लोक ह्रुद्य समझून घेतात , किती तरी हयाती सरतात ह्रुद्याला ह्रुद्य बनवन्यासठी ) dr.Bashir badar

नेत्रेश 31/03/2010 - 06:19
छान शायरी आहे पण.. (कठीण शब्दांचे अर्थ दीले तरी चालतील पण मराठी भाशांतर नको ... सगळी मजा त्या भयंकर भाशांतराने घालऊन टाकली आहे)

अश्फाक 31/03/2010 - 10:37
३१-३-१० सब ने मिलाये हाथ यहा तिरगी के साथ! ( तिरगी = काळोख ) कितना बडा मजाक हुवा रोशनी के साथ!! शर्ते लगायी जाती नही दोस्ति के साथ ! किजीये मुझे कबुल मेरी हर कमी के साथ!! dr.wasim barelawi

सुधीर काळे 31/03/2010 - 12:59
अश्फाकभाई, हे सर्व शेर आपण लिहिलेले आहेत कां? तसं असेल तर फारच छान आहेत. जे शेर मी स्वतः सुरू केलेल्या धाग्यावर चढवतो ते दुसर्‍यांचेच असतात. (आपुनको कविता-बिविता जमती नहीं!) पण चांगल्या कविता, शेरोशायरी वाचायला आवडते. सुधीर काळे, जकार्ता ------------------------ हा दुवा उघडा: http://72.78.249.107/esakal/20100309/5306183452989196847.htm

शुचि 31/03/2010 - 18:29
३१ मार्च चे शेर काही खासच!!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ हम नहीं वह जो करें ख़ून का दावा तुझपर बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जायेंगे

अश्फाक 01/04/2010 - 10:48
१-४-१० अब के हम बिछडे तो शायद कभी ख्वाबो मे मिले! जिस तरह सुखे हुवे फूल किताबो मे मिले !! न तु खुदा है ना मेरा इश्क फरिश्तो जैसा ! दोनो इन्सान है तो क्यु इतने हिजाबो मे मिले!! ( हिजाब = परदा ) ::अहमद फराज

अश्फाक 02/04/2010 - 10:25
२-४-१० हमारी दोस्ती से दुश्म नी शर्माइ रहती है! हम अकबर है हमारे दिल मे जोधाबाइ रहती है!! किसी का पुछना कब तलक राह देखोगे ? हमारा फैसला जब तलक बीनाइ रहती है ! ( बीनाइ= द्रुश्टी , power of eyes) munawwar rana.

अश्फाक 03/04/2010 - 07:07
३-४-१० जहालतो के सारे अन्धेरे मिटा के लौट आया ! (जहालत्= अद्यान ) मै आज सारी किताबे जला के लौट आया !! सुना है सोना निकल रहा है वहा ! मै जिस जमिन पर ठोकर लगा के लौट आया! राहत ईन्दोरी.

अश्फाक 04/04/2010 - 20:14
४-४-१० अना[1]की मोहनी[2]सूरत बिगाड़ देती है बड़े-बड़ों को ज़रूरत बिगाड़ देती है किसी भी शहर के क़ातिल बुरे नहीं होते दुलार कर के हुक़ूमत[3]बिगाड़ देती है इसीलिए तो मैं शोहरत[4]से बच के चलता हूँ शरीफ़ लोगों को औरत बिगाड़ देती है शब्दार्थ: 1. ↑ आत्म-सम्मान 2. ↑ मोहक, मोहिनी 3. ↑ शासन 4. ↑ प्रसिद्धि

अश्फाक 05/04/2010 - 21:15
५-४-१० गुलाब ख्वाब दवा जहर जाम क्या क्या है ? मै आ गया हु बता इन्तेजाम क्या क्या है ! ( इन्तेजाम=प्रबंध ) फकिर शाह कलंदर इमाम क्या क्या है ! ( फकिर=भिक्षुक, शाह=राजा, कलंदर=भट्के सुफी, इमाम=धर्मगुरु ) तुझे पता नही तेरा गुलाम क्या क्या है !! राहत ईन्दोरी.

अश्फाक 06/04/2010 - 11:17
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... ६-४-१० हर हाल मे बख्शेगा उजाला अपना ! ( बख्शेगा = देनार ) ( हर हाल मे =काही ही करुन ) चांद रिश्ते मे नही लगता है मामा अपना!! मैने रोते हुवे पोछे थे किसि दिन आंसु! मुद्दतो मा ने नही धोया दुपट्टा अपना !! ( मुद्दतो= लांब मुदती पर्यंत ) munawwar rana.

शुचि 06/04/2010 - 21:17
अश्फाक भाऊ, दर वेळेला प्रतिक्रिया देताच येत नाही मला तरी पण तुमचे हे शेर रोज मी वाट बघते वाचण्यासाठी. मिपावरचा प्रत्येक लेख मला समृद्ध करतो कणाकणानी. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ सजनि कौन तम में परिचित सा, सुधि सा, छाया सा, आता? सूने में सस्मित चितवन से जीवन-दीप जला जाता!

अश्फाक 07/04/2010 - 20:34
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... ७-४-१० हम अब मकान मे ताला लगाने वाले है! सुना है आज घर मेहमान आने वाले है!! हमे हकीर ना जानो हम अपने नेजे से ! गजल की आंख मे काजल लगाने वाले है!! राहत ईन्दोरी.

शुचि 07/04/2010 - 21:16
छान आहेत शेर ७ एप्रिल चे. मला २रा आवडला विशेषकरून. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ I have always known that at last I would take this road, but yesterday I did not know that it would be today. - Narihara

अश्फाक 08/04/2010 - 10:58
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... ८-४-१० सेहरा मे रह के कैस ज्यादा मजे मे है! (सेहरा=वाळवंट, कैस = मजनु चे खरे नाव ) दुनिया समझ रहीहै के लैला मजे मे है !! परदेस ने हमे बरबाद कर दिया मगर! मा सब से केह रहीहै के बेटा मजे मे है!! munawwar rana.

मदनबाण 09/04/2010 - 09:50
अश्फाक भाउ हा धागा लयं आवडला...और भी आने दो. मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 09/04/2010 - 11:11
९-४-१० इतना टुटा हु के छुने से बिखर जाउगा ! अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाउगा!! ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ तेरी कश्ती का ! तू जहाँ मुझसे कहेगी, मैं उतर जाऊँगा !! - मुईन नज़र

अश्फाक 10/04/2010 - 12:01
१०-४-१० लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सम्भलते क्यूँ हैं ! इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं !! मैं न जुगनू हूँ दिया हूँ न कोई तारा हूँ ! रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं !! नीन्द से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से ! ( त'अल्लुक़ = संबंध ) ख़्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यूँ हैं !! मोड़ होता है जवानी का सम्भलने के लिये ! और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यूँ हैं !! राहत ईन्दोरी.

अश्फाक 11/04/2010 - 11:58
११-४-१० रविवार पेशानियों पे लिखे मुक़द्दर नहीं मिले! ( पेशानियों = कपाळांवर , मुक़द्दर = नशिब ) दस्तार कहाँ मिलेंगे जहाँ सर नहीं मिले!! ( दस्तार = फेटा ) आवारगी को डूबते सूरज से रब्त है! ( रब्त= लगाव्/जवळीक ) मग़्रिब के बाद हम भी तो घर पर नहीं मिले!! ( मग्रिब = सुर्यास्ताची वेळ ) कल आईनों का जश्न हुआ था तमाम रात! अन्धे तमाशबीनों को पत्थर नहीं मिले!! ( तमाशबीनों = प्रेक्षक ) मैं चाहता था ख़ुद से मुलाक़ात हो मगर! आईने मेरे क़द के बराबर नहीं मिले!! ( कद्=उंची ) पर्देस जा रहे हो तो सब देखते चलो! मुम्किन है वापस आओ तो ये घर नहीं मिले!! राहत ईन्दोरी.

In reply to by अश्फाक

शुचि 12/04/2010 - 05:11
कल आईनों का जश्न हुआ था तमाम रात! अन्धे तमाशबीनों को पत्थर नहीं मिले!! ( तमाशबीनों = प्रेक्षक ) मैं चाहता था ख़ुद से मुलाक़ात हो मगर! आईने मेरे क़द के बराबर नहीं मिले!! ( कद्=उंची ) मार डाला!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ I have always known that at last I would take this road, but yesterday I did not know that it would be today. - Narihara

In reply to by अश्फाक

मनिष 13/04/2010 - 11:12
पर्देस जा रहे हो तो सब देखते चलो! मुम्किन है वापस आओ तो ये घर नहीं मिले!! राहत ईन्दोरी.
अशक्य आहे हा... You can't go home again शी जवळीक दाखवणारा!

मदनबाण 11/04/2010 - 19:34
अश्फाक भाउ...वाचतोय्. बहोत बढीया. :) मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 12/04/2010 - 10:45
१२-४-१० जब कभि बोलना वक्त पर बोलना ! मुद्दतो सोचना , मुख्तसर बोलना !! ( मुद्दतो= लांब मुदती पर्यंत ,मुख्तसर =थोडे से) मेरि खानाबदोशी से पुछे कोइ ! ( खानाबदोशी = अस्थायी , भटके जीवन बंजारो की तरह ) कितना मुश्किल है रस्ते को घर बोलना!! तहीर फराझ

आवडाबाई 13/04/2010 - 10:52
मजा आ रहा है !! लगे रहो प्रत्येक वेळी प्रतिक्रिया नाही दिली तरी वाचत आहे बरेचसे शेर प्रथमच वाचल्यामुळे जास्तच मजा येतेय

अश्फाक 13/04/2010 - 20:09
१३-४-१० ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे! ( गिला = तक्रार , शिकायत ) तू बहुत देर से मिला है मुझे!! तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल! ( तु प्रेमाने मला धोका तर दे , हार जाने का हौसला है मुझे!! ( माझ्यात पराभव पत्करन्याची हिम्मत आहे ) ::अहमद फराज

In reply to by अश्फाक

शुचि 13/04/2010 - 21:14
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल! ( तु प्रेमाने मला धोका तर दे , हार जाने का हौसला है मुझे!! ( माझ्यात पराभव पत्करन्याची हिम्मत आहे ) मस्त!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ I have always known that at last I would take this road, but yesterday I did not know that it would be today. - Narihara

मदनबाण 13/04/2010 - 20:37
अश्फ़ाक भाउ...मस्त एकसे एक शेर देत आहेस...सुभानल्ला !!! :) पण आज हा वर टाकलेला शेर तुम्ही आधीच दिला आहेत...तूमचा या धाग्याचा पहिलाच शेर पहा. मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 13/04/2010 - 21:15
मदनबाण..., काही तरी गैर समज झाला आहे आपला मी रोज शेर वरुन खाली असे तारर्खेसह संपादीत करतो . अजुन तरी कोनताही शेर रिपिट झाला नाही

In reply to by अश्फाक

मदनबाण 14/04/2010 - 20:17
माझी चूक झाली. मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 14/04/2010 - 12:18
१४-४-१० मेरे खुलुस की गेहराई से नही मिलते ! ( खुलुस = सह्र्युदता ) ये झुटे लोग है सच्चाइ से नही मिलते !! मुझे सबक दे रहे है वो मोहब्बत का ! जो ईद अप्ने सगे भाई से नही मिलते !! राहत ईन्दोरी.

In reply to by अश्फाक

वाहीदा 14/04/2010 - 12:53
अश्फाक भाईजान, तसलीम ! अगर आपको हमारी दखलअंदाजी बेअदबी नही लगती है तो अच्छी बात है, वरना माफी चाहते हुवे, हम आपको correct करना चाहेंगें.. खुलुस के माईने मराठी में सह्र्युदता नहीं होता खुलुस माने अंग्रेजी में Clearness, purity होती है, जिसके मराठी में मायने (meaning) निर्मळता जो दिलकी भी हो सकती है मेरे खुलुस की गहराई से नहीं मिलते मायने, मेरी दिल की साफ सुथरी सच्चाई के गहराई से नहीं मिलते खुलुस - निर्मल - साफ सुथरा Clear , purity बेशक , आपके सभी शेर लाजवाब है! :-) ~ वाहीदा

अश्फाक 14/04/2010 - 19:49
जझाक-अल्लाह , आपन दिलेले अर्थ अगदी बरोबर आहे जर , आपण खुलुस ला नाम ( noun ) म्हणुन वापरले तर , पन येथे विशेशन(adjective) म्हणुन वापरले आहे. ज्याचा अर्थ Sincerity,frankness असा ही होतो . असो प्रतिक्रीये बद्दल धन्यवाद. Sincerity is the virtue of one who speaks truly about his or her own feelings, thoughts, desires.

In reply to by अश्फाक

वाहीदा 15/04/2010 - 14:12
जझाक-अल्लाह इतनी बडीं दुवा दे दी और क्या चाहीये ... तहे दिलसे शुक्रिया !! अवांतर : मी तुम्हाला खुलुस या शब्दा बध्द्ल व्यनी तून बोलेन (सद्या कामाची गडबड अन ओन्साईट टेकनिक्ल डायरेक्ट ची लुड-बुड मागे लागली आहे :-( ) ~ वाहीदा

अश्फाक 15/04/2010 - 12:39
१५-४-१० खुद को कितना छोटा करना पड्ता है! बेटे से समझौता करना पडता है!! जब सारे के सारे ही बेपर्दा हो! ऐसे मे खुद परदा करना पडता है!! नवाज देवबंदी.

वात्रट 15/04/2010 - 20:35
लै भारी.... अश्फाक भाऊ, दर वेळेला प्रतिक्रिया देताच येत नाही मला तरी पण तुमचे हे शेर रोज मी वाट बघतो वाचण्यासाठी.>> असेच म्हणतो...

अश्फाक 16/04/2010 - 11:57
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... १६-४-१० NRI special मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं ! ( मुहाजिर = निर्वासीत ) तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं !! कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है ! कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं!! नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में ! पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं !! अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी ! ( अक़ीदत = विश्वास ) वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !! किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी ! ( आरज़ू = इच्छा ) किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!! ( ऊन की तीली = लोकर विनायची काडी / फंदा= टोक, छेडा ) पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से! ( सलीक़े से= पद्ध्तशीर ) निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं!! (डलिया = टोपली ) जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है! ( उन्नाव, मोहान = यु.पी. मधील गाव ) वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं!! ( हसरत = इच्छा ) यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद! हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!! हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है ! हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!! हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है! (हिजरत= स्थलांतर ) अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!! सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे! दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!! हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं! अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!! गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब! (मज़हब = धर्म) इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!! हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की ! किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं!! (सेहरा = लग्नात गायचे स्तुतीपर गीत) मुनव्वर राणा .

In reply to by अश्फाक

वाहीदा 16/04/2010 - 17:36
मुगल सलतनत के आखरी शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र के लिखे हुए कुछ आखरी कलाम (जब उन्हे अंग्रेजी पुलीस पकडकर ले गयी ..) लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में किसकी बनी है आलमे-ना-पायदार में बुलबुल को बाग़बां से न सय्याद से गिला क़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले-बहार में कहदो इन हसरतों से कहीं और जा बसें इतनी जगह कहां है दिले दाग़दार में एक शाख़े-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां कांटे बिछा दिए हैं दिले-लालज़ार में उम्रे-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई फैला के पांव सोएंगे कुंजे मज़ार में कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीं भी मिल न सकी कूए-यार में --बहादुर शाह ज़फ़र बतौर शमा के रोते इस अंजुमन से चले न बाग़बां ने इजाज़त दी सैर करने की खुशी से आए थे रोते हुए चमन से चले न मालो हकुमत न धन जायेगा. तेरे साथ बस एक कफन जायेगा. बचा भी न कोइ कि नोहा करे पारायों के कांधे बदन जायेगा. जिलावतनी ओढे तु सोता रहा, यादों में लिपटा गगन जायेगा मुल्क कि मिट्टी की चादर कहां,? जफर तु तो अब बे वतन जायेगा --बहादुर शाह ज़फ़र ~ वाहीदा

मनिष 16/04/2010 - 12:41
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं ! ( मुहाजिर = निर्वासीत ) तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं !! कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है ! कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं!! नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में ! पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं !! अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी ! ( अक़ीदत = विश्वास ) वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !! किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी ! ( आरज़ू = इच्छा ) किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!! ( ऊन की तीली = लोकर विनायची काडी / फंदा= टोक, छेडा ) पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से! ( सलीक़े से= पद्ध्तशीर ) निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं!! (डलिया = टोपली ) जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है! ( उन्नाव, मोहान = यु.पी. मधील गाव ) वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं!! ( हसरत = इच्छा ) यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद! हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!! हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है ! हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!! हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है! (हिजरत= स्थलांतर ) अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!! सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे! दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!! हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं! अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!! गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब! (मज़हब = धर्म) इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!! हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की ! किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं!! (सेहरा = लग्नात गायचे स्तुतीपर गीत) मुनव्वर राणा .
अंगावर काटा आहे आणि डोळे पाणावलेत. गुलजारच्या फाळणीच्या गोष्टी आठवल्या...सध्या तरी निशब्द! ही कविता/नज्म वापरेन मी कुठेतरी..जमेल तेव्हा! अतिशय संवेदनशील कविता. मला "ओ देस से आने वाले बता" आठवले...मी माझ्या ब्लॉगवर लिहीले होते त्याबद्द्ल - http://ramblings2reflections.wordpress.com/2007/09/07/o-des-se-aane-wale-bata/#comment-1355

अश्फाक 17/04/2010 - 19:32
१७-४-१० आते-आते मेरा नाम सा रह गया ! उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया!! वो मेरे सामने ही गया और मैं ! रास्ते की तरफ देखता रह गया !! झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये ! और मैं था कि सच बोलता रह गया!! आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे! ये दिया कैसे जलता रह गया !! वसीम बरेलवी

मदनबाण 17/04/2010 - 19:38
वाचनखुण म्हणुन हा धागा साठवला आहे... :) मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 18/04/2010 - 19:42
१८-४-१० अब मै समझा तेरे रुखसार पे तिल का मतलब ! ( रुखसार = गाल ) दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रखा है!! ( दरबान= पहारेकरी ) गर सियाह बख्त ही होना था नसीबो मे मेरे ! (गर = अगर्/जर , सियाह =काळा, बख्त= नशीब) जुल्फ होता तेरे रुखसार पे या तिल होता !! ( जुल्फ= केसांची बट , रुखसार = गाल ) गुमनाम.

