सुरज (हिंदी-उर्दू रचना आणि तिचा अनुवाद)
न जाने क्या है वहाँ
जो सुरज रोज
सुबह उठकर बिना थके
दिन के चारो पहर की
सारी सीढीया चढ के
ऊपर चला जाता है
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फिर कुछ देर
दुनिया की जानिब
घूरता रहता है
मानो कोई जंग जित ली हो
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कभी कभी लगता है
अपने परछाई को हराने का
जूनून सवार है उसपे
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ओ सुरज, तुम बडे कब होगे?
|-मिसळलेला काव्यप्रेमी-|
(२७/०६/२०१६)
जानिब = दिशा
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(अनुवाद)
असं काय ठेवलंय त्या तिथं,
की हा सूर्य
रोज म्हणजे अगदी रोज
सकाळीसकाळी उठून
जराही न थांबता,
दिवसाच्या चारी प्रहरांचे जिने चढून
हा असा जाऊन बसतो वरती.
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आणि मग थोडा वेळ
बघत बसतो एकटक
दुनियेच्या पसार्या
काव्यरस
मिसळपाव