| काव्य |
प्रेम कोडगे घेऊन फिरलो |
खिलजि |
| काव्य |
पूर्वी आपण जिथे भेटायचो , तिथे आता एक टपरी झालीय |
खिलजि |
| काव्य |
पावसाविषयी असूया |
पाषाणभेद |
| काव्य |
तर्काच्या सीमेवर तेव्हा |
अनन्त्_यात्री |
| काव्य |
सर्पणाला एकदा पालवी फुटली |
खिलजि |
| काव्य |
पृथ्वी उवाच |
श्रेयासन्जय |
| काव्य |
पावसा पावसा पड रे |
बिपीन सुरेश सांगळे |
| काव्य |
पावसा पावसा पडू नकोस |
बिपीन सुरेश सांगळे |
| काव्य |
कोडगं व्हायचं... |
निओ |
| काव्य |
ऑफिसात जाऊन आलो |
महासंग्राम |
| काव्य |
तुझे शहर |
शिव कन्या |
| काव्य |
कविता पिंपळपान |
अत्रुप्त आत्मा |
| काव्य |
बिल देऊन आलो.. |
गवि |
| काव्य |
असा पाऊस |
पाषाणभेद |
| काव्य |
कुरळ्या बटावर माझ्या |
अविनाशकुलकर्णी |
| काव्य |
(व्हिस्की पिऊन आलो...) |
गड्डा झब्बू |
| काव्य |
(काय करून आलो) |
नाखु |
| काव्य |
(चहा पिऊन आलो..) |
ज्ञानोबाचे पैजार |
| काव्य |
काॅफी पिऊन आले... |
प्राची अश्विनी |
| काव्य |
वजनदार! |
चलत मुसाफिर |
| काव्य |
(मिपा हे, दर्जेदार, लेखनाचे, म्हणे व्यासपीठ आहे) |
ज्ञानोबाचे पैजार |
| काव्य |
डोह-१ |
सागरलहरी |
| काव्य |
डोह |
सागरलहरी |
| काव्य |
कुरबुर झाली |
पाषाणभेद |
| काव्य |
धागा चालेना, धागा पळेना... धागा संथ चाली, काही केल्या पेटेना |
चामुंडराय |
| काव्य |
मळभ..! |
जेनी... |
| काव्य |
दे दे दे दे दे दे |
पाषाणभेद |
| काव्य |
आज मी पुन्हा नापास झालो |
खिलजि |
| काव्य |
गझल : पुन्हा एकदा... |
bhagwatblog |
| काव्य |
शोधत होतो पुन्हा स्वत:ला |
अनन्त्_यात्री |