अश्फाक 19/04/2010 - 10:46
१९-४-१० कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके ! ( अल्फ़ाज़= शब्द ) वो ख़त भी मगर मैंने जला कर नहीं फेंके !! ठहरे हुए पानी ने इशारा तो किया था ! कुछ सोच के खुद मैंने ही पत्थर नहीं फेंके!! क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े ! घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके !! दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी ! लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके !! अख़्तर नज़मी .

अश्फाक 20/04/2010 - 19:58
२०-४-१० ना सुपारी नजर आयी ना सरोता निकला ! ( सरोता = सुपारी कापायचे यंत्र ) मा के बटवे से दुवा निकली वजीफा निकला!! ( बटवा = खिसा,पाकिट / वजीफा = जप ) एक निवाले के लिये मैने जिसे मार दिया ! ( निवाला = घास ) वो परिन्दा भि कई रोज का भुका निकला !! मुनव्वर राणा .

अश्फाक 21/04/2010 - 10:33
२१-४-१० तिफली मे सुना करते थे नानी से कहानी ! ( तिफली =बचपन ) बचपन है अगर शोख तो शोला है जवानी!! ( शोख = अवखळ ) जुडे मे सिमट आती है सावन की घटाये ! ( जुडा = केसांचा अंबाडा , सिमटना= एकत्र येणे ) खुल जाये अचानक तो बरस जाता है पानी!! सागर खय्यामी .

मनिष 21/04/2010 - 11:29
एक निवाले के लिये मैने जिसे मार दिया ! ( निवाला = घास ) वो परिन्दा भि कई रोज का भुका निकला !! मुनव्वर राणा
अश्फाक भाई, तुमच्या ह्या लिखाणाने मी मुनव्वर राणांचा फॅन झालोय...त्यांच्याबद्दल अजून लिहाल का?

अश्फाक 22/04/2010 - 19:02
२२-४-१० इसी गली में वो भूखा किसान रहता है! ये वो ज़मीन है जहाँ आसमान रहता है!! मैं डर रहा हूँ हवा से ये पेड़ गिर न पड़े! कि इस पे चिडियों का इक ख़ानदान रहता है!! सड़क पे घूमते पागल की तरह दिल है मेरा! हमेशा चोट का ताज़ा निशान रहता है !! तुम्हारे ख़्वाबों से आँखें महकती रहती हैं! तुम्हारी याद से दिल जाफ़रान रहता है !! (जाफ़रान = केसर ) हमें हरीफ़ों की तादाद क्यों बताते हो! ( हरीफ़ों की तादाद = साथीदारांची संख्या ) हमारे साथ भी बेटा जवान रहता है!! सजाये जाते हैं मक़तल मेरे लिये ‘राना’! ( मक़तल = कत्तलखाने ) वतन में रोज़ मेरा इम्तहान रहता है!! मुनव्वर राणा .

शुचि 22/04/2010 - 19:14
तुम्हारे ख़्वाबों से आँखें महकती रहती हैं! तुम्हारी याद से दिल जाफ़रान रहता है !! (जाफ़रान = केसर ) सुभानल्ला!!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ Music and poetry only reach the ears of those in anguish.

अश्फाक 23/04/2010 - 21:13
२३-४-१० अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे! चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे!! सलिका जिन को सिखाया था हम ने चलने का! ( सलिका = पध्दत ) वो लोग आज हमे दाये बाये करने लगे !! ( दाये बाये = उजवा डावा दुर्लक्षित करने > ) तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर! ( बीमारियों के सौदागर = डोक्ट्र्र , दवाखाने ई. ) ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे!! लहूलुहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज! परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे!! ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू! बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे!! झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले! ( झुलस = झळ लागने ) वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे!! ( शजर= व्रुक्ष इलतिजाएँ = विनंती ) अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी ! ( मजलिस = सम्मेलन ) सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे!! ( सफ़ेद पोश = पांढरपेशे ) राहत इन्दौरी

अश्फाक 24/04/2010 - 11:15
२४-४-१० सियासत किस हुनरमंदी से सच्चाई छुपाती है ! ( सियासत = राजकारण , हुनरमंदी = खुबीने ) जैसे सिसकियो का जख्म शहनाइ छुपाती है !! जो ईस की तह मे जाता है वापस नही आता! ( तह = तळ ) नदी हर तैरने वाले से गहराइ छुपाती है !! ये बच्ची चाहती है और कुछ दिन मा को खुश रखना! ये कपडो की मदद से अपनी लम्बाई छुपाती है !! मुनव्वर राणा .

आवडाबाई 24/04/2010 - 18:48
क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े ! घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके !! दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी ! लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके !! खूपच सह्ही

अश्फाक 25/04/2010 - 18:01
२५-४-१० आँख से अश्क़ भले ही न गिराया जाये ! ( अश्क़ = आसु ) पर मेरे गम को हँसी में न उड़ाया जाये !! तू समंदर है मगर मैं तो नहीं हूँ दरिया ! ( दरिया = नदी ) किस तरह फ़िर तेरी दहलीज़ पे आया जाये !! दो कदम आप चलें तो मैं चलूँ चार कदम ! मिल तो सकते हैं अगर ऐसे निभाया जाये !! मुझे पसंद है खिलता हुआ, टहनी पे गुलाब ! उसकी जिद है कि वो, जुड़े में सजाया जाये !! मेरे जज़्बात ग़लत, मेरी हर इक बात ग़लत ! ( जज़्बात = भावना ) ये सही तो है मगर कितना जताया जाये !! लाख अच्छा सही वो फूल मगर मुरदा है ! कब तलक उसको किताबों में दबाया जाये !! रोशनी तुमको उधारी में भी मिल जायेगी ! पर मज़ा तब है कि, जब घर को जलाया जाये ! ललित मोहन त्रिवेदी

अश्फाक 26/04/2010 - 11:14
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... २६-४-१० सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं! मांगा ख़ुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं!! सोचा तुझे, देखा तुझे चाहा तुझे मांगा तुझे ! मेरी वफ़ा मेरी ख़ता, तेरी ख़ता कुछ भी नहीं!! जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर! भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं!! इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक! आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं!! दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा! जब आग पर काग़ज़ रखा बाकी बचा कुछ भी नहीं!! अहसास की ख़ुश्बू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ! ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं!!

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शुचि 26/04/2010 - 20:50
अहसास की ख़ुश्बू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ! ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं!! फारच गोड!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव

अश्फाक 27/04/2010 - 10:43
२७-४-१० न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये ..... कभी तो आसमाँ से चांद उतरे जाम हो जाये! (जाम = प्याला) तुम्हारे नाम की इक ख़ूबसूरत शाम हो जाये!! हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाये ! चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाये!! अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आखिर! (अजब = विचित्र ) मोहबात की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाये !! समंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको! हवायेँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाये!! मैं एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ! ( एहतियातन = काळ्जीपुर्वक ) कोई मासूम क्यों मेरे लिये बदनाम हो जाये !! मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा! परिंदा आसमाँ छूने में जब नाक़ाम हो जाये !! उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ! न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये!! --बशीर बद्र

अश्फाक 28/04/2010 - 19:44
साहिल पे समन्दर के खजाने नहि आते! होटो पे मोहोब्बत के फसाने नहि आते!! सोते मे चमक उठति है पलके हमारी! आन्खो को अब ख्वाब छुपाने नही आते.!! ` ( पुर्वप्रकाशीत २७-३-१० ला ) पुढे ........ दिल उजड़ी हुई इक सराये की तरह है! ( सराये = धर्मशाला ) अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते!! उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में! ( शोख़ = अवखळ ) फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते!! इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं! ( ज़ुल्फ़ों = केस ) ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते!! अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं! ( अहबाब = दोस्त ) आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते...!!

अश्फाक 29/04/2010 - 19:38
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... २९-४-१० इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा ............ सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा! इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा !! हम भी दरिया हैं अपना हुनर मालूम है ! जिस तरफ भी चले जायेंगे रास्ता हो जायेगा !! इतनी सचाई से मुझसे जिंदगी ने कह दिया ! तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जायेगा !! मै खुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तों ! जहर भी अगर इसमें होगा दवा हो जायेगा !! सब उसी के हैं हवा खुशबू ज़मीनों आसमान ! मै जहाँ भी जाऊंगा उसे पता हो जायेगा !! dr.bashir badar

In reply to by अश्फाक

शुचि 29/04/2010 - 20:00
वा! काय तडफ काय आत्मविश्वास आहे या शेरांमधे. मस्त!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव

अश्फाक 30/04/2010 - 11:55
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं........... ३०-४-१० उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं! क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं!! जो भी दौलत थी वो बच्चों के हवाले कर दी! जब तलक मैं नहीं बैठूँ ये खड़े रहते हैं !! मैंने फल देख के इन्सानों को पहचाना है! जो बहुत मीठे हों अंदर से सड़े रहते हैं!! मुनव्वर राणा .

अश्फाक 01/05/2010 - 21:26
१-५-१० आज फिर कोई भूल की जाए......... दोस्ती जब किसी से की जाए ! दुश्मनों की भी राए ली जाए !! मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में ! (फ़िज़ाओं = हवाये ) अब कहां जा के सांस ली जाए !! मेरे माज़ी के ज़ख्म भरने लगे ! आज फिर कोई भूल की जाए !! बोतलें खोल के तो पी बरसों ! आज दिल खोल के भी पी जाए !! राहत इन्दौरी

अश्फाक 02/05/2010 - 21:48
२-५-१० हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है ! हम अब तन्हा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है!! ( तन्हा=एकटे ) अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ हो नही सकता ! मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है!! मुनव्वर राणा .

अश्फाक 03/05/2010 - 20:08
३-५-१० राना कभी शाहों की ग़ुलामी नहीं करता......... हम दोनों में आँखें कोई गीली नहीं करता! ग़म वो नहीं करता है तो मैं भी नहीं करता!! मौक़ा तो कई बार मिला है मुझे लेकिन! मैं उससे मुलाक़ात में जल्दी नहीं करता!! वो मुझसे बिछड़ते हुए रोया नहीं वरना! दो चार बरस और मैं शादी नहीं करता!! वो मुझसे बिछड़ने को भी तैयार नहीं है! लेकिन वो बुज़ुर्गों को ख़फ़ा भी नहीं करता!! ( बुज़ुर्गों = वडिलधारे, ख़फ़ा = नाराज ) ख़ुश रहता है वो अपनी ग़रीबी में हमेशा! ‘राना’ कभी शाहों की ग़ुलामी नहीं करता!! ( शाह = बादशाह ) मुनव्वर राना .

In reply to by अश्फाक

शुचि 03/05/2010 - 20:45
हम दोनों में आँखें कोई गीली नहीं करता! ग़म वो नहीं करता है तो मैं भी नहीं करता!! मौक़ा तो कई बार मिला है मुझे लेकिन! मैं उससे मुलाक़ात में जल्दी नहीं करता!! किती हा निग्रह! प्रेमात "शरणभाव" महत्त्वाचा हे दोघंही जाणत नाहीत जणू. दोघंही तोडीसतोड मानी आहेत. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव

अश्फाक 05/05/2010 - 22:02
५-५-१० अंजाम उसके हाथ है आगाज कर के देख ! ( शेवट परमेश्वराच्या हातात आहे , सुरवात करुन तर बघ ) भिगे हुए परो से ही परवाज कर के देख !! ( चिंब भिजलेल्या पंखांनी उडुन तर बघ ) नवाज देवबंदी .

अश्फाक 07/05/2010 - 21:48
७-५-१० जहा तक हो सके हमने तुम्हे परदा कराया है ! मगर ऐ आसुओ तुम ने बडा रुसवा कराया है !! ( रुसवा = बदनाम ) चमक ऐसे नही आती है, खुद्दारी कि, चेहरे पर ! ( खुद्दारी = आत्मनिर्भरता ) अना को हम ने दो दो वक्त का फाका कराया है !! ( अना = आत्मसन्मान / फाका = उपासमार) मुनव्वर राना .

अश्फाक 08/05/2010 - 20:02
८-५-१० पहलु मे दिल बदलता है, पहलु संभालिये! ( पहलु मे = बगल मधे/बाजुला ) मेहफील मे आता है कोइ दस्त-ए-हिना लिये!! ( दस्त-ए-हिना= मेहंदी लावलेले हाथ ) तबअं(न) मेरी नजर बुरी नही मगर हुजुर ! ( तबअं(न)= पिंडाने , स्वाभावाने / तबीयतने ) कुछ आप भी तो अपनी नजर को संभालिये!! गुमनाम.

अश्फाक 12/05/2010 - 19:56
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... १२-५-१० बीमार को मर्ज़ की दवा देनी चाहिए! वो पीना चाहता है पिला देनी चाहिए!! अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में! ( बरकतों से = क्रुपा ज्याने वाढेल ) है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए!! ये दिल किसी फ़कीर के हुज़रे से कम नहीं! ये दुनिया यही पे लाके छुपा देनी चाहिए!! मैं फूल हूँ तो फूल को गुलदान हो नसीब! ( गुलदान= flowerpot ) मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए!! मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाईये मुझे! मैं नीद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए!! मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद, हो!! ( जब्र= जोरजबरदस्ती , ताईद = समर्थन ) मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए!! मैं ताज हूँ तो ताज को सर पे सजायें लोग! मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए!! सच बात , कौन है जो सरे-आम कह सके ? मैं कह रहा हूँ , मुझको सजा देनी चाहिए !! सौदा यही पे होता है हिन्दोस्तान का ! संसद भवन में आग लगा देनी चाहिए!! राहत इन्दोरी .

अश्फाक 18/05/2010 - 21:43
१८-५-१० यह एहतराम तो करना ज़रूर पड़ता है! (एहतराम करना = मान ठेवने.) जो तू ख़रीदे तो बिकना ज़रूर पड़ता है!! बड़े सलीक़े से यह कह के ज़िन्दगी गुज़री! ( सलीक़े से = पद्धत्शीर ) हर एक शख़्स को मरना ज़रूर पड़ता है!! ( शख़्स = व्यक्ती ) वो दोस्ती हो मुहब्बत हो चाहे सोना हो! कसौटियों पे परखना ज़रूर पड़ता है!! कभी जवानी से पहले कभी बुढ़ापे में! ख़ुदा के सामने झुकना ज़रूर पड़ता है!! हो चाहे जितनी पुरानी भी दुश्मनी लेकिन! कोई पुकारे तो रुकना ज़रूर पड़ता है!! वफ़ा की राह पे चलिए मगर ये ध्यान रहे! की दरमियान में सहरा ज़रूर पड़ता है.!! ( सहरा = वाळवंट ) मुनव्वर राना.

अश्फाक 21/05/2010 - 21:33
२१-५-१० मोअतबर दिल को तेरी याद बना देती है! ( मोअतबर= विश्वसनिय ) आशिकी फूल को फरहाद बना देती है !! ( तुझी आठवन आली की ह्रद्याला शान्ती,विश्वास वाटतो ) ( प्रेमात काय जादु आहे कोन जाने ? जे फुला सारख्या नाजुक व्यक्तीला फरहाद सारखे खंबिर बनवते ) पुरशिकम लोग जंग नही लडा करते ! ( पुरशिकम = पोट भरलेले ) भुक इन्सान को फौलाद बना देती है!!

अश्फाक 03/06/2010 - 20:19
३-६-१० अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको! मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझको!! मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी! ( मानी = अर्थ ) ये तेरी सादा दिली मार न डाले मुझको !! तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी! ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको!! ( ख़ुदपरस्ती = स्वत ला पुजने ) कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ! जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको!! ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन! कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको!! मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन! मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको!! तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम! ( तर्क-ए-उल्फ़त = प्रेम तर्क करने ) तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको!! वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ "क़तील"! शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको!! कतिल शिफाइ

II विकास II 28/03/2010 - 12:18
आवडले, तुम्ही सगळे वेगवेगळे भाषांतर धागे टाकण्यापेक्षा एकच धागा टाकाल काय? मला वाटते, वाचायला सोपे पडेल. असो ही विनंती आहे. -- प्रतिसादात आणि स्वाक्षरीत मराठी संकेतस्थळांची जाहीरात करुन मिळेल. विद्रोही संकेतस्थळांना खास सुट. योग्य बोली सह संपर्क करावा.

मुखालिफत से संवरती है शख्सियत मेरी ! मै दुश्मनो का बडा एहतेराम करता हु !! ( विरोधाने माझ्या व्यक्तिमत्वाला निखार येतो , मी माझ्या शत्रुंचा फारच आदर करतो ) क्या बात है ! अजून येऊ द्या. -दिलीप बिरुटे

शुचि 28/03/2010 - 21:07
मस्त ||विकास|| & बिरुटे यांच्या दोघांच्या वक्तव्याला +१ ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ हम नहीं वह जो करें ख़ून का दावा तुझपर बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जायेंगे

अश्फाक 29/03/2010 - 20:05
विनंती - क्रुपया मला साहेब म्हणु नका , विशम( odd ) वाटते , अश्फाक भाउ/ भाइ म्हणु शकता.

