(सांगा ढेकुण कुणी हा पाहिला )
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सांगा ढेकुण कुणी हा पाहिला
सांगा ढेकुण कुणी हा पाहिला
झोपुनिया असता खाटवरी हो,
तसे होतो आम्ही गहनविचारी
डंखुनी गेला तो विषधारी
कुठे लपुन बाई हा राहिला
सांगा ढेकुण कुणी हा पाहिला
रात्री जागविती, हे ढेकुणजन हे
सुयोग आम्हालागी तुझा ना साहे
बळेबळे ओढता चादर हो
मालवुनि बघा दिवा खोल्यांचा
डंख पदी झाला मेल्याचा
म्हणे अमल्याजी, देह हा फोडिला
सांगा ढेकुण कुणी हा पाहिला
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मिसळपाव