जिंदगी क्या राज ही ?
ही गझल माझी नाही.. पण आज कोण जाणे खूप आठवते आहे...
आशुतोषदादा जगणे तुझ्या कडुन शिकावे.. त्या दिवसातली ती प्यास आज जीव कासावीस करून जाते आहे.
सगळी गझल आता आठवत नाहि.. तरिही..
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हे खुदा मुझको बता, येह जिंदगी क्या राज ही ?
आजतक वोह हमसे, हम उनसे नाराज है
कर तलब यु जाम-ए-उल्फत कौन पिता है यहा ?
अश्क पी पी कर बहकना येह मेरा अंदाज है..
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अशीच अजुन एक... कवी आज आठवत नाही..
काव्यरस
मिसळपाव