अश्फाक 30/03/2010 - 19:48
३०-३-१० लोग टुट जाते है एक घर बनाने मे! तुम रहम नही खाते बस्तिया जलाने मे!! ( लोग उन्मळुन पडतात एक घर बनवन्यातच , तुम्हाला मुळीच करुणा येत नाही संपुर्ण वस्ती जाळतांना ) हर धडकते पथ्थर को लोग दिल समझते है ! उमरे बीत जाती है दिल को दिल बनाने मे !! ( प्रत्येक धड्धड्नार्‍या दगडाला लोक ह्रुद्य समझून घेतात , किती तरी हयाती सरतात ह्रुद्याला ह्रुद्य बनवन्यासठी ) dr.Bashir badar

नेत्रेश 31/03/2010 - 06:19
छान शायरी आहे पण.. (कठीण शब्दांचे अर्थ दीले तरी चालतील पण मराठी भाशांतर नको ... सगळी मजा त्या भयंकर भाशांतराने घालऊन टाकली आहे)

अश्फाक 31/03/2010 - 10:37
३१-३-१० सब ने मिलाये हाथ यहा तिरगी के साथ! ( तिरगी = काळोख ) कितना बडा मजाक हुवा रोशनी के साथ!! शर्ते लगायी जाती नही दोस्ति के साथ ! किजीये मुझे कबुल मेरी हर कमी के साथ!! dr.wasim barelawi

सुधीर काळे 31/03/2010 - 12:59
अश्फाकभाई, हे सर्व शेर आपण लिहिलेले आहेत कां? तसं असेल तर फारच छान आहेत. जे शेर मी स्वतः सुरू केलेल्या धाग्यावर चढवतो ते दुसर्‍यांचेच असतात. (आपुनको कविता-बिविता जमती नहीं!) पण चांगल्या कविता, शेरोशायरी वाचायला आवडते. सुधीर काळे, जकार्ता ------------------------ हा दुवा उघडा: http://72.78.249.107/esakal/20100309/5306183452989196847.htm

शुचि 31/03/2010 - 18:29
३१ मार्च चे शेर काही खासच!!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ हम नहीं वह जो करें ख़ून का दावा तुझपर बल्कि पूछेगा ख़ुदा भी तो मुकर जायेंगे

अश्फाक 01/04/2010 - 10:48
१-४-१० अब के हम बिछडे तो शायद कभी ख्वाबो मे मिले! जिस तरह सुखे हुवे फूल किताबो मे मिले !! न तु खुदा है ना मेरा इश्क फरिश्तो जैसा ! दोनो इन्सान है तो क्यु इतने हिजाबो मे मिले!! ( हिजाब = परदा ) ::अहमद फराज

अश्फाक 02/04/2010 - 10:25
२-४-१० हमारी दोस्ती से दुश्म नी शर्माइ रहती है! हम अकबर है हमारे दिल मे जोधाबाइ रहती है!! किसी का पुछना कब तलक राह देखोगे ? हमारा फैसला जब तलक बीनाइ रहती है ! ( बीनाइ= द्रुश्टी , power of eyes) munawwar rana.

अश्फाक 03/04/2010 - 07:07
३-४-१० जहालतो के सारे अन्धेरे मिटा के लौट आया ! (जहालत्= अद्यान ) मै आज सारी किताबे जला के लौट आया !! सुना है सोना निकल रहा है वहा ! मै जिस जमिन पर ठोकर लगा के लौट आया! राहत ईन्दोरी.

अश्फाक 04/04/2010 - 20:14
४-४-१० अना[1]की मोहनी[2]सूरत बिगाड़ देती है बड़े-बड़ों को ज़रूरत बिगाड़ देती है किसी भी शहर के क़ातिल बुरे नहीं होते दुलार कर के हुक़ूमत[3]बिगाड़ देती है इसीलिए तो मैं शोहरत[4]से बच के चलता हूँ शरीफ़ लोगों को औरत बिगाड़ देती है शब्दार्थ: 1. ↑ आत्म-सम्मान 2. ↑ मोहक, मोहिनी 3. ↑ शासन 4. ↑ प्रसिद्धि

अश्फाक 05/04/2010 - 21:15
५-४-१० गुलाब ख्वाब दवा जहर जाम क्या क्या है ? मै आ गया हु बता इन्तेजाम क्या क्या है ! ( इन्तेजाम=प्रबंध ) फकिर शाह कलंदर इमाम क्या क्या है ! ( फकिर=भिक्षुक, शाह=राजा, कलंदर=भट्के सुफी, इमाम=धर्मगुरु ) तुझे पता नही तेरा गुलाम क्या क्या है !! राहत ईन्दोरी.

अश्फाक 06/04/2010 - 11:17
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... ६-४-१० हर हाल मे बख्शेगा उजाला अपना ! ( बख्शेगा = देनार ) ( हर हाल मे =काही ही करुन ) चांद रिश्ते मे नही लगता है मामा अपना!! मैने रोते हुवे पोछे थे किसि दिन आंसु! मुद्दतो मा ने नही धोया दुपट्टा अपना !! ( मुद्दतो= लांब मुदती पर्यंत ) munawwar rana.

शुचि 06/04/2010 - 21:17
अश्फाक भाऊ, दर वेळेला प्रतिक्रिया देताच येत नाही मला तरी पण तुमचे हे शेर रोज मी वाट बघते वाचण्यासाठी. मिपावरचा प्रत्येक लेख मला समृद्ध करतो कणाकणानी. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ सजनि कौन तम में परिचित सा, सुधि सा, छाया सा, आता? सूने में सस्मित चितवन से जीवन-दीप जला जाता!

अश्फाक 07/04/2010 - 20:34
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... ७-४-१० हम अब मकान मे ताला लगाने वाले है! सुना है आज घर मेहमान आने वाले है!! हमे हकीर ना जानो हम अपने नेजे से ! गजल की आंख मे काजल लगाने वाले है!! राहत ईन्दोरी.

शुचि 07/04/2010 - 21:16
छान आहेत शेर ७ एप्रिल चे. मला २रा आवडला विशेषकरून. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ I have always known that at last I would take this road, but yesterday I did not know that it would be today. - Narihara

अश्फाक 08/04/2010 - 10:58
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... ८-४-१० सेहरा मे रह के कैस ज्यादा मजे मे है! (सेहरा=वाळवंट, कैस = मजनु चे खरे नाव ) दुनिया समझ रहीहै के लैला मजे मे है !! परदेस ने हमे बरबाद कर दिया मगर! मा सब से केह रहीहै के बेटा मजे मे है!! munawwar rana.

मदनबाण 09/04/2010 - 09:50
अश्फाक भाउ हा धागा लयं आवडला...और भी आने दो. मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 09/04/2010 - 11:11
९-४-१० इतना टुटा हु के छुने से बिखर जाउगा ! अब अगर और दुआ दोगे तो मर जाउगा!! ज़िंदगी मैं भी मुसाफ़िर हूँ तेरी कश्ती का ! तू जहाँ मुझसे कहेगी, मैं उतर जाऊँगा !! - मुईन नज़र

अश्फाक 10/04/2010 - 12:01
१०-४-१० लोग हर मोड़ पे रुक रुक के सम्भलते क्यूँ हैं ! इतना डरते हैं तो फिर घर से निकलते क्यूँ हैं !! मैं न जुगनू हूँ दिया हूँ न कोई तारा हूँ ! रौशनी वाले मेरे नाम से जलते क्यूँ हैं !! नीन्द से मेरा त'अल्लुक़ ही नहीं बरसों से ! ( त'अल्लुक़ = संबंध ) ख़्वाब आ आ के मेरी छत पे टहलते क्यूँ हैं !! मोड़ होता है जवानी का सम्भलने के लिये ! और सब लोग यहीं आके फिसलते क्यूँ हैं !! राहत ईन्दोरी.

अश्फाक 11/04/2010 - 11:58
११-४-१० रविवार पेशानियों पे लिखे मुक़द्दर नहीं मिले! ( पेशानियों = कपाळांवर , मुक़द्दर = नशिब ) दस्तार कहाँ मिलेंगे जहाँ सर नहीं मिले!! ( दस्तार = फेटा ) आवारगी को डूबते सूरज से रब्त है! ( रब्त= लगाव्/जवळीक ) मग़्रिब के बाद हम भी तो घर पर नहीं मिले!! ( मग्रिब = सुर्यास्ताची वेळ ) कल आईनों का जश्न हुआ था तमाम रात! अन्धे तमाशबीनों को पत्थर नहीं मिले!! ( तमाशबीनों = प्रेक्षक ) मैं चाहता था ख़ुद से मुलाक़ात हो मगर! आईने मेरे क़द के बराबर नहीं मिले!! ( कद्=उंची ) पर्देस जा रहे हो तो सब देखते चलो! मुम्किन है वापस आओ तो ये घर नहीं मिले!! राहत ईन्दोरी.

In reply to by अश्फाक

शुचि 12/04/2010 - 05:11
कल आईनों का जश्न हुआ था तमाम रात! अन्धे तमाशबीनों को पत्थर नहीं मिले!! ( तमाशबीनों = प्रेक्षक ) मैं चाहता था ख़ुद से मुलाक़ात हो मगर! आईने मेरे क़द के बराबर नहीं मिले!! ( कद्=उंची ) मार डाला!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ I have always known that at last I would take this road, but yesterday I did not know that it would be today. - Narihara

In reply to by अश्फाक

मनिष 13/04/2010 - 11:12
पर्देस जा रहे हो तो सब देखते चलो! मुम्किन है वापस आओ तो ये घर नहीं मिले!! राहत ईन्दोरी.
अशक्य आहे हा... You can't go home again शी जवळीक दाखवणारा!

मदनबाण 11/04/2010 - 19:34
अश्फाक भाउ...वाचतोय्. बहोत बढीया. :) मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 12/04/2010 - 10:45
१२-४-१० जब कभि बोलना वक्त पर बोलना ! मुद्दतो सोचना , मुख्तसर बोलना !! ( मुद्दतो= लांब मुदती पर्यंत ,मुख्तसर =थोडे से) मेरि खानाबदोशी से पुछे कोइ ! ( खानाबदोशी = अस्थायी , भटके जीवन बंजारो की तरह ) कितना मुश्किल है रस्ते को घर बोलना!! तहीर फराझ

आवडाबाई 13/04/2010 - 10:52
मजा आ रहा है !! लगे रहो प्रत्येक वेळी प्रतिक्रिया नाही दिली तरी वाचत आहे बरेचसे शेर प्रथमच वाचल्यामुळे जास्तच मजा येतेय

अश्फाक 13/04/2010 - 20:09
१३-४-१० ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे! ( गिला = तक्रार , शिकायत ) तू बहुत देर से मिला है मुझे!! तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल! ( तु प्रेमाने मला धोका तर दे , हार जाने का हौसला है मुझे!! ( माझ्यात पराभव पत्करन्याची हिम्मत आहे ) ::अहमद फराज

In reply to by अश्फाक

शुचि 13/04/2010 - 21:14
तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल! ( तु प्रेमाने मला धोका तर दे , हार जाने का हौसला है मुझे!! ( माझ्यात पराभव पत्करन्याची हिम्मत आहे ) मस्त!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ I have always known that at last I would take this road, but yesterday I did not know that it would be today. - Narihara

मदनबाण 13/04/2010 - 20:37
अश्फ़ाक भाउ...मस्त एकसे एक शेर देत आहेस...सुभानल्ला !!! :) पण आज हा वर टाकलेला शेर तुम्ही आधीच दिला आहेत...तूमचा या धाग्याचा पहिलाच शेर पहा. मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 13/04/2010 - 21:15
मदनबाण..., काही तरी गैर समज झाला आहे आपला मी रोज शेर वरुन खाली असे तारर्खेसह संपादीत करतो . अजुन तरी कोनताही शेर रिपिट झाला नाही

In reply to by अश्फाक

मदनबाण 14/04/2010 - 20:17
माझी चूक झाली. मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 14/04/2010 - 12:18
१४-४-१० मेरे खुलुस की गेहराई से नही मिलते ! ( खुलुस = सह्र्युदता ) ये झुटे लोग है सच्चाइ से नही मिलते !! मुझे सबक दे रहे है वो मोहब्बत का ! जो ईद अप्ने सगे भाई से नही मिलते !! राहत ईन्दोरी.

In reply to by अश्फाक

वाहीदा 14/04/2010 - 12:53
अश्फाक भाईजान, तसलीम ! अगर आपको हमारी दखलअंदाजी बेअदबी नही लगती है तो अच्छी बात है, वरना माफी चाहते हुवे, हम आपको correct करना चाहेंगें.. खुलुस के माईने मराठी में सह्र्युदता नहीं होता खुलुस माने अंग्रेजी में Clearness, purity होती है, जिसके मराठी में मायने (meaning) निर्मळता जो दिलकी भी हो सकती है मेरे खुलुस की गहराई से नहीं मिलते मायने, मेरी दिल की साफ सुथरी सच्चाई के गहराई से नहीं मिलते खुलुस - निर्मल - साफ सुथरा Clear , purity बेशक , आपके सभी शेर लाजवाब है! :-) ~ वाहीदा

अश्फाक 14/04/2010 - 19:49
जझाक-अल्लाह , आपन दिलेले अर्थ अगदी बरोबर आहे जर , आपण खुलुस ला नाम ( noun ) म्हणुन वापरले तर , पन येथे विशेशन(adjective) म्हणुन वापरले आहे. ज्याचा अर्थ Sincerity,frankness असा ही होतो . असो प्रतिक्रीये बद्दल धन्यवाद. Sincerity is the virtue of one who speaks truly about his or her own feelings, thoughts, desires.

In reply to by अश्फाक

वाहीदा 15/04/2010 - 14:12
जझाक-अल्लाह इतनी बडीं दुवा दे दी और क्या चाहीये ... तहे दिलसे शुक्रिया !! अवांतर : मी तुम्हाला खुलुस या शब्दा बध्द्ल व्यनी तून बोलेन (सद्या कामाची गडबड अन ओन्साईट टेकनिक्ल डायरेक्ट ची लुड-बुड मागे लागली आहे :-( ) ~ वाहीदा

अश्फाक 15/04/2010 - 12:39
१५-४-१० खुद को कितना छोटा करना पड्ता है! बेटे से समझौता करना पडता है!! जब सारे के सारे ही बेपर्दा हो! ऐसे मे खुद परदा करना पडता है!! नवाज देवबंदी.

वात्रट 15/04/2010 - 20:35
लै भारी.... अश्फाक भाऊ, दर वेळेला प्रतिक्रिया देताच येत नाही मला तरी पण तुमचे हे शेर रोज मी वाट बघतो वाचण्यासाठी.>> असेच म्हणतो...

अश्फाक 16/04/2010 - 11:57
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... १६-४-१० NRI special मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं ! ( मुहाजिर = निर्वासीत ) तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं !! कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है ! कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं!! नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में ! पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं !! अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी ! ( अक़ीदत = विश्वास ) वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !! किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी ! ( आरज़ू = इच्छा ) किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!! ( ऊन की तीली = लोकर विनायची काडी / फंदा= टोक, छेडा ) पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से! ( सलीक़े से= पद्ध्तशीर ) निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं!! (डलिया = टोपली ) जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है! ( उन्नाव, मोहान = यु.पी. मधील गाव ) वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं!! ( हसरत = इच्छा ) यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद! हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!! हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है ! हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!! हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है! (हिजरत= स्थलांतर ) अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!! सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे! दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!! हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं! अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!! गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब! (मज़हब = धर्म) इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!! हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की ! किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं!! (सेहरा = लग्नात गायचे स्तुतीपर गीत) मुनव्वर राणा .

