फुतूर दिमाग के
कभी खत्म नही होते
.
दुधिया कोहरे मे लिपटकर जब रात आये
तो उस कोहरे मे तुम्हारा चेहरा
बुझते हुए
टिमटिमाते बिजली के बल्ब कि तरह
नजर आने लगता है, धुंदलासा
दिमाग उस तस्विर को
आपही मुकम्मल कर लेता है
क्या ये फुतूर है,
या तुम भी मुझे याद कर रही हो?
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फुतूर दिमाग के
कभी खत्म नही होते
.
वक्त की सुई
मुसलसल भागती रहती है
और ये दिमाग है के
तेरे दाये गाल के उस टिप्पेके भवरे में
अटका पडा है
जिसमे पुरी कायनात
घुमती रहती है
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फुतूर दिमाग के
कभी खत्म नही होते
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वैसे तो तुझसे दूर रहकर
खुश नही रह पाता
मगर जब तेरे शहद रंग चहरे पे
खिली कमसिन हसी
ये दिमाग अपनी पोटली से निकालकर
नजर मे भर देता है,
बिन