जो ठिकाना हैं हमारा हम वही जा रहेंगे
मिटटी से आये हैं मिटटी से जा मिलेंगे
ये हवा जो चली हैं इसके संग संग बहेंगे
कभी फूलों को चूमेंगे कभी धुल से खेलेंगे
न काफ़िलों से दोस्ती न मंज़िलों से यारी
कहीं भी रुकेंगे, किधरको भी चलेंगे
बेकार न जायेगा रोना यहाँ हमारा
एक आंसूं में से कल हज़ार फुल खिलेंगे
होशवालों को मुबारक बाग़े होश की सैर
हम दश्ते जुनूं में अपने यार से मिलेंगे
(कुणी अनुवाद केला तर उत्तम)
काव्यरस
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अनुवाद नाही; पण तसंच काहीसं
सुंदर! भावलं…
In reply to अनुवाद नाही; पण तसंच काहीसं by वेल्लाभट
जमलीये
सुंदर
धन्यवाद!
In reply to सुंदर by ज्ञानराम