दीड शतकी धागे - एक अभ्यास
प्रेरणा: ते काय सांगायलाच पाहिजे का!
प्रस्तावना: हि माझी अजून एक हिंदी-उर्दू कविता आणि चाणक्यने केलेला तिचा मराठी अनुवाद.
| एक इमारत है संग-ए-मर्मर मे तराशी हुई चौधवी चांद जब महीन कोहरा लिपटकर आता है तब मानो जन्नत की हूर लगती है वो इमारत ----- सुना है के ये इमारत किसी शाह ने अपने बेगम कि याद मे बनवायी है हां... होगा कोई इश्क का मारा ----- जब उसकी यांदे किसी आभिसारों की तरह बरसती होंगी तो वो शाह उस इमारत को देख के क्या सोचता होगा? हां... इश्क का मारा जो ठहराँ ----- फुतुर है ये मगर कल रात फिर उसी महीन कोहरे मे कई हाथोंको देखा था उस इमारत के तआकुब में कोई आदम तो दिखे नही.. |