पोरका
आई घेना मला कुशीत
दुसरे मी काही नाही मागत
जग हे मला पोरका म्हणवते
उसने अश्रु आणून हळह्ळते
रोज तुझ्यासाठी फाट्क पोतरं टाकतो
उपेशेने ते का विणु पाह्तो
वाट बघत मी झोपी जातो
पुन्हा तुला स्वप्नातच पाह्तो
प्रस्तावना: हि माझी अजून एक हिंदी-उर्दू कविता आणि चाणक्यने केलेला तिचा मराठी अनुवाद.
| एक इमारत है संग-ए-मर्मर मे तराशी हुई चौधवी चांद जब महीन कोहरा लिपटकर आता है तब मानो जन्नत की हूर लगती है वो इमारत ----- सुना है के ये इमारत किसी शाह ने अपने बेगम कि याद मे बनवायी है हां... होगा कोई इश्क का मारा ----- जब उसकी यांदे किसी आभिसारों की तरह बरसती होंगी तो वो शाह उस इमारत को देख के क्या सोचता होगा? हां... इश्क का मारा जो ठहराँ ----- फुतुर है ये मगर कल रात फिर उसी महीन कोहरे मे कई हाथोंको देखा था उस इमारत के तआकुब में कोई आदम तो दिखे नही.. |