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जिंदगी क्या राज ही ?

बन्या बापु · · जे न देखे रवी...
लेखनविषय:
काव्यरस
ही गझल माझी नाही.. पण आज कोण जाणे खूप आठवते आहे... आशुतोषदादा जगणे तुझ्या कडुन शिकावे.. त्या दिवसातली ती प्यास आज जीव कासावीस करून जाते आहे. सगळी गझल आता आठवत नाहि.. तरिही.. ------------------------------------------------------------------------------ हे खुदा मुझको बता, येह जिंदगी क्या राज ही ? आजतक वोह हमसे, हम उनसे नाराज है कर तलब यु जाम-ए-उल्फत कौन पिता है यहा ? अश्क पी पी कर बहकना येह मेरा अंदाज है.. ------------------------------------------------------------------------------ अशीच अजुन एक... कवी आज आठवत नाही.. पण गझल कातिल आहे.. ------------------------------------------------------------------------------ जी मला आता चढेना, ती पुन्हा प्यावी कशाला ? तीच ती नावे नकोशी मी पुन्हा घ्यावी कशाला ? चेहेरा मी, कुंचला मी, रंग ही माझेच सारे.. मी कुणाला चेहेर्याची भीक मागावी कशाला.. ? कोण तु होतीस माझी, हे तुला माहीत होते, अन तुझा मी कोण होतो, याद ही द्यावी कशाला.. ? जी मला आता चढेना, ती पुन्हा प्यावी कशाला ? तीच ती नावे नकोशी मी पुन्हा घ्यावी कशाला ? -------------------------------------------------------------------------------

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