In reply to by अश्फाक

वाहीदा 16/04/2010 - 17:36
मुगल सलतनत के आखरी शहंशाह बहादुर शाह ज़फ़र के लिखे हुए कुछ आखरी कलाम (जब उन्हे अंग्रेजी पुलीस पकडकर ले गयी ..) लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में किसकी बनी है आलमे-ना-पायदार में बुलबुल को बाग़बां से न सय्याद से गिला क़िस्मत में क़ैद थी लिखी फ़स्ले-बहार में कहदो इन हसरतों से कहीं और जा बसें इतनी जगह कहां है दिले दाग़दार में एक शाख़े-गुल पे बैठ के बुलबुल है शादमां कांटे बिछा दिए हैं दिले-लालज़ार में उम्रे-दराज़ मांग के लाए थे चार दिन दो आरज़ू में कट गए दो इंतिज़ार में दिन ज़िंदगी के ख़त्म हुए शाम हो गई फैला के पांव सोएंगे कुंजे मज़ार में कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए दो गज़ ज़मीं भी मिल न सकी कूए-यार में --बहादुर शाह ज़फ़र बतौर शमा के रोते इस अंजुमन से चले न बाग़बां ने इजाज़त दी सैर करने की खुशी से आए थे रोते हुए चमन से चले न मालो हकुमत न धन जायेगा. तेरे साथ बस एक कफन जायेगा. बचा भी न कोइ कि नोहा करे पारायों के कांधे बदन जायेगा. जिलावतनी ओढे तु सोता रहा, यादों में लिपटा गगन जायेगा मुल्क कि मिट्टी की चादर कहां,? जफर तु तो अब बे वतन जायेगा --बहादुर शाह ज़फ़र ~ वाहीदा

मनिष 16/04/2010 - 12:41
मुहाजिर हैं मगर हम एक दुनिया छोड़ आए हैं ! ( मुहाजिर = निर्वासीत ) तुम्हारे पास जितना है हम उतना छोड़ आए हैं !! कहानी का ये हिस्सा आजतक सब से छुपाया है ! कि हम मिट्टी की ख़ातिर अपना सोना छोड़ आए हैं!! नई दुनिया बसा लेने की इक कमज़ोर चाहत में ! पुराने घर की दहलीज़ों को सूना छोड़ आए हैं !! अक़ीदत से कलाई पर जो इक बच्ची ने बाँधी थी ! ( अक़ीदत = विश्वास ) वो राखी छोड़ आए हैं वो रिश्ता छोड़ आए हैं !! किसी की आरज़ू ने पाँवों में ज़ंजीर डाली थी ! ( आरज़ू = इच्छा ) किसी की ऊन की तीली में फंदा छोड़ आए हैं!! ( ऊन की तीली = लोकर विनायची काडी / फंदा= टोक, छेडा ) पकाकर रोटियाँ रखती थी माँ जिसमें सलीक़े से! ( सलीक़े से= पद्ध्तशीर ) निकलते वक़्त वो रोटी की डलिया छोड़ आए हैं!! (डलिया = टोपली ) जो इक पतली सड़क उन्नाव से मोहान जाती है! ( उन्नाव, मोहान = यु.पी. मधील गाव ) वहीं हसरत के ख़्वाबों को भटकता छोड़ आए हैं!! ( हसरत = इच्छा ) यक़ीं आता नहीं, लगता है कच्ची नींद में शायद! हम अपना घर गली अपना मोहल्ला छोड़ आए हैं!! हमारे लौट आने की दुआएँ करता रहता है ! हम अपनी छत पे जो चिड़ियों का जत्था छोड़ आए हैं!! हमें हिजरत की इस अन्धी गुफ़ा में याद आता है! (हिजरत= स्थलांतर ) अजन्ता छोड़ आए हैं एलोरा छोड़ आए हैं!! सभी त्योहार मिलजुल कर मनाते थे वहाँ जब थे! दिवाली छोड़ आए हैं दशहरा छोड़ आए हैं!! हमें सूरज की किरनें इस लिए तक़लीफ़ देती हैं! अवध की शाम काशी का सवेरा छोड़ आए हैं!! गले मिलती हुई नदियाँ गले मिलते हुए मज़हब! (मज़हब = धर्म) इलाहाबाद में कैसा नज़ारा छोड़ आए हैं!! हम अपने साथ तस्वीरें तो ले आए हैं शादी की ! किसी शायर ने लिक्खा था जो सेहरा छोड़ आए हैं!! (सेहरा = लग्नात गायचे स्तुतीपर गीत) मुनव्वर राणा .
अंगावर काटा आहे आणि डोळे पाणावलेत. गुलजारच्या फाळणीच्या गोष्टी आठवल्या...सध्या तरी निशब्द! ही कविता/नज्म वापरेन मी कुठेतरी..जमेल तेव्हा! अतिशय संवेदनशील कविता. मला "ओ देस से आने वाले बता" आठवले...मी माझ्या ब्लॉगवर लिहीले होते त्याबद्द्ल - http://ramblings2reflections.wordpress.com/2007/09/07/o-des-se-aane-wale-bata/#comment-1355

अश्फाक 17/04/2010 - 19:32
१७-४-१० आते-आते मेरा नाम सा रह गया ! उस के होंठों पे कुछ काँपता रह गया!! वो मेरे सामने ही गया और मैं ! रास्ते की तरफ देखता रह गया !! झूठ वाले कहीं से कहीं बढ़ गये ! और मैं था कि सच बोलता रह गया!! आँधियों के इरादे तो अच्छे न थे! ये दिया कैसे जलता रह गया !! वसीम बरेलवी

मदनबाण 17/04/2010 - 19:38
वाचनखुण म्हणुन हा धागा साठवला आहे... :) मदनबाण..... There is no need for temples, no need for complicated philosophies. My brain and my heart are my temples; my philosophy is kindness. Dalai Lama

अश्फाक 18/04/2010 - 19:42
१८-४-१० अब मै समझा तेरे रुखसार पे तिल का मतलब ! ( रुखसार = गाल ) दौलत-ए-हुस्न पे दरबान बिठा रखा है!! ( दरबान= पहारेकरी ) गर सियाह बख्त ही होना था नसीबो मे मेरे ! (गर = अगर्/जर , सियाह =काळा, बख्त= नशीब) जुल्फ होता तेरे रुखसार पे या तिल होता !! ( जुल्फ= केसांची बट , रुखसार = गाल ) गुमनाम.

अश्फाक 19/04/2010 - 10:46
१९-४-१० कब लोगों ने अल्फ़ाज़ के पत्थर नहीं फेंके ! ( अल्फ़ाज़= शब्द ) वो ख़त भी मगर मैंने जला कर नहीं फेंके !! ठहरे हुए पानी ने इशारा तो किया था ! कुछ सोच के खुद मैंने ही पत्थर नहीं फेंके!! क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े ! घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके !! दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी ! लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके !! अख़्तर नज़मी .

अश्फाक 20/04/2010 - 19:58
२०-४-१० ना सुपारी नजर आयी ना सरोता निकला ! ( सरोता = सुपारी कापायचे यंत्र ) मा के बटवे से दुवा निकली वजीफा निकला!! ( बटवा = खिसा,पाकिट / वजीफा = जप ) एक निवाले के लिये मैने जिसे मार दिया ! ( निवाला = घास ) वो परिन्दा भि कई रोज का भुका निकला !! मुनव्वर राणा .

अश्फाक 21/04/2010 - 10:33
२१-४-१० तिफली मे सुना करते थे नानी से कहानी ! ( तिफली =बचपन ) बचपन है अगर शोख तो शोला है जवानी!! ( शोख = अवखळ ) जुडे मे सिमट आती है सावन की घटाये ! ( जुडा = केसांचा अंबाडा , सिमटना= एकत्र येणे ) खुल जाये अचानक तो बरस जाता है पानी!! सागर खय्यामी .

मनिष 21/04/2010 - 11:29
एक निवाले के लिये मैने जिसे मार दिया ! ( निवाला = घास ) वो परिन्दा भि कई रोज का भुका निकला !! मुनव्वर राणा
अश्फाक भाई, तुमच्या ह्या लिखाणाने मी मुनव्वर राणांचा फॅन झालोय...त्यांच्याबद्दल अजून लिहाल का?

अश्फाक 22/04/2010 - 19:02
२२-४-१० इसी गली में वो भूखा किसान रहता है! ये वो ज़मीन है जहाँ आसमान रहता है!! मैं डर रहा हूँ हवा से ये पेड़ गिर न पड़े! कि इस पे चिडियों का इक ख़ानदान रहता है!! सड़क पे घूमते पागल की तरह दिल है मेरा! हमेशा चोट का ताज़ा निशान रहता है !! तुम्हारे ख़्वाबों से आँखें महकती रहती हैं! तुम्हारी याद से दिल जाफ़रान रहता है !! (जाफ़रान = केसर ) हमें हरीफ़ों की तादाद क्यों बताते हो! ( हरीफ़ों की तादाद = साथीदारांची संख्या ) हमारे साथ भी बेटा जवान रहता है!! सजाये जाते हैं मक़तल मेरे लिये ‘राना’! ( मक़तल = कत्तलखाने ) वतन में रोज़ मेरा इम्तहान रहता है!! मुनव्वर राणा .

शुचि 22/04/2010 - 19:14
तुम्हारे ख़्वाबों से आँखें महकती रहती हैं! तुम्हारी याद से दिल जाफ़रान रहता है !! (जाफ़रान = केसर ) सुभानल्ला!!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ Music and poetry only reach the ears of those in anguish.

अश्फाक 23/04/2010 - 21:13
२३-४-१० अँधेरे चारों तरफ़ सायं-सायं करने लगे! चिराग़ हाथ उठाकर दुआएँ करने लगे!! सलिका जिन को सिखाया था हम ने चलने का! ( सलिका = पध्दत ) वो लोग आज हमे दाये बाये करने लगे !! ( दाये बाये = उजवा डावा दुर्लक्षित करने > ) तरक़्क़ी कर गए बीमारियों के सौदागर! ( बीमारियों के सौदागर = डोक्ट्र्र , दवाखाने ई. ) ये सब मरीज़ हैं जो अब दवाएँ करने लगे!! लहूलुहान पड़ा था ज़मीं पे इक सूरज! परिन्दे अपने परों से हवाएँ करने लगे!! ज़मीं पे आ गए आँखों से टूट कर आँसू! बुरी ख़बर है फ़रिश्ते ख़ताएँ करने लगे!! झुलस रहे हैं यहाँ छाँव बाँटने वाले! ( झुलस = झळ लागने ) वो धूप है कि शजर इलतिजाएँ करने लगे!! ( शजर= व्रुक्ष इलतिजाएँ = विनंती ) अजीब रंग था मजलिस का, ख़ूब महफ़िल थी ! ( मजलिस = सम्मेलन ) सफ़ेद पोश उठे काएँ-काएँ करने लगे!! ( सफ़ेद पोश = पांढरपेशे ) राहत इन्दौरी

अश्फाक 24/04/2010 - 11:15
२४-४-१० सियासत किस हुनरमंदी से सच्चाई छुपाती है ! ( सियासत = राजकारण , हुनरमंदी = खुबीने ) जैसे सिसकियो का जख्म शहनाइ छुपाती है !! जो ईस की तह मे जाता है वापस नही आता! ( तह = तळ ) नदी हर तैरने वाले से गहराइ छुपाती है !! ये बच्ची चाहती है और कुछ दिन मा को खुश रखना! ये कपडो की मदद से अपनी लम्बाई छुपाती है !! मुनव्वर राणा .

आवडाबाई 24/04/2010 - 18:48
क्या बात है उसने मेरी तस्वीर के टुकड़े ! घर में ही छुपा रक्खे हैं बाहर नहीं फेंके !! दरवाज़ों के शीशे न बदलवाइए नज़मी ! लोगों ने अभी हाथ से पत्थर नहीं फेंके !! खूपच सह्ही

अश्फाक 25/04/2010 - 18:01
२५-४-१० आँख से अश्क़ भले ही न गिराया जाये ! ( अश्क़ = आसु ) पर मेरे गम को हँसी में न उड़ाया जाये !! तू समंदर है मगर मैं तो नहीं हूँ दरिया ! ( दरिया = नदी ) किस तरह फ़िर तेरी दहलीज़ पे आया जाये !! दो कदम आप चलें तो मैं चलूँ चार कदम ! मिल तो सकते हैं अगर ऐसे निभाया जाये !! मुझे पसंद है खिलता हुआ, टहनी पे गुलाब ! उसकी जिद है कि वो, जुड़े में सजाया जाये !! मेरे जज़्बात ग़लत, मेरी हर इक बात ग़लत ! ( जज़्बात = भावना ) ये सही तो है मगर कितना जताया जाये !! लाख अच्छा सही वो फूल मगर मुरदा है ! कब तलक उसको किताबों में दबाया जाये !! रोशनी तुमको उधारी में भी मिल जायेगी ! पर मज़ा तब है कि, जब घर को जलाया जाये ! ललित मोहन त्रिवेदी

अश्फाक 26/04/2010 - 11:14
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... २६-४-१० सोचा नहीं अच्छा बुरा देखा सुना कुछ भी नहीं! मांगा ख़ुदा से रात दिन तेरे सिवा कुछ भी नहीं!! सोचा तुझे, देखा तुझे चाहा तुझे मांगा तुझे ! मेरी वफ़ा मेरी ख़ता, तेरी ख़ता कुछ भी नहीं!! जिस पर हमारी आँख ने मोती बिछाये रात भर! भेजा वही काग़ज़ उसे हमने लिखा कुछ भी नहीं!! इक शाम की दहलीज़ पर बैठे रहे वो देर तक! आँखों से की बातें बहुत मुँह से कहा कुछ भी नहीं!! दो चार दिन की बात है दिल ख़ाक में सो जायेगा! जब आग पर काग़ज़ रखा बाकी बचा कुछ भी नहीं!! अहसास की ख़ुश्बू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ! ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं!!

In reply to by अश्फाक

शुचि 26/04/2010 - 20:50
अहसास की ख़ुश्बू कहाँ आवाज़ के जुगनू कहाँ! ख़ामोश यादों के सिवा घर में रहा कुछ भी नहीं!! फारच गोड!!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव

अश्फाक 27/04/2010 - 10:43
२७-४-१० न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये ..... कभी तो आसमाँ से चांद उतरे जाम हो जाये! (जाम = प्याला) तुम्हारे नाम की इक ख़ूबसूरत शाम हो जाये!! हमारा दिल सवेरे का सुनहरा जाम हो जाये ! चराग़ों की तरह आँखें जलें जब शाम हो जाये!! अजब हालात थे यूँ दिल का सौदा हो गया आखिर! (अजब = विचित्र ) मोहबात की हवेली जिस तरह नीलाम हो जाये !! समंदर के सफ़र में इस तरह आवाज़ दो हमको! हवायेँ तेज़ हों और कश्तियों में शाम हो जाये!! मैं एहतियातन उस गली से कम गुज़रता हूँ! ( एहतियातन = काळ्जीपुर्वक ) कोई मासूम क्यों मेरे लिये बदनाम हो जाये !! मुझे मालूम है उस का ठिकाना फिर कहाँ होगा! परिंदा आसमाँ छूने में जब नाक़ाम हो जाये !! उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ! न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये!! --बशीर बद्र

अश्फाक 28/04/2010 - 19:44
साहिल पे समन्दर के खजाने नहि आते! होटो पे मोहोब्बत के फसाने नहि आते!! सोते मे चमक उठति है पलके हमारी! आन्खो को अब ख्वाब छुपाने नही आते.!! ` ( पुर्वप्रकाशीत २७-३-१० ला ) पुढे ........ दिल उजड़ी हुई इक सराये की तरह है! ( सराये = धर्मशाला ) अब लोग यहाँ रात जगाने नहीं आते!! उड़ने दो परिंदों को अभी शोख़ हवा में! ( शोख़ = अवखळ ) फिर लौट के बचपन के ज़माने नहीं आते!! इस शहर के बादल तेरी ज़ुल्फ़ों की तरह हैं! ( ज़ुल्फ़ों = केस ) ये आग लगाते हैं बुझाने नहीं आते!! अहबाब भी ग़ैरों की अदा सीख गये हैं! ( अहबाब = दोस्त ) आते हैं मगर दिल को दुखाने नहीं आते...!!

अश्फाक 29/04/2010 - 19:38
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... २९-४-१० इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा ............ सर झुकाओगे तो पत्थर देवता हो जायेगा! इतना मत चाहो उसे वो बेवफा हो जायेगा !! हम भी दरिया हैं अपना हुनर मालूम है ! जिस तरफ भी चले जायेंगे रास्ता हो जायेगा !! इतनी सचाई से मुझसे जिंदगी ने कह दिया ! तू नहीं मेरा तो कोई दूसरा हो जायेगा !! मै खुदा का नाम लेकर पी रहा हूँ दोस्तों ! जहर भी अगर इसमें होगा दवा हो जायेगा !! सब उसी के हैं हवा खुशबू ज़मीनों आसमान ! मै जहाँ भी जाऊंगा उसे पता हो जायेगा !! dr.bashir badar

In reply to by अश्फाक

शुचि 29/04/2010 - 20:00
वा! काय तडफ काय आत्मविश्वास आहे या शेरांमधे. मस्त!! ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव

अश्फाक 30/04/2010 - 11:55
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं........... ३०-४-१० उन घरों में जहाँ मिट्टी के घड़े रहते हैं! क़द में छोटे हों मगर लोग बड़े रहते हैं!! जो भी दौलत थी वो बच्चों के हवाले कर दी! जब तलक मैं नहीं बैठूँ ये खड़े रहते हैं !! मैंने फल देख के इन्सानों को पहचाना है! जो बहुत मीठे हों अंदर से सड़े रहते हैं!! मुनव्वर राणा .

अश्फाक 01/05/2010 - 21:26
१-५-१० आज फिर कोई भूल की जाए......... दोस्ती जब किसी से की जाए ! दुश्मनों की भी राए ली जाए !! मौत का ज़हर है फ़िज़ाओं में ! (फ़िज़ाओं = हवाये ) अब कहां जा के सांस ली जाए !! मेरे माज़ी के ज़ख्म भरने लगे ! आज फिर कोई भूल की जाए !! बोतलें खोल के तो पी बरसों ! आज दिल खोल के भी पी जाए !! राहत इन्दौरी

अश्फाक 02/05/2010 - 21:48
२-५-१० हमारे कुछ गुनाहों की सज़ा भी साथ चलती है ! हम अब तन्हा नहीं चलते दवा भी साथ चलती है!! ( तन्हा=एकटे ) अभी ज़िन्दा है माँ मेरी मुझे कुछ हो नही सकता ! मैं जब घर से निकलता हूँ दुआ भी साथ चलती है!! मुनव्वर राणा .

अश्फाक 03/05/2010 - 20:08
३-५-१० राना कभी शाहों की ग़ुलामी नहीं करता......... हम दोनों में आँखें कोई गीली नहीं करता! ग़म वो नहीं करता है तो मैं भी नहीं करता!! मौक़ा तो कई बार मिला है मुझे लेकिन! मैं उससे मुलाक़ात में जल्दी नहीं करता!! वो मुझसे बिछड़ते हुए रोया नहीं वरना! दो चार बरस और मैं शादी नहीं करता!! वो मुझसे बिछड़ने को भी तैयार नहीं है! लेकिन वो बुज़ुर्गों को ख़फ़ा भी नहीं करता!! ( बुज़ुर्गों = वडिलधारे, ख़फ़ा = नाराज ) ख़ुश रहता है वो अपनी ग़रीबी में हमेशा! ‘राना’ कभी शाहों की ग़ुलामी नहीं करता!! ( शाह = बादशाह ) मुनव्वर राना .

