जो ठिकाना हैं हमारा हम वही जा रहेंगे
मिटटी से आये हैं मिटटी से जा मिलेंगे
ये हवा जो चली हैं इसके संग संग बहेंगे
कभी फूलों को चूमेंगे कभी धुल से खेलेंगे
न काफ़िलों से दोस्ती न मंज़िलों से यारी
कहीं भी रुकेंगे, किधरको भी चलेंगे
बेकार न जायेगा रोना यहाँ हमारा
एक आंसूं में से कल हज़ार फुल खिलेंगे
होशवालों को मुबारक बाग़े होश की सैर
हम दश्ते जुनूं में अपने यार से मिलेंगे
(कुणी अनुवाद केला तर उत्तम)
एक नंबर शेवटतर भारीच
जबराट
जबरी!!!!
आह्ह्ह्ह खतरन्नाक
वाहवा!
छान!
नेहमीप्रमाणे... भारिच!
छान ! . कविता म्हणजे गाणे
सुश मय ,पराग देशमुख
नेहमीप्रमाणे उत्तम.
सर्व प्रतिक्रियांशी सहमत...
मान गये आपको !