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चला अंताक्षरी खेळूया....

लेखक माम्लेदारचा पन्खा यांनी रविवार, 13/09/2015 15:59 या दिवशी प्रकाशित केले.
जुनाच पण सदाबहार खेळ !! इच्छुकांनी सहभागी व्हावे...... मेरे मेहबूब कयामत होगी.... आज रुसवा तेरी गलियोमे मोहब्बत होगी... मे री न ज रे तो गि ला क र ती है.... तेरे दिल को भी सनम तुझसे शिकायत होगी.... पुढचे अक्षर "ग"....
काव्यरस
लेखनविषय:

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प्रतिक्रिया

ना ना ना ना मेरी बेरी के बेर मत तोडो कोई काटा चुभ जायेगा.

नील गगनमे उडते बादल आ आ आ धुपमे जलता खेत हमारा करदे तु छाया छुपे हुए ओ चन्चल पन्छी जा जा जा देख अभी हॅ कच्चा दाना पक जाए तु खा

संपादक महोदय हे डबल डबल का येत माहीत नाही कुठे चुक होते कळत नाही कृपया या विनंती प्रतिसादा सहीत सर्व डबल आलेले प्रतिसाद काढुन टा

संपादक महोदय हे डबल डबल का येत माहीत नाही कुठे चुक होते कळत नाही कृपया या विनंती प्रतिसादा सहीत सर्व डबल आलेले प्रतिसाद काढुन टा

गरीब जानके हमको न तुम मिटा देना गरीब जानके तुम्ही ने दरेद दिया है तुम्ही दवा देना , तुम्ही ने

साथी हैथ बढाना साथी रे साथी हाथ बढाना साथी रे एक अकेला थक जायेगा मिल कर हाथ बढाना साथी हाथ बढाना साथी हाथ बढाना साथी रे

रोते रोते हसना सीखो, हसते हसते रोना जितनी चाबी भरी रामने, उतना चले खिलोना रोते रोते हसना सीखो, हसते हसते रोना

झाले की नाही मोदक करून खाऊन ? इकडं एवढी शांतता कशी काय? चला न चं नवीन नवीन गाणं आता :) नही सामने तू ये अलग बात है मेरे पास है तू मेरे साथ है तू

तू मेरा मै तेरी दुनिया जले तो जले तू मेरा मै तेरी दुनिया जले तो जले ना ना , ना ना दिल तेरा ये जान मेरी दुनिया जले तो जले

लारा लप्पा लारा लप्पा, लाई रखदा आडिटप्पा, आडिटप्पा लाई रखदा हो..., देखर झुटे लारे लारा लप्पा लारा लप्पा, लाई रखदा आडिटप्पा, आडिटप्पा लाई रखदा

देख इधर ओ हसिना जून का है महिना डाल जुल्फोका का साया आ रहा है पसिना

ना तो कारवा की तलाश है, ना तो हम सफ़र की तलाश है मेरे शौक-ए-खाना खराब को, तेरी रेहगूजर की तलाश है ना तो कारवा की तलाश है, ना तो हम सफ़र की तलाश है

आम्ही अजुन गिव अप नाही केलंय काही. हे घ्या पुढचं गाणं गा मेरे मन गा, गा मेरे मन गा तू गा मेरे मन गा, गा मेरे मन गा यूँ ही बिताये जा दिन जिंदगी के

कभी तू छलिया लगता है कभी दिवाना लगता है कभी अनाडी लगता है कभी आवारा लगता है तू जो अच्छा समझे ये तुझपे छोडा है तुझसे जीवनभरका मैने नाता जोडा है

गरजत बरसत सावन आयो रे गरजत बरसत सावन आयो रे लायो ना संग मे हमारे बिछड़े बालमवा सखी क्या करू हाए

कभी किताबोंमे फूल रखना कभी दरख्खोंपे नाम लिखना हमे भी याद आज तक वो नझर से हर्फ-ए-सलाम लिखना वो चांद चेहरे वो बेहती बाते सुलगते दिन थे मेहकती राते वो छोटे छोटे कागजोंपर मोहोब्बतों के पयाम लिखना

कहना ही क्या, ये नैन एक अंजान से जो मिले चलने लगे मोहब्बत के जैसे ये सिलसिलें

भुला नही देना जी भुला नही देना जमाना खराब हॅ जमाना खराब हॅ

हा ४५६ वा प्रतिसाद म्हणजे.. समद्या मिपाकरांना मिळुन ४५६ युनीक गाणीही अजुन जमली नाहीतनाहीत... छ्या...

ना कजरे की धार, ना मोतियों के हार ना कोई किया सिंगार, फिर भी कितनी सुंदर हो मन में प्यार भरा, और तन में प्यार भरा जीवन में प्यार भरा, तुम तो मेरे प्रियवर हो ह घ्या..... (अंताक्षरी प्रेमी) अनिरुद्ध