In reply to by अश्फाक

शुचि 03/05/2010 - 20:45
हम दोनों में आँखें कोई गीली नहीं करता! ग़म वो नहीं करता है तो मैं भी नहीं करता!! मौक़ा तो कई बार मिला है मुझे लेकिन! मैं उससे मुलाक़ात में जल्दी नहीं करता!! किती हा निग्रह! प्रेमात "शरणभाव" महत्त्वाचा हे दोघंही जाणत नाहीत जणू. दोघंही तोडीसतोड मानी आहेत. ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ विश्वच अवघे ओठा लावून, कुब्जा प्याली तो मुरलीरव डोळ्यांमधुनी थेंब सुखाचे, हे माझ्यास्तव..हे माझ्यास्तव

अश्फाक 05/05/2010 - 22:02
५-५-१० अंजाम उसके हाथ है आगाज कर के देख ! ( शेवट परमेश्वराच्या हातात आहे , सुरवात करुन तर बघ ) भिगे हुए परो से ही परवाज कर के देख !! ( चिंब भिजलेल्या पंखांनी उडुन तर बघ ) नवाज देवबंदी .

अश्फाक 07/05/2010 - 21:48
७-५-१० जहा तक हो सके हमने तुम्हे परदा कराया है ! मगर ऐ आसुओ तुम ने बडा रुसवा कराया है !! ( रुसवा = बदनाम ) चमक ऐसे नही आती है, खुद्दारी कि, चेहरे पर ! ( खुद्दारी = आत्मनिर्भरता ) अना को हम ने दो दो वक्त का फाका कराया है !! ( अना = आत्मसन्मान / फाका = उपासमार) मुनव्वर राना .

अश्फाक 08/05/2010 - 20:02
८-५-१० पहलु मे दिल बदलता है, पहलु संभालिये! ( पहलु मे = बगल मधे/बाजुला ) मेहफील मे आता है कोइ दस्त-ए-हिना लिये!! ( दस्त-ए-हिना= मेहंदी लावलेले हाथ ) तबअं(न) मेरी नजर बुरी नही मगर हुजुर ! ( तबअं(न)= पिंडाने , स्वाभावाने / तबीयतने ) कुछ आप भी तो अपनी नजर को संभालिये!! गुमनाम.

अश्फाक 12/05/2010 - 19:56
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया आमच्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... १२-५-१० बीमार को मर्ज़ की दवा देनी चाहिए! वो पीना चाहता है पिला देनी चाहिए!! अल्लाह बरकतों से नवाज़ेगा इश्क़ में! ( बरकतों से = क्रुपा ज्याने वाढेल ) है जितनी पूँजी पास लगा देनी चाहिए!! ये दिल किसी फ़कीर के हुज़रे से कम नहीं! ये दुनिया यही पे लाके छुपा देनी चाहिए!! मैं फूल हूँ तो फूल को गुलदान हो नसीब! ( गुलदान= flowerpot ) मैं आग हूँ तो आग बुझा देनी चाहिए!! मैं ख़्वाब हूँ तो ख़्वाब से चौंकाईये मुझे! मैं नीद हूँ तो नींद उड़ा देनी चाहिए!! मैं जब्र हूँ तो जब्र की ताईद बंद, हो!! ( जब्र= जोरजबरदस्ती , ताईद = समर्थन ) मैं सब्र हूँ तो मुझ को दुआ देनी चाहिए!! मैं ताज हूँ तो ताज को सर पे सजायें लोग! मैं ख़ाक हूँ तो ख़ाक उड़ा देनी चाहिए!! सच बात , कौन है जो सरे-आम कह सके ? मैं कह रहा हूँ , मुझको सजा देनी चाहिए !! सौदा यही पे होता है हिन्दोस्तान का ! संसद भवन में आग लगा देनी चाहिए!! राहत इन्दोरी .

अश्फाक 18/05/2010 - 21:43
१८-५-१० यह एहतराम तो करना ज़रूर पड़ता है! (एहतराम करना = मान ठेवने.) जो तू ख़रीदे तो बिकना ज़रूर पड़ता है!! बड़े सलीक़े से यह कह के ज़िन्दगी गुज़री! ( सलीक़े से = पद्धत्शीर ) हर एक शख़्स को मरना ज़रूर पड़ता है!! ( शख़्स = व्यक्ती ) वो दोस्ती हो मुहब्बत हो चाहे सोना हो! कसौटियों पे परखना ज़रूर पड़ता है!! कभी जवानी से पहले कभी बुढ़ापे में! ख़ुदा के सामने झुकना ज़रूर पड़ता है!! हो चाहे जितनी पुरानी भी दुश्मनी लेकिन! कोई पुकारे तो रुकना ज़रूर पड़ता है!! वफ़ा की राह पे चलिए मगर ये ध्यान रहे! की दरमियान में सहरा ज़रूर पड़ता है.!! ( सहरा = वाळवंट ) मुनव्वर राना.

अश्फाक 21/05/2010 - 21:33
२१-५-१० मोअतबर दिल को तेरी याद बना देती है! ( मोअतबर= विश्वसनिय ) आशिकी फूल को फरहाद बना देती है !! ( तुझी आठवन आली की ह्रद्याला शान्ती,विश्वास वाटतो ) ( प्रेमात काय जादु आहे कोन जाने ? जे फुला सारख्या नाजुक व्यक्तीला फरहाद सारखे खंबिर बनवते ) पुरशिकम लोग जंग नही लडा करते ! ( पुरशिकम = पोट भरलेले ) भुक इन्सान को फौलाद बना देती है!!

अश्फाक 03/06/2010 - 20:19
३-६-१० अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको! मैं हूँ तेरा नसीब अपना बना ले मुझको!! मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के मानी! ( मानी = अर्थ ) ये तेरी सादा दिली मार न डाले मुझको !! तूने देखा नहीं आईने से आगे कुछ भी! ख़ुदपरस्ती में कहीं तू न गँवा ले मुझको!! ( ख़ुदपरस्ती = स्वत ला पुजने ) कल की बात और है मैं अब सा रहूँ या न रहूँ! जितना जी चाहे तेरा आज सता ले मुझको!! ख़ुद को मैं बाँट न डालूँ कहीं दामन-दामन! कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको!! मैं जो काँटा हूँ तो चल मुझसे बचाकर दामन! मैं हूँ गर फूल तो जूड़े में सजा ले मुझको!! तर्क-ए-उल्फ़त की क़सम भी कोई होती है क़सम! ( तर्क-ए-उल्फ़त = प्रेम तर्क करने ) तू कभी याद तो कर भूलने वाले मुझको!! वादा फिर वादा है मैं ज़हर भी पी जाऊँ "क़तील"! शर्त ये है कोई बाँहों में सम्भाले मुझको!! कतिल शिफाइ
लेखनविषय:
काव्यरस
आपल्या सुचना आणि प्रतिक्रिया माझ्यासाठी अमुल्य आहेत, प्रतिक्षेत ......... २६-०७-११ ज़िन्दगी से यही गिला है मुझे ! ( गिला = तक्रार ) तू बहुत देर से मिला है मुझे !! हमसफ़र चाहिये हुजूम नहीं ! ( सहप्रवासी हवा गर्दी नको ) इक मुसाफ़िर भी काफ़िला है मुझे !! तू मोहब्बत से कोई चाल तो चल ! हार जाने का हौसला है मुझे !! लब कुशां हूं तो इस यकीन के साथ ! ( लब कुशां = तोंड उघडने ) कत्ल होने का हौसला है मुझे !! दिल धडकता नहीं सुलगता है ! वो जो ख्वाहिश थी, आबला है मुझे!!

आदाब अर्ज है !

अश्फाक ·

शुचि 27/03/2010 - 21:22
अश्फाक साहेब सर्वात प्रथम आपलं स्वागत मिसळ (L)पाव वर. खूप सुंदर शेर सांगीतलेत आपण. : ) मजा आली. आपण संकलीत करून बरेच शेर एकदम एका धाग्यात दिलेत तर जास्त चांगलं होईल असं वाटतं. काही सूचना - ळ लिहयचं तर कॅपिटल L क्ष लिहायचा तर कॅपिटल S किनार्‍या करता कॅपिटल R अनुस्वाराकरता शिफ्ट M ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ Love is older than you but the light shining through makes me see your love is all new.

In reply to by शुचि

मेघवेडा 28/03/2010 - 03:03
अश्फाक साहेब सर्वात प्रथम आपलं स्वागत मिसळ (L)पाव वर. असंच म्हणतो. एका सूचनेमधे बदल फक्तः क्ष लिहायचा तर कॅपिटल S च्या ऐवजी क्ष लिहायचा तर X असं वाचा! -- मेघवेडा! भय इथले संपत नाही, मज तुझी आठवण येते मी संध्याकाळी गातो, तू मला शिकवीली गीते..!

In reply to by शुचि

वाहीदा 29/03/2010 - 16:49
रंगबिरंगी मिपावर आपले स्वागत ! मिपा पर तुम्हे हर तरिके के शख्स मिलेंगे किसीकी दिलनवाज बातें तुम्हारे दिलको छू जायेगी :-) तो किसे के तलख अंदाज से तुम तिलमिला उठोगे :-( फिर भी काफि सारी चिजें तुम्हें कांच कि तरह साफ दिखाई देगी यहीं है यहां की खुबसुरती आजमाईये और अपनाईये !! :-) असो मला ही शेर शायरी खुपच आवडते अन बद्र सरांची शायरी तो .. 'वल्लाह क्या कहेना' !! :-) ~ वाहीदा

मिपावर स्वागत. चांगला उपक्रम आहे. लिहा नियमितपणे. वरती उजवीकडे वाविप्र मधे टंकलेखन सहाय्य आहे. ते बघा, सगळे शब्द कळतील बिपिन कार्यकर्ते

II विकास II 28/03/2010 - 12:05
मिपावर स्वागत, अतिशय चांगला उपक्रम, शुभेच्छा. --- प्रतिसादात आणि स्वाक्षरीत मराठी संकेतस्थळांची जाहीरात करुन मिळेल. विद्रोही संकेतस्थळांना खास सुट. योग्य बोली सह संपर्क करावा.

शुचि 27/03/2010 - 21:22
अश्फाक साहेब सर्वात प्रथम आपलं स्वागत मिसळ (L)पाव वर. खूप सुंदर शेर सांगीतलेत आपण. : ) मजा आली. आपण संकलीत करून बरेच शेर एकदम एका धाग्यात दिलेत तर जास्त चांगलं होईल असं वाटतं. काही सूचना - ळ लिहयचं तर कॅपिटल L क्ष लिहायचा तर कॅपिटल S किनार्‍या करता कॅपिटल R अनुस्वाराकरता शिफ्ट M ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ Love is older than you but the light shining through makes me see your love is all new.

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मेघवेडा 28/03/2010 - 03:03
अश्फाक साहेब सर्वात प्रथम आपलं स्वागत मिसळ (L)पाव वर. असंच म्हणतो. एका सूचनेमधे बदल फक्तः क्ष लिहायचा तर कॅपिटल S च्या ऐवजी क्ष लिहायचा तर X असं वाचा! -- मेघवेडा! भय इथले संपत नाही, मज तुझी आठवण येते मी संध्याकाळी गातो, तू मला शिकवीली गीते..!

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वाहीदा 29/03/2010 - 16:49
रंगबिरंगी मिपावर आपले स्वागत ! मिपा पर तुम्हे हर तरिके के शख्स मिलेंगे किसीकी दिलनवाज बातें तुम्हारे दिलको छू जायेगी :-) तो किसे के तलख अंदाज से तुम तिलमिला उठोगे :-( फिर भी काफि सारी चिजें तुम्हें कांच कि तरह साफ दिखाई देगी यहीं है यहां की खुबसुरती आजमाईये और अपनाईये !! :-) असो मला ही शेर शायरी खुपच आवडते अन बद्र सरांची शायरी तो .. 'वल्लाह क्या कहेना' !! :-) ~ वाहीदा

मिपावर स्वागत. चांगला उपक्रम आहे. लिहा नियमितपणे. वरती उजवीकडे वाविप्र मधे टंकलेखन सहाय्य आहे. ते बघा, सगळे शब्द कळतील बिपिन कार्यकर्ते

II विकास II 28/03/2010 - 12:05
मिपावर स्वागत, अतिशय चांगला उपक्रम, शुभेच्छा. --- प्रतिसादात आणि स्वाक्षरीत मराठी संकेतस्थळांची जाहीरात करुन मिळेल. विद्रोही संकेतस्थळांना खास सुट. योग्य बोली सह संपर्क करावा.
लेखनविषय:
काव्यरस
सर्व मिसलपाव च्या सन्माननिय सभासदाना नमस्कार , आपले लेखन वाचुन असे लक्शात आले कि गझल आनि शेर-ओ-शायरि बद्दल फार लोकाना जानुन घ्यायाचि इच्छा अस्ते , पन जास्त करुन गझल उर्दु भाशेत असतात आनि ते समजाय्तला कठिन असतात.तरि मि माझ्या परिने शक्य तित्के सोप्या भाशेत रोज काहि तरि नवीन ( भाशान्तर) द्यायचा प्रयत्न करेल .

रस्ता ओलांडता

sur_nair ·

आई बाबा जसे होते तिथेच राहिले रस्त्याच्या त्या दुसरया बाजूला मधेच कधीतरी आमच्यामधला तो रस्ता मात्र काहीसा रुंद झाला वा ! क्या बात है !Touching ! खुप आवडली.

दोन पिढ्यांच्या मध्ये असणारा रस्ता (आई वडिलांनी ओलांडायला मदत केलेला व आता रुंद झालेला) हे सुंदर प्रतीक आहे. फक्त कवितेत ते प्रतीक आहे असं सांगणं जरा बाळबोध वाटलं. राजेश

In reply to by राजेश घासकडवी

sur_nair 22/03/2010 - 19:41
राजेशजी, तुमच्या 'प्रतिका' बद्दलच्या प्रतिक्रिया पाहून थोडा बदल केला आहे. वाचून पहा. धन्यवाद.

In reply to by राजेश घासकडवी

श्री नायर, कविता चांगलीच झाली आहे. रूढी परंपरा जरी त्याच असल्या तरी आचार-विचारांचा फरक पडला घर, भिंती, खिडक्या त्याच असल्या तरी पडदे व भिंतींचा रंग मात्र बदलला पण वरच्या ओळी अजुन सखोल हव्या आहेत. तो कवितेचा आत्मा आहे पण ओळींमध्ये आहे तितका सरळपणे पाहता येत नाही. सरळपणा नसला तरी याविषयीचे कुतूहल कवितेत अधिक सखोलपणे आले तर मजा येईल.

आई बाबा जसे होते तिथेच राहिले रस्त्याच्या त्या दुसरया बाजूला मधेच कधीतरी आमच्यामधला तो रस्ता मात्र काहीसा रुंद झाला वा ! क्या बात है !Touching ! खुप आवडली.

दोन पिढ्यांच्या मध्ये असणारा रस्ता (आई वडिलांनी ओलांडायला मदत केलेला व आता रुंद झालेला) हे सुंदर प्रतीक आहे. फक्त कवितेत ते प्रतीक आहे असं सांगणं जरा बाळबोध वाटलं. राजेश

In reply to by राजेश घासकडवी

sur_nair 22/03/2010 - 19:41
राजेशजी, तुमच्या 'प्रतिका' बद्दलच्या प्रतिक्रिया पाहून थोडा बदल केला आहे. वाचून पहा. धन्यवाद.

In reply to by राजेश घासकडवी

श्री नायर, कविता चांगलीच झाली आहे. रूढी परंपरा जरी त्याच असल्या तरी आचार-विचारांचा फरक पडला घर, भिंती, खिडक्या त्याच असल्या तरी पडदे व भिंतींचा रंग मात्र बदलला पण वरच्या ओळी अजुन सखोल हव्या आहेत. तो कवितेचा आत्मा आहे पण ओळींमध्ये आहे तितका सरळपणे पाहता येत नाही. सरळपणा नसला तरी याविषयीचे कुतूहल कवितेत अधिक सखोलपणे आले तर मजा येईल.
लेखनविषय:
काव्यरस
रस्ता ओलांडता आठवते चतुर्थीला गणपतीच्या देवळात आईचा हात धरून दर्शन घेताना आठवते अजून तो भरगर्दीतला रस्ता बाबांचा हात धरून ओलांडताना आठवतं अंधुकसं पहिल्यांदा जेव्हा आईनं शाळेत सोडलं होतं आठवतं जेव्हा, माझ्या हट्टाखातर बाबांनी खांद्यावर घेतलं होतं देवळात असो वा रस्ता ओलांडता किती सुरक्षित आहोत वाटायचे खांद्यावर बसून बाबांच्या मला आपण उंच झालो असे भासायचे पुढे वयाने मोठा, देहाने उंच झालो शाळा- कोलेजात जाऊन सुशिक्षित झालो अन रस्ता पार करता करता जाणवले आपण एकटेच फक्त आता पुढे आलो आई बाबा जसे होते तिथेच राहिले रस्त्याच्या त्या दुसरया बाजूला मधेच

नाडि वाचुनी अति मी दमले, थकले रे शशिकांता!

