हम है मताअ-ए-कूचा-ओ बाजारकी तरह
उठती है हर निगाह खरीदार की तरह ...१
इस-कू-ए-तश्नगी मीं बहुत है कि एक जाम
हात आ गया है दौलते-नादार की तरह ...२
वो तो कहीं है और, मगर दिल के आसपास
फ़िरती है कोई शै, निगहे यार की तरह ...३
सीधी है राहे-शौक, पे यूं ही कहीं कहीं
खम हो गयी है गेसू-ए-दिलदार की तरह ...४
अब जा के कुछ खुला ., हुनरे-नाखुने-जुनूं
जख्मे-जिगर हुए लबो-रुख्सार की तरह ...५
"मजरूह", लिख रहे है वो, अहले-वफा का नाम
हम भी खडे हुए है गुनहगार की तरह ...६
महरूह्
मताअ ..मालमत्ता, माल, वस्तू. . कूचा--गल्ली. निगाह ... नजर. तश्नगी ... तहान. नादार ... निर्धन, कंगाल, गरीब. शै ...