राजेश घासकडवी ·

विसोबा खेचर 15/03/2010 - 20:05
श्रद्धेच्या तू घेता गिरक्या, अंधपणा की आला तर्काचा तुज तोल कळेना, कान बंद तू केला संस्थाळांच्या इंद्रायणि तू, ओकशी नाडीगाथा || ३ || उत्तर देऊनि 'बिका'ट प्रश्नी, मुख्य प्रश्न नुत्तरला विज्ञानाचा 'प्रकाश' का घ्या, जर 'तात्या' पाठीला 'तुका म्हणे' मी हात टेकले, 'राघव'शरणही येता || ५ ||
=)) संपलो रे राजेश..! धन्य आहेस.. :) (ओकसाहेबांचा पाठराखा) तात्या. :)

श्रावण मोडक 15/03/2010 - 20:20
हाहाहाहा... फारच करूण रसात झालं बॉ हे. दोन-चार दगडं मारायची ना राव. त्याशिवाय मजा नाही!!! शेवटच्या कडव्यात काढलेत ते चिमटे.

In reply to by श्रावण मोडक

मुक्तसुनीत 15/03/2010 - 21:04
>> फारच करूण रसात झालं बॉ हे पुढील कामांकरता घासकडवींकरता काही क्लूज : शृंगार : ग बाई माझ्या चड्डीची नाडी तुटली , बाई ग , बाई ग ! हास्य : सखिशेजारणी तू हसत रहा, नाडिची गाठ ही सुटत अहा ! रौद्र : सोहमहर डमरू बाजे , तुटती नाडी नि काजे ! कारुण्य : वर पहावे बीभत्स : अचकट्ट विचकट्ट, बसली ना नाडी घट्ट शांत : जो जे वांच्छिल तो ते बांधो, नाडिजात अद्भुत : बांधता बांधता चमत्कार झाला , नाडीचा गुंता सुटोनि गेला ! वीर : वेडात नाडीच्या गाठी मारिल्या सात !

In reply to by मुक्तसुनीत

मुसु ने दिलेले नाड्य क्लू लईच भारी! आता सर्वांना नाड्य संगीत रसात भिजायला मिळणार असे आमचे भाकित प्रकाश घाटपांडे आमच्या जालनिशीत जरुर डोकवा.

In reply to by मुक्तसुनीत

मिसळभोक्ता 15/03/2010 - 21:20
वा मुसुशेठ वा !!!! आम्ही नेहमी "लय भारी" एवढा एकच ठेवणीचा प्रतिसाद देतो. पण आपली प्रतिभा (तीही सोमवारी सकाळी?) पाहून आम्ही आज आपल्याला "लयच भारी" हा प्रतिसाद देऊ इच्छितो. पार्टी करा. (मटार उसळ, शिक्रण इत्यादि) एक शिंपल सजेश्चन आहे: प्रत्येक ओळीत नाडी न टाकता, नाडीचा भास झाला, तरी चालेल. उदा. बीभत्सः आज अचानक गाठ पडे, भलत्या वेळी भलतीच कडे -- मिसळभोक्ता (आमचेकडे सर्व प्रकारच्या आनंदांवर विरजण घालून मिळेल.)

In reply to by श्रावण मोडक

Nile 16/03/2010 - 02:44
वरच्या तीनही प्रतिसांदांना अनुमोदन. हहपुवा. (पट्टा घट्ट बांधणारा)

In reply to by मुक्तसुनीत

चतुरंग 15/03/2010 - 21:34
काल संध्याकाळीच 'पाडवा साजरा' झाल्याने गुढी अजून हवेतच दिसते आहे!! ;) (कडुलिंब)चतुरंग

In reply to by मुक्तसुनीत

विसोबा खेचर 15/03/2010 - 23:07
शृंगार : ग बाई माझ्या चड्डीची नाडी तुटली , बाई ग , बाई ग ! बीभत्स : अचकट्ट विचकट्ट, बसली ना नाडी घट्ट
आयला, आमचा मुक्तराव पण एकदम फार्मात दिसतोय! अरे तुला विंदा गेल्याचं काही दु:ख आहे की नाही?! :) तात्या.

In reply to by विसोबा खेचर

मिसळभोक्ता 15/03/2010 - 23:51
अरे तात्या, मुसुशेठच्या नाडीत अख्खा अगस्ति ऋषी "ओक"लाय, की त्याला अशाचवेळी प्रतिभेचे धुमारे फुटणार म्हणून. वाटल्यास आपल्या शशिषेठ ला विचार. (षेठ.. कसले जबरा वाटते उच्चारायला. आज बाबूजी हवे होते.) -- मिसळभोक्ता (आमचेकडे सर्व प्रकारच्या आनंदांवर विरजण घालून मिळेल.)

In reply to by मुक्तसुनीत

राघव 16/03/2010 - 00:22
मुसुशेठ, =)) =)) =)) मेलोSSSSSSS सगळे सुटलेत अगदी! राजेशशेठ, शेवटचे कडवे झक्कास!! ह.ह.पु.वा. =)) राघव

In reply to by मुक्तसुनीत

शुचि 16/03/2010 - 04:50
अहो मुसु ते शृंगार रसात चड्डीच्या जागी चोळी घाला हो. तो शृंगार रस न राहता पार अश्लील/उत्तान्/अनवृत्त रस झालाया त्या चड्डी शब्दामुळे. =)) *********************************** we (women) go from mothers to men with no self in between. Once we wanted to be "nice girls". Now we are "nice married ladies" - just like mother.

In reply to by शुचि

तो शृंगार रस न राहता पार अश्लील/उत्तान्/अनवृत्त रस झालाया त्या चड्डी शब्दामुळे मग चोळी घातल्यावर आय मीन चोळी शब्द घातल्यावर काय वेगळे होईल? बिपिन कार्यकर्ते

=)) =)) =)) आता राजेशा जीवनाडीचा कोप होईल तुजवरी. नाडीग्रंथातील मजकुर आपोआप बदलतो हे आम्हास पचले नव्हते. पण नाडीमुळे शब्द आपोआप स्फुरतात हे आता पटले ब्वॉ! अवांतर- या प्रतिभेसाठी कुठले आसव प्राशन करावे प्रकाश घाटपांडे आमच्या जालनिशीत जरुर डोकवा.

In reply to by प्रकाश घाटपांडे

मिसळभोक्ता 15/03/2010 - 20:55
मी आधीच म्हटलं होतं, की हा ग्रासस्टांझाज एक नंबरचा वायझेड आहे, म्हणून. बाकी, नाडीबद्दल बोलाल, तर ओकायचा हक्क शशिकांतशेठकडे आडनावामुळे आहेच. आजकाल, (म्हणजे कंपू हद्दपार झाल्यापासून) मिपावर आमचे मनोरंजन नाडीमुळे होते, हे नक्कीच. प्रकाशकाका, प्रतिभेचा एकाच आसवाशी संबंध आहे. अधिक माहितीसाठी देवकाकांना भेटा, आणि आत्मशोध करा. -- मिसळभोक्ता (आमचेकडे सर्व प्रकारच्या आनंदांवर विरजण घालून मिळेल.)

चतुरंग 15/03/2010 - 20:49
गदिमांच्या कवनाला हात घालण्याचे धारिष्ट्य तुझ्यात उत्पन्न व्हावे, काय हा नाडीचा चमत्कार!! :D ग्रासस्टांझाज*, खल्लास विडंबन झाले आहे!! 'नाडि वाचुनी' ह्या शब्दांतला श्लेष तुफ्फ्फ्फान!!! =)) =)) =)) (थकलेला, नाडलेला)चतुरंग (*शब्दश्रेय -मिभोकाका)

तुका म्हणे 15/03/2010 - 21:00
तुझ्या पुढे देखिल हात टेकले रे बाबा! सगळ्या भावना "ओक"ल्यास :) तु म्हटले तसे : "उद्विग्नता, विमनस्कता, थकवा, हातबल्य" हे सग़ळे भाव कवितेच फक्त नाव वाचुनच चपखल पोचले. :-) - तुक्या

In reply to by तुका म्हणे

औद्विगन्य, वैमनस्क्य,थैकव्य व हातबल्य हे भाव औनाड्यातुन येत नसुन नाड्यातुन येतात असे अनुमान आम्ही काढले आहे. प्रकाश घाटपांडे आमच्या जालनिशीत जरुर डोकवा.

प्राजु 15/03/2010 - 21:34
उत्तर देऊनि 'बिका'ट प्रश्नी, मुख्य प्रश्न नुत्तरला विज्ञानाचा 'प्रकाश' का घ्या, जर 'तात्या' पाठीला 'तुका म्हणे' मी हात टेकले, 'राघव'शरणही येता || ५ || ठ्यॉ ठ्ठ्यॉ!!! - (सर्वव्यापी)प्राजक्ता http://www.praaju.net/

jaypal 15/03/2010 - 21:35
नाडी नही ये मेरा दिल है/ देखो देखो टुटेना/ *************************************************** दुरितांचे तिमीर जोवो/विश्व स्वधर्मसुर्ये पाहो/जो जें वाछील तो तें लाहो/प्राणिजात/

विकास 16/03/2010 - 02:45
"समझने वाले समझ गये है, ना समझे वो "अनाडी" है" असे म्हणले गेले असावे.... ;) (बाकी नाडी म्हणले की, वो सात दिन मधील निळू फुलेंचे नाडा आठवल्याशिवाय राहत नाही!) -------------------------------- मी या आणि इतर संकेतस्थळावर केवळ "विकास" याच नावाने वावरतो. त्याच्या मागेपुढे उभ्या (||) आडव्या (=), तिरप्या (\\ //) आदी कुठल्याच प्रकाराच्या रेषा नसतात. त्या अर्थाने माझी कुठेही शाखा नाही. :-)

चित्रा 16/03/2010 - 05:30
ओकसाहेब जेव्हा नाडी हा विषय सोडून (वगळता) जे काही लिहीतात ते वाचण्यासारखे असते. नाडीवरून विडंबन आले तरी पुढील नाडीग्रंथ येणारच नाही याची ग्यारंटी देता येईल असे वाटत नाही :)

In reply to by चित्रा

शहराजाद 17/04/2011 - 22:08
ओकसाहेब जेव्हा नाडी हा विषय सोडून (वगळता) जे काही लिहीतात ते वाचण्यासारखे असते.
असंच म्हणते.
नाडीवरून विडंबन आले तरी पुढील नाडीग्रंथ येणारच नाही याची ग्यारंटी देता येईल असे वाटत नाही
चित्रतैचा अंदाज खरा ठरला. :( ओकसाहेब, नाडीचर्‍हाटाचा कंटाळा आला हो.

डावखुरा 17/03/2010 - 14:42
ओक साहेबान्चे नाडीरसायन काही अजबच आहे बुवा...... ज्यामुळे घासकडविन्च्या विङ्म्बन प्रज्ञेला धुमारे फुट्ले..... विड्म्बन तर उत्तमच झाले आहे परन्तु त्यावरील चर्चा एकुन......... हहपुवा$$$=)) =)) =)) "राजे!"

शशिकांत ओक 17/03/2010 - 21:42
उत्तर देऊनि 'बिका'ट प्रश्नी, मुख्य प्रश्न नुत्तरला विज्ञानाचा 'प्रकाश' का घ्या, जर 'तात्या' पाठीला 'तुका म्हणे' मी हात टेकले, 'राघव'शरणही येता
राजेश जी, आपल्या विडंबनाने बहार आणली. नाडी ग्रंथांवरील आधारित माझे काही थोडेसे लिखाण वाचून - दमायला - थकायला झाले - काही शरण आले काहींनी हात टेकले. यात नवे काही नाही हो. मित्र हो, मला ही नाडीग्रंथांच्या विचारांच्या गूहेतून जाताना असाच थकवा आला. आपणाला त्रिमितीच्या जगाच्या भिंगातून, मानवीबुद्धीने सर्व शोधायची सवय झाली आहे. जग फक्त ३ मितीचेच आहे वा असावे असा विचार सोडला व मानवी इंद्रियांच्या शक्तीच्याशिवाय अन्य काही शक्ती ही या विश्वात आपला प्रभाव पाडू शकतात हे तत्वतः मानले तर.... या विचारातून जेंव्हा मी विनम्र होऊन महर्षींना वंदन केले. मग सारे चित्र बदलले. आपणही प्रयोग करून पहा. बिकाला व येथील सर्वांना उत्तरे रेडीमेड हवीत. आपल्या बाजूने आधी चार पावले टाका मग मदतीचा हात मागा. महर्षी नक्की काही करतात असा आपणाला अनुभव येईल मग जग जरी आपल्याला विरोधत गेले तरी आपणाला त्याचे काही वाटणार नाही. असा आत्मविश्वास येईल. नाडी ग्रंथांतील भविष्यकथन नेहमीच सत्य होत नाही यात शंका नाही पण त्या मागे काही कारणे असू शकतात असे निदान जाणवेल. आव्हानाच्या, तुच्छतेच्या, तिरकस वाक् बाणांनी मला मुर्ख ठरवून काही मिळणार नाही. सुरवातीला थोडे ऑकवर्ड वाटेल मला ही तसे झाले होते. प्रेमाने, आदराने नाडी ग्रंथांच्याकडे पहायला लागा. स्वतःची नाडीपट्टी पहायला मिळाली नाहीत तरी इतरांचे अनुभव पाहून ऐकून आपल्या नवे गवसल्याचा आनंद होईल. असो. नाडीग्रंथांवर अधिक माहितीसाठी http://www.naadiguruonweb.org/ शशिकांत

In reply to by शशिकांत ओक

ओकसाहेब, सर्वप्रथम आपल्या खिलाडूवृत्तीबद्दल आभार. तुम्हाला प्रिय असणाऱ्या नाडीग्रंथाची व त्या विचारसरणीची खिल्ली उडवली तरी तुम्ही ती किती चांगल्या प्रकारे उडवली आहे याचं कौतुक करू शकता.
आव्हानाच्या, तुच्छतेच्या, तिरकस वाक् बाणांनी मला मुर्ख ठरवून काही मिळणार नाही.
मला हे सांगावंसं वाटतं की तुमची व्यक्तीश: चेष्टा करण्याचा माझा हेतू नव्हता. तुम्ही मांडलेले विचार, ते मांडण्याची पद्धती, व विरोधानंतरही सतत मांडत राहाण्याची चिकाटी यांचीच ती गंमत होती. दुर्दैवाने तुमची नाडीवर जितकी ठाम श्रद्धा आहे तितकाच माझा अविश्वास अवैज्ञानिक सत्यावर आहे. तेव्हा तुम्ही कितीही जेरीला आणलंत तरी मला पुरावा मिळाल्याशिवाय माझा विश्वास बसणार नाही. राजेश

In reply to by शशिकांत ओक

माननिय विंग कमांडर (नि.) श्री. शशिकांत ओक, मी हे नम्रपणे नमूद करू इच्छितो की आपण आपल्या प्रतिसादात बिकाला व येथील सर्वांना उत्तरे रेडीमेड हवीत. आपल्या बाजूने आधी चार पावले टाका मग मदतीचा हात मागा. हे लिहिल्याबद्दल, मी माझा तीव्र निषेध व्यक्त करतो. आपण माझे नाव मुद्दाम घेतले म्हणून मी हे लिहित आहे. माझा नाडी प्रकरणावर विश्वास नाही पण मी प्रामाणिकपणे तो प्रकार एकदा अनुभवू इच्छित होतो. त्या अनुषंगाने मी तुम्हाला काही प्रश्न / मार्गदर्शनपर असे प्रश्न विचारले. त्याचे उत्तर देणे सोडून आपण काही इतर मुद्दे मांडले. ठीक आहे, आपली इच्छा अशी असावी की प्रत्येकाने स्वतः धडपड करून हा अनुभव घ्यावा. मग हे प्रसार / प्रचार वगैरे उपद्व्याप कशाला? साधे सरळ नाडीकेंद्र सुचवायचे सोडून आपण दुसरेच काही सांगत आहात. शिवाय आजवर काही अगदी प्राथमिक प्रश्नांची उत्तरे आपण दिली नाहीयेत. बर्‍याच लोकांनी हे व्यक्त केले आहे. असो... जास्त काही बोलत नाही / लिहित नाही. आपले इप्सित कार्य चालू द्या. सहसा शुभेच्छा देतात पण या कार्यासाठी मी ते ही नाही करू शकत. जाता जाता, वैयक्तिकरित्या न घेणे. आपण काही मत मांडले मी माझे म्हणणे मांडले. आपले नाडी सकट सगळेच लिखाण वाचत असतो. तुमचे इतर लेखन चांगलेच आहे. त्या करता मात्र जरूर शुभेच्छा. आपण आपल्या वरील प्रतिसादात योग्य तो बदल कराल ही अपेक्षा. बिपिन कार्यकर्ते

नरेशकुमार 17/04/2011 - 14:58
कविता वाचुनच ईतका दम लागला. काय सांगु ?
अनेक रस मला माझ्या आत्म्यातून पिळून काढून त्यात घालावे लागले.
कविता बनवनार्‍याला त्याने वाचलेलं (नाडी का काय ते) कीती कष्ट झाले असतील, गॉड नोज !

रमताराम 17/04/2011 - 17:53
झक्कास. सध्या इतर नव्या दमाच्या खेळाडूंमुळे आणि 'भू'मितीय' (अवतरणचिन्हे चुकलेली अथवा विसरलेली नाहीत!) धाग्यांमुळे नाडीचा टीआरपी कमी झाला होता . हा धागा वर आल्याने तो अंमळ सुधारेल अशी आशा आहे.

शशिकांत ओक 17/04/2011 - 21:22
नाडीची सेनसेक्स शी छेडछाड!
काल-परवापर्यंत घसरणाऱ्या बाजारभावाला इतके उधाण कसे यावर मिपाच्या लोकसभेत हंगामा .... मी मी म्हणणाऱ्या मराठी वरही नाडीने वात आणला असल्याची जोरदार बातमी... भ्रष्टाचाराच्या गाडीचा क्रम डावलून उपरस्त्यावर टाकायसाठी मोहीम हाती घेतलेल्यांनी केलेल्या विलक्षण उपोषणानंतर... नाडी नाडी । हाय हाय ।। असा कंठशोष करून आपला रिता वेळ सत्कारणी लागला असे वाटत असतानाच.... नाडीच्या चटकदार मिसळीला पुन्हा राजेशाही फोडणीने नाडी ग्रंथांच्या टी आर पी ने उसळ खाल्ली... प्रतिसादांच्या बाजारात नाडीची घोडदौड पुढे पुढे होत राहणार यावर... सट्टा बाजार गरम... सेनसेक्स भयभीत...

आज का बरे या कवनाची आठवण यावी? मी तर आता शरण आलो आहे. शरण तुला शशिकांता मी रेऽ शरण तुला शशिकांता मी रेऽ शरण तुला शशिकांता मी रेऽ थकलो बुवा!

शशिकांत ओक 04/07/2011 - 18:15
मित्रा,
मी तर आता शरण आलो आहे.
शरण यायला चढाई कोणी केली होती?
प्रेमाने, आदराने नाडी ग्रंथांच्याकडे पहायला लागा. स्वतःची नाडीपट्टी पहायला मिळाली नाहीत तरी इतरांचे अनुभव पाहून ऐकून आपल्या नवे गवसल्याचा आनंद होईल.
काल-परवापर्यंत घसरणाऱ्या बाजारभावाला इतके उधाण कसे यावर मिपाच्या लोकसभेत हंगामा ...

विसोबा खेचर 15/03/2010 - 20:05
श्रद्धेच्या तू घेता गिरक्या, अंधपणा की आला तर्काचा तुज तोल कळेना, कान बंद तू केला संस्थाळांच्या इंद्रायणि तू, ओकशी नाडीगाथा || ३ || उत्तर देऊनि 'बिका'ट प्रश्नी, मुख्य प्रश्न नुत्तरला विज्ञानाचा 'प्रकाश' का घ्या, जर 'तात्या' पाठीला 'तुका म्हणे' मी हात टेकले, 'राघव'शरणही येता || ५ ||
=)) संपलो रे राजेश..! धन्य आहेस.. :) (ओकसाहेबांचा पाठराखा) तात्या. :)

श्रावण मोडक 15/03/2010 - 20:20
हाहाहाहा... फारच करूण रसात झालं बॉ हे. दोन-चार दगडं मारायची ना राव. त्याशिवाय मजा नाही!!! शेवटच्या कडव्यात काढलेत ते चिमटे.

In reply to by श्रावण मोडक

मुक्तसुनीत 15/03/2010 - 21:04
>> फारच करूण रसात झालं बॉ हे पुढील कामांकरता घासकडवींकरता काही क्लूज : शृंगार : ग बाई माझ्या चड्डीची नाडी तुटली , बाई ग , बाई ग ! हास्य : सखिशेजारणी तू हसत रहा, नाडिची गाठ ही सुटत अहा ! रौद्र : सोहमहर डमरू बाजे , तुटती नाडी नि काजे ! कारुण्य : वर पहावे बीभत्स : अचकट्ट विचकट्ट, बसली ना नाडी घट्ट शांत : जो जे वांच्छिल तो ते बांधो, नाडिजात अद्भुत : बांधता बांधता चमत्कार झाला , नाडीचा गुंता सुटोनि गेला ! वीर : वेडात नाडीच्या गाठी मारिल्या सात !

In reply to by मुक्तसुनीत

मुसु ने दिलेले नाड्य क्लू लईच भारी! आता सर्वांना नाड्य संगीत रसात भिजायला मिळणार असे आमचे भाकित प्रकाश घाटपांडे आमच्या जालनिशीत जरुर डोकवा.

In reply to by मुक्तसुनीत

मिसळभोक्ता 15/03/2010 - 21:20
वा मुसुशेठ वा !!!! आम्ही नेहमी "लय भारी" एवढा एकच ठेवणीचा प्रतिसाद देतो. पण आपली प्रतिभा (तीही सोमवारी सकाळी?) पाहून आम्ही आज आपल्याला "लयच भारी" हा प्रतिसाद देऊ इच्छितो. पार्टी करा. (मटार उसळ, शिक्रण इत्यादि) एक शिंपल सजेश्चन आहे: प्रत्येक ओळीत नाडी न टाकता, नाडीचा भास झाला, तरी चालेल. उदा. बीभत्सः आज अचानक गाठ पडे, भलत्या वेळी भलतीच कडे -- मिसळभोक्ता (आमचेकडे सर्व प्रकारच्या आनंदांवर विरजण घालून मिळेल.)

In reply to by श्रावण मोडक

Nile 16/03/2010 - 02:44
वरच्या तीनही प्रतिसांदांना अनुमोदन. हहपुवा. (पट्टा घट्ट बांधणारा)

In reply to by मुक्तसुनीत

चतुरंग 15/03/2010 - 21:34
काल संध्याकाळीच 'पाडवा साजरा' झाल्याने गुढी अजून हवेतच दिसते आहे!! ;) (कडुलिंब)चतुरंग

In reply to by मुक्तसुनीत

विसोबा खेचर 15/03/2010 - 23:07
शृंगार : ग बाई माझ्या चड्डीची नाडी तुटली , बाई ग , बाई ग ! बीभत्स : अचकट्ट विचकट्ट, बसली ना नाडी घट्ट
आयला, आमचा मुक्तराव पण एकदम फार्मात दिसतोय! अरे तुला विंदा गेल्याचं काही दु:ख आहे की नाही?! :) तात्या.

In reply to by विसोबा खेचर

मिसळभोक्ता 15/03/2010 - 23:51
अरे तात्या, मुसुशेठच्या नाडीत अख्खा अगस्ति ऋषी "ओक"लाय, की त्याला अशाचवेळी प्रतिभेचे धुमारे फुटणार म्हणून. वाटल्यास आपल्या शशिषेठ ला विचार. (षेठ.. कसले जबरा वाटते उच्चारायला. आज बाबूजी हवे होते.) -- मिसळभोक्ता (आमचेकडे सर्व प्रकारच्या आनंदांवर विरजण घालून मिळेल.)

In reply to by मुक्तसुनीत

राघव 16/03/2010 - 00:22
मुसुशेठ, =)) =)) =)) मेलोSSSSSSS सगळे सुटलेत अगदी! राजेशशेठ, शेवटचे कडवे झक्कास!! ह.ह.पु.वा. =)) राघव

In reply to by मुक्तसुनीत

शुचि 16/03/2010 - 04:50
अहो मुसु ते शृंगार रसात चड्डीच्या जागी चोळी घाला हो. तो शृंगार रस न राहता पार अश्लील/उत्तान्/अनवृत्त रस झालाया त्या चड्डी शब्दामुळे. =)) *********************************** we (women) go from mothers to men with no self in between. Once we wanted to be "nice girls". Now we are "nice married ladies" - just like mother.

In reply to by शुचि

तो शृंगार रस न राहता पार अश्लील/उत्तान्/अनवृत्त रस झालाया त्या चड्डी शब्दामुळे मग चोळी घातल्यावर आय मीन चोळी शब्द घातल्यावर काय वेगळे होईल? बिपिन कार्यकर्ते

=)) =)) =)) आता राजेशा जीवनाडीचा कोप होईल तुजवरी. नाडीग्रंथातील मजकुर आपोआप बदलतो हे आम्हास पचले नव्हते. पण नाडीमुळे शब्द आपोआप स्फुरतात हे आता पटले ब्वॉ! अवांतर- या प्रतिभेसाठी कुठले आसव प्राशन करावे प्रकाश घाटपांडे आमच्या जालनिशीत जरुर डोकवा.

In reply to by प्रकाश घाटपांडे

मिसळभोक्ता 15/03/2010 - 20:55
मी आधीच म्हटलं होतं, की हा ग्रासस्टांझाज एक नंबरचा वायझेड आहे, म्हणून. बाकी, नाडीबद्दल बोलाल, तर ओकायचा हक्क शशिकांतशेठकडे आडनावामुळे आहेच. आजकाल, (म्हणजे कंपू हद्दपार झाल्यापासून) मिपावर आमचे मनोरंजन नाडीमुळे होते, हे नक्कीच. प्रकाशकाका, प्रतिभेचा एकाच आसवाशी संबंध आहे. अधिक माहितीसाठी देवकाकांना भेटा, आणि आत्मशोध करा. -- मिसळभोक्ता (आमचेकडे सर्व प्रकारच्या आनंदांवर विरजण घालून मिळेल.)

चतुरंग 15/03/2010 - 20:49
गदिमांच्या कवनाला हात घालण्याचे धारिष्ट्य तुझ्यात उत्पन्न व्हावे, काय हा नाडीचा चमत्कार!! :D ग्रासस्टांझाज*, खल्लास विडंबन झाले आहे!! 'नाडि वाचुनी' ह्या शब्दांतला श्लेष तुफ्फ्फ्फान!!! =)) =)) =)) (थकलेला, नाडलेला)चतुरंग (*शब्दश्रेय -मिभोकाका)

तुका म्हणे 15/03/2010 - 21:00
तुझ्या पुढे देखिल हात टेकले रे बाबा! सगळ्या भावना "ओक"ल्यास :) तु म्हटले तसे : "उद्विग्नता, विमनस्कता, थकवा, हातबल्य" हे सग़ळे भाव कवितेच फक्त नाव वाचुनच चपखल पोचले. :-) - तुक्या

In reply to by तुका म्हणे

औद्विगन्य, वैमनस्क्य,थैकव्य व हातबल्य हे भाव औनाड्यातुन येत नसुन नाड्यातुन येतात असे अनुमान आम्ही काढले आहे. प्रकाश घाटपांडे आमच्या जालनिशीत जरुर डोकवा.

प्राजु 15/03/2010 - 21:34
उत्तर देऊनि 'बिका'ट प्रश्नी, मुख्य प्रश्न नुत्तरला विज्ञानाचा 'प्रकाश' का घ्या, जर 'तात्या' पाठीला 'तुका म्हणे' मी हात टेकले, 'राघव'शरणही येता || ५ || ठ्यॉ ठ्ठ्यॉ!!! - (सर्वव्यापी)प्राजक्ता http://www.praaju.net/

jaypal 15/03/2010 - 21:35
नाडी नही ये मेरा दिल है/ देखो देखो टुटेना/ *************************************************** दुरितांचे तिमीर जोवो/विश्व स्वधर्मसुर्ये पाहो/जो जें वाछील तो तें लाहो/प्राणिजात/

विकास 16/03/2010 - 02:45
"समझने वाले समझ गये है, ना समझे वो "अनाडी" है" असे म्हणले गेले असावे.... ;) (बाकी नाडी म्हणले की, वो सात दिन मधील निळू फुलेंचे नाडा आठवल्याशिवाय राहत नाही!) -------------------------------- मी या आणि इतर संकेतस्थळावर केवळ "विकास" याच नावाने वावरतो. त्याच्या मागेपुढे उभ्या (||) आडव्या (=), तिरप्या (\\ //) आदी कुठल्याच प्रकाराच्या रेषा नसतात. त्या अर्थाने माझी कुठेही शाखा नाही. :-)

चित्रा 16/03/2010 - 05:30
ओकसाहेब जेव्हा नाडी हा विषय सोडून (वगळता) जे काही लिहीतात ते वाचण्यासारखे असते. नाडीवरून विडंबन आले तरी पुढील नाडीग्रंथ येणारच नाही याची ग्यारंटी देता येईल असे वाटत नाही :)

In reply to by चित्रा

शहराजाद 17/04/2011 - 22:08
ओकसाहेब जेव्हा नाडी हा विषय सोडून (वगळता) जे काही लिहीतात ते वाचण्यासारखे असते.
असंच म्हणते.
नाडीवरून विडंबन आले तरी पुढील नाडीग्रंथ येणारच नाही याची ग्यारंटी देता येईल असे वाटत नाही
चित्रतैचा अंदाज खरा ठरला. :( ओकसाहेब, नाडीचर्‍हाटाचा कंटाळा आला हो.

डावखुरा 17/03/2010 - 14:42
ओक साहेबान्चे नाडीरसायन काही अजबच आहे बुवा...... ज्यामुळे घासकडविन्च्या विङ्म्बन प्रज्ञेला धुमारे फुट्ले..... विड्म्बन तर उत्तमच झाले आहे परन्तु त्यावरील चर्चा एकुन......... हहपुवा$$$=)) =)) =)) "राजे!"

शशिकांत ओक 17/03/2010 - 21:42
उत्तर देऊनि 'बिका'ट प्रश्नी, मुख्य प्रश्न नुत्तरला विज्ञानाचा 'प्रकाश' का घ्या, जर 'तात्या' पाठीला 'तुका म्हणे' मी हात टेकले, 'राघव'शरणही येता
राजेश जी, आपल्या विडंबनाने बहार आणली. नाडी ग्रंथांवरील आधारित माझे काही थोडेसे लिखाण वाचून - दमायला - थकायला झाले - काही शरण आले काहींनी हात टेकले. यात नवे काही नाही हो. मित्र हो, मला ही नाडीग्रंथांच्या विचारांच्या गूहेतून जाताना असाच थकवा आला. आपणाला त्रिमितीच्या जगाच्या भिंगातून, मानवीबुद्धीने सर्व शोधायची सवय झाली आहे. जग फक्त ३ मितीचेच आहे वा असावे असा विचार सोडला व मानवी इंद्रियांच्या शक्तीच्याशिवाय अन्य काही शक्ती ही या विश्वात आपला प्रभाव पाडू शकतात हे तत्वतः मानले तर.... या विचारातून जेंव्हा मी विनम्र होऊन महर्षींना वंदन केले. मग सारे चित्र बदलले. आपणही प्रयोग करून पहा. बिकाला व येथील सर्वांना उत्तरे रेडीमेड हवीत. आपल्या बाजूने आधी चार पावले टाका मग मदतीचा हात मागा. महर्षी नक्की काही करतात असा आपणाला अनुभव येईल मग जग जरी आपल्याला विरोधत गेले तरी आपणाला त्याचे काही वाटणार नाही. असा आत्मविश्वास येईल. नाडी ग्रंथांतील भविष्यकथन नेहमीच सत्य होत नाही यात शंका नाही पण त्या मागे काही कारणे असू शकतात असे निदान जाणवेल. आव्हानाच्या, तुच्छतेच्या, तिरकस वाक् बाणांनी मला मुर्ख ठरवून काही मिळणार नाही. सुरवातीला थोडे ऑकवर्ड वाटेल मला ही तसे झाले होते. प्रेमाने, आदराने नाडी ग्रंथांच्याकडे पहायला लागा. स्वतःची नाडीपट्टी पहायला मिळाली नाहीत तरी इतरांचे अनुभव पाहून ऐकून आपल्या नवे गवसल्याचा आनंद होईल. असो. नाडीग्रंथांवर अधिक माहितीसाठी http://www.naadiguruonweb.org/ शशिकांत

In reply to by शशिकांत ओक

ओकसाहेब, सर्वप्रथम आपल्या खिलाडूवृत्तीबद्दल आभार. तुम्हाला प्रिय असणाऱ्या नाडीग्रंथाची व त्या विचारसरणीची खिल्ली उडवली तरी तुम्ही ती किती चांगल्या प्रकारे उडवली आहे याचं कौतुक करू शकता.
आव्हानाच्या, तुच्छतेच्या, तिरकस वाक् बाणांनी मला मुर्ख ठरवून काही मिळणार नाही.
मला हे सांगावंसं वाटतं की तुमची व्यक्तीश: चेष्टा करण्याचा माझा हेतू नव्हता. तुम्ही मांडलेले विचार, ते मांडण्याची पद्धती, व विरोधानंतरही सतत मांडत राहाण्याची चिकाटी यांचीच ती गंमत होती. दुर्दैवाने तुमची नाडीवर जितकी ठाम श्रद्धा आहे तितकाच माझा अविश्वास अवैज्ञानिक सत्यावर आहे. तेव्हा तुम्ही कितीही जेरीला आणलंत तरी मला पुरावा मिळाल्याशिवाय माझा विश्वास बसणार नाही. राजेश

In reply to by शशिकांत ओक

माननिय विंग कमांडर (नि.) श्री. शशिकांत ओक, मी हे नम्रपणे नमूद करू इच्छितो की आपण आपल्या प्रतिसादात बिकाला व येथील सर्वांना उत्तरे रेडीमेड हवीत. आपल्या बाजूने आधी चार पावले टाका मग मदतीचा हात मागा. हे लिहिल्याबद्दल, मी माझा तीव्र निषेध व्यक्त करतो. आपण माझे नाव मुद्दाम घेतले म्हणून मी हे लिहित आहे. माझा नाडी प्रकरणावर विश्वास नाही पण मी प्रामाणिकपणे तो प्रकार एकदा अनुभवू इच्छित होतो. त्या अनुषंगाने मी तुम्हाला काही प्रश्न / मार्गदर्शनपर असे प्रश्न विचारले. त्याचे उत्तर देणे सोडून आपण काही इतर मुद्दे मांडले. ठीक आहे, आपली इच्छा अशी असावी की प्रत्येकाने स्वतः धडपड करून हा अनुभव घ्यावा. मग हे प्रसार / प्रचार वगैरे उपद्व्याप कशाला? साधे सरळ नाडीकेंद्र सुचवायचे सोडून आपण दुसरेच काही सांगत आहात. शिवाय आजवर काही अगदी प्राथमिक प्रश्नांची उत्तरे आपण दिली नाहीयेत. बर्‍याच लोकांनी हे व्यक्त केले आहे. असो... जास्त काही बोलत नाही / लिहित नाही. आपले इप्सित कार्य चालू द्या. सहसा शुभेच्छा देतात पण या कार्यासाठी मी ते ही नाही करू शकत. जाता जाता, वैयक्तिकरित्या न घेणे. आपण काही मत मांडले मी माझे म्हणणे मांडले. आपले नाडी सकट सगळेच लिखाण वाचत असतो. तुमचे इतर लेखन चांगलेच आहे. त्या करता मात्र जरूर शुभेच्छा. आपण आपल्या वरील प्रतिसादात योग्य तो बदल कराल ही अपेक्षा. बिपिन कार्यकर्ते

नरेशकुमार 17/04/2011 - 14:58
कविता वाचुनच ईतका दम लागला. काय सांगु ?
अनेक रस मला माझ्या आत्म्यातून पिळून काढून त्यात घालावे लागले.
कविता बनवनार्‍याला त्याने वाचलेलं (नाडी का काय ते) कीती कष्ट झाले असतील, गॉड नोज !

रमताराम 17/04/2011 - 17:53
झक्कास. सध्या इतर नव्या दमाच्या खेळाडूंमुळे आणि 'भू'मितीय' (अवतरणचिन्हे चुकलेली अथवा विसरलेली नाहीत!) धाग्यांमुळे नाडीचा टीआरपी कमी झाला होता . हा धागा वर आल्याने तो अंमळ सुधारेल अशी आशा आहे.

शशिकांत ओक 17/04/2011 - 21:22
नाडीची सेनसेक्स शी छेडछाड!
काल-परवापर्यंत घसरणाऱ्या बाजारभावाला इतके उधाण कसे यावर मिपाच्या लोकसभेत हंगामा .... मी मी म्हणणाऱ्या मराठी वरही नाडीने वात आणला असल्याची जोरदार बातमी... भ्रष्टाचाराच्या गाडीचा क्रम डावलून उपरस्त्यावर टाकायसाठी मोहीम हाती घेतलेल्यांनी केलेल्या विलक्षण उपोषणानंतर... नाडी नाडी । हाय हाय ।। असा कंठशोष करून आपला रिता वेळ सत्कारणी लागला असे वाटत असतानाच.... नाडीच्या चटकदार मिसळीला पुन्हा राजेशाही फोडणीने नाडी ग्रंथांच्या टी आर पी ने उसळ खाल्ली... प्रतिसादांच्या बाजारात नाडीची घोडदौड पुढे पुढे होत राहणार यावर... सट्टा बाजार गरम... सेनसेक्स भयभीत...

आज का बरे या कवनाची आठवण यावी? मी तर आता शरण आलो आहे. शरण तुला शशिकांता मी रेऽ शरण तुला शशिकांता मी रेऽ शरण तुला शशिकांता मी रेऽ थकलो बुवा!

शशिकांत ओक 04/07/2011 - 18:15
मित्रा,
मी तर आता शरण आलो आहे.
शरण यायला चढाई कोणी केली होती?
प्रेमाने, आदराने नाडी ग्रंथांच्याकडे पहायला लागा. स्वतःची नाडीपट्टी पहायला मिळाली नाहीत तरी इतरांचे अनुभव पाहून ऐकून आपल्या नवे गवसल्याचा आनंद होईल.
काल-परवापर्यंत घसरणाऱ्या बाजारभावाला इतके उधाण कसे यावर मिपाच्या लोकसभेत हंगामा ...
लेखनविषय:
काव्यरस
करुण रस म्हटलं आहे, पण तो फारच पाणचट तर्रीसारखा वाटतो. हे काव्य बरोबर साधण्यासाठी उद्विग्नता, विमनस्कता, थकवा, हातबल्य असे अनेक रस मला माझ्या आत्म्यातून पिळून काढून त्यात घालावे लागले. (गदिमांच्या प्रतिभेला वंदन करून. त्यांच्या ताजमहालाला वीट लावण्याचं धार्ष्ट्य केवळ नाडीकथांचा वीट आल्यामुळेच झालं. मूळ कविता खाली दिलेली आहे) नाडि वाचुनी अति मी दमले, थकले रे शशिकांता!

))तुझ्या रेशमी केसांनी((

तुका म्हणे ·
लेखनविषय:
काव्यरस
संदर्भ: विजूभाऊचा हा मूळ धागा: http://www.misalpav.com/node/11426#comment-182034 रेशमी केसात तुझ्या जीव माझा गुंतला धुंद या काळ्या बटा, अन प्राण घेई मोगरा का आता गमजा करी? तारका नभातल्या भेटीत पहिल्याच तुझ्या, चंद्रमाही लाजला सोडू कसा हा नाद मी, सांग तू माझ्या फुला, प्रेमात तुझ्या भारावलो, सूर ऐसा लागला होतो खुळा, आहे खुळा, भान न त्याचे मला जादू भरले नैन तुझे हे, ठेवती न माझा मला, कळले मला ग प्रेम ते, उमजले का सांग तुला, जेव्हा तुझ्या हातास अलगद, हात माझा स्पर्शला

)तुझ्या रेशमी केसांनी(

राजेश घासकडवी ·

तुझ्या रेशमी केसांनी काय जादूटोणा केला टोण्या वरी शोधता उतारा,जिव घाबरा झाला का या करून गमजा काय सांगावे मनाला भेटीमध्येच पहिल्या,लागे मेंटल्च्या रस्त्याला सोडला हा नाद झाले, नाही झेपणार मला माझी झेप पेगची..तु खंबा रीचवी बैठकिला तरी मी का झालो खुळा का ग आठवले तुला हे वेड घराण्यात असे..माहित नसेल तुला कळायला सारे काही खूप उशीर जाहला केस झडले,दात पडले,जन्म वाया गेला गेल्या झिजून झडून माझ्या रेषा हातातल्या रेषा मस्तकाच्या सा~या आठ्या बनुनी राहिल्या.. राजेश आपली माफि मागुन...

तुझ्या रेशमी केसांनी काय जादूटोणा केला टोण्या वरी शोधता उतारा,जिव घाबरा झाला का या करून गमजा काय सांगावे मनाला भेटीमध्येच पहिल्या,लागे मेंटल्च्या रस्त्याला सोडला हा नाद झाले, नाही झेपणार मला माझी झेप पेगची..तु खंबा रीचवी बैठकिला तरी मी का झालो खुळा का ग आठवले तुला हे वेड घराण्यात असे..माहित नसेल तुला कळायला सारे काही खूप उशीर जाहला केस झडले,दात पडले,जन्म वाया गेला गेल्या झिजून झडून माझ्या रेषा हातातल्या रेषा मस्तकाच्या सा~या आठ्या बनुनी राहिल्या.. राजेश आपली माफि मागुन...
लेखनविषय:
काव्यरस
तुझ्या रेशमी केसांनी : एक सुडंबन विजुभाऊंनी विघडवलेलं सुघडवण्याचा माझा प्रयत्न. मूळ विडंबनाशी एकनिष्ठ राहाण्यासाठी यमक, वृत्त, कवितेचा स्वर व बरेचसे शब्द तेच ठेवलेले आहेत.

बेघर

बेसनलाडू ·

विसोबा खेचर 13/03/2010 - 14:51
आता आधी कौलं घालू की वाचन संपवू इतकाच प्रश्न आहे.
साक्षात कुसुमाग्रजही कौतुक करतील अशी कविता..! खूप आवडली.. जियो...! तात्या.

In reply to by चतुरंग

प्रभो 13/03/2010 - 21:01
असेच म्हणतो. --प्रभो ----------------------------------------------------------------------- काय सांगावे स्वतः विषयी,आहात तुम्ही सूज्ञ !! एका सारखे एकच आम्ही,बाकी सगळे शून्य !! प्रभोवाणी

मदनबाण 13/03/2010 - 19:41
वा. मस्त... :) मदनबाण..... मोती बनून शिंपल्यात राहण्यापेक्षा दवबिंदू होऊन चातकाची तहान भागविणे जास्त श्रेष्ठ. www.mazeyoutube.blogspot.com

प्राजु 13/03/2010 - 22:33
बेला.. सुरेख कविता! जाग येऊन बेघर झालो पुन्हा नि फुटक्या कौलांचा तो ढीग घेतला पुन्हा कवेत. क्लास!! - (सर्वव्यापी)प्राजक्ता http://www.praaju.com/

रेवती 13/03/2010 - 23:45
कविता आवडली रे बेला! दरवर्षी नव्या पुस्तकांना घातलेल्या कव्हरसारखं या पावसातही तुझ्या आठवणींना लपेटून घेतलं मी कवितेत. हे छानच! रेवती

आशिष सुर्वे 13/03/2010 - 23:53
आपली कविता अगदी बेसनाच्या लाडवासारखीच.. ग्वाड आणि पुन्हा पुन्हा आस्वाद घ्यावीशी वाटणारी!! ====================== कोकणी फणस Sachhu.. God of 22 Yards, King of Indian Hearts..

राघव 14/03/2010 - 14:33
काही कविता अशा असतात की ज्यांना प्रतिसाद दिल्यावाचून राहवत नाही! आणिक काय लिहू? ब्येष्टेष्ट! राघव

jaypal 14/03/2010 - 17:18
आवडले ;-) *************************************************** दुरितांचे तिमीर जोवो/विश्व स्वधर्मसुर्ये पाहो/जो जें वाछील तो तें लाहो/प्राणिजात/

सुवर्णमयी 16/03/2010 - 21:16
मुक्तछंद अतिशय प्रभावी (माझ्या कविता मात्र गद्याकडे झुकू लागल्या आहेत..)

विसोबा खेचर 13/03/2010 - 14:51
आता आधी कौलं घालू की वाचन संपवू इतकाच प्रश्न आहे.
साक्षात कुसुमाग्रजही कौतुक करतील अशी कविता..! खूप आवडली.. जियो...! तात्या.

In reply to by चतुरंग

प्रभो 13/03/2010 - 21:01
असेच म्हणतो. --प्रभो ----------------------------------------------------------------------- काय सांगावे स्वतः विषयी,आहात तुम्ही सूज्ञ !! एका सारखे एकच आम्ही,बाकी सगळे शून्य !! प्रभोवाणी

मदनबाण 13/03/2010 - 19:41
वा. मस्त... :) मदनबाण..... मोती बनून शिंपल्यात राहण्यापेक्षा दवबिंदू होऊन चातकाची तहान भागविणे जास्त श्रेष्ठ. www.mazeyoutube.blogspot.com

प्राजु 13/03/2010 - 22:33
बेला.. सुरेख कविता! जाग येऊन बेघर झालो पुन्हा नि फुटक्या कौलांचा तो ढीग घेतला पुन्हा कवेत. क्लास!! - (सर्वव्यापी)प्राजक्ता http://www.praaju.com/

रेवती 13/03/2010 - 23:45
कविता आवडली रे बेला! दरवर्षी नव्या पुस्तकांना घातलेल्या कव्हरसारखं या पावसातही तुझ्या आठवणींना लपेटून घेतलं मी कवितेत. हे छानच! रेवती

आशिष सुर्वे 13/03/2010 - 23:53
आपली कविता अगदी बेसनाच्या लाडवासारखीच.. ग्वाड आणि पुन्हा पुन्हा आस्वाद घ्यावीशी वाटणारी!! ====================== कोकणी फणस Sachhu.. God of 22 Yards, King of Indian Hearts..

राघव 14/03/2010 - 14:33
काही कविता अशा असतात की ज्यांना प्रतिसाद दिल्यावाचून राहवत नाही! आणिक काय लिहू? ब्येष्टेष्ट! राघव

jaypal 14/03/2010 - 17:18
आवडले ;-) *************************************************** दुरितांचे तिमीर जोवो/विश्व स्वधर्मसुर्ये पाहो/जो जें वाछील तो तें लाहो/प्राणिजात/

सुवर्णमयी 16/03/2010 - 21:16
मुक्तछंद अतिशय प्रभावी (माझ्या कविता मात्र गद्याकडे झुकू लागल्या आहेत..)
लेखनविषय:
काव्यरस
दरवर्षी नव्या पुस्तकांना घातलेल्या कव्हरसारखं या पावसातही तुझ्या आठवणींना लपेटून घेतलं मी कवितेत. हळूच दुडले काही दिवस एकमेकांसोबतचे शाकारली स्वप्नांची कौलं नि पडलो जरासा वाचत मजेत नव्या छपराखाली त्याची वाट बघत चवदार शब्दांचे घुटके घेत पण वाचता वाचता डोळा लागताच हा कोसळून गेला धबाधबा माझी फिरकी घेत. जाग येऊन बेघर झालो पुन्हा नि फुटक्या कौलांचा तो ढीग घेतला पुन्हा कवेत. आता आधी कौलं घालू की वाचन संपवू इतकाच प्रश्न आहे. पुन्हा बेघर व्हायची भीती वाटते ना!

पाठलाग

निरन्जन वहालेकर ·
लेखनविषय:
काव्यरस
पाठलाग गुंतुनी इश्कांत तुझिया , वैफल्यता मी ल्यायली. दर्द आठवणींचा उरी, झोप नित्त्याची लोपली ! मरण माझे याच देहि याच डोळा पाहिले, पोहोचलो मरणद्वारी परि,यातनांनी ना त्यागले ! होतो पहुडलो शांत येथे, आज मी सरणावरी, आलीस त्रास देण्या पुन्हा, काढीत माग इथवरी ! निरंजन वहालेकर

भग्न किनारे

जयवी ·

मनीषा 10/03/2010 - 12:12
शांत सागरातही भोवरे नवे नवे वादळे जुनी परी भग्न किनारे नवे वा!!! सुरेख कविता ...

मदनबाण 10/03/2010 - 12:38
सुरेख... बोलणे नको नको मौन सुखद वाटते विचारही मनी नको रितेच मुक्त वाटते वा... :) मदनबाण..... मोती बनून शिंपल्यात राहण्यापेक्षा दवबिंदू होऊन चातकाची तहान भागविणे जास्त श्रेष्ठ. www.mazeyoutube.blogspot.com

प्राजु 10/03/2010 - 20:12
शांत सागरातही भोवरे नवे नवे वादळे जुनी परी भग्न किनारे नवे सुरेख!! - (सर्वव्यापी)प्राजक्ता http://www.praaju.com/

शुचि 11/03/2010 - 05:36
*********************************** खुद फूल ने भी होंठ किये अपने नीमवा (अर्धवट उघडलेले) चोरी तमाम रंग की तितली के सर ना जाये - परवीन शाकीर

मनीषा 10/03/2010 - 12:12
शांत सागरातही भोवरे नवे नवे वादळे जुनी परी भग्न किनारे नवे वा!!! सुरेख कविता ...

मदनबाण 10/03/2010 - 12:38
सुरेख... बोलणे नको नको मौन सुखद वाटते विचारही मनी नको रितेच मुक्त वाटते वा... :) मदनबाण..... मोती बनून शिंपल्यात राहण्यापेक्षा दवबिंदू होऊन चातकाची तहान भागविणे जास्त श्रेष्ठ. www.mazeyoutube.blogspot.com

प्राजु 10/03/2010 - 20:12
शांत सागरातही भोवरे नवे नवे वादळे जुनी परी भग्न किनारे नवे सुरेख!! - (सर्वव्यापी)प्राजक्ता http://www.praaju.com/

शुचि 11/03/2010 - 05:36
*********************************** खुद फूल ने भी होंठ किये अपने नीमवा (अर्धवट उघडलेले) चोरी तमाम रंग की तितली के सर ना जाये - परवीन शाकीर
लेखनविषय:
काव्यरस
का उदास वाटते नयनी पाणी दाटते असून घोळक्यातही एकलेच वाटते बोलणे नको नको मौन सुखद वाटते विचारही मनी नको रितेच मुक्त वाटते शांत सागरातही भोवरे नवे नवे वादळे जुनी परी भग्न किनारे नवे उजाड माळरान हे गंध, गारवा नको श्रावणातही घना बरसणे तुझे नको जयश्री

जाणीव

तुका म्हणे ·

शुचि 09/03/2010 - 19:09
तू गेल्यावर कधी न घेतल्या, अंगावरती लाटा, वाळू मध्ये तुला शोधतो दूर किनारी आता. ....... मस्त ********************************** To repeat what others have said, requires education, to challenge it, requires brains.- Mary Pettibone Poole

शुचि 09/03/2010 - 19:09
तू गेल्यावर कधी न घेतल्या, अंगावरती लाटा, वाळू मध्ये तुला शोधतो दूर किनारी आता. ....... मस्त ********************************** To repeat what others have said, requires education, to challenge it, requires brains.- Mary Pettibone Poole
लेखनविषय:
काव्यरस
तू गेल्यावर शरद चांदणे, कधीच पडले नाही, पुन्हा पहाटे निशिगंधाचे फूल उमलले नाही. तू गेल्यावर पुन्हा मोगरा, तसाच सजला नाही, खिडकी मधुनी चंद्र चोरटा, कधीच दिसला नाही. तू गेल्यावर हरवून गेली, अंधारातील वाट, आकाशातील ताऱ्यानशी मग, पुन्हा न घडली गाठ. तू गेल्यावर पाउस पहिला, कधीच पडला नाही, अन भिजलेला सूर गळ्यातून कधी उमटला नाही. तू गेल्यावर कधी न घेतल्या, अंगावरती लाटा, वाळू मध्ये तुला शोधतो दूर किनारी आता. तू गेल्यावर वाटे मजला, असे हरवले काही, शोधीत फिरतो इथे तिथे, पण तरी गवसले नाही. - तुका म्हणे