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आवडलेलं काही...

लेखक माधुरी विनायक यांनी शनिवार, 17/10/2015 16:59 या दिवशी प्रकाशित केले.
कविता हा अभिव्यक्तीचा सहजसोपा आणि तितकाच हवाहवासा आविष्कार. मला कविता आवडते. अगदी हायकू, चारोळी, छंदबद्ध आणि मुक्तछंद हे आणि असे सगळेच प्रकार आवडतात. उर्दू शायरी हा असाच जिव्हाळ्याचा विषय. हायकू तीन ओळींचा, त्याहून कमी, म्हणजे दोनच ओळींमध्ये केवढं सांगता येतं, ते सिद्ध करणाऱ्या अशा असंख्य ओळी भेटत राहिल्या. नकळत मनात रेंगाळत राहिल्या. रचनाकार नाही माहिती, पण या ओळींचा उल्लेख आला की त्या शब्दप्रभूंना मनोमन सलाम केला जातो. अशाच काही ओळी देतेय... वाचकांनी भर घातली तर माझा हा आनंदाचा ठेवा आणखी वाढेल... सजदे में आज भी झुकते है सर बस, मौला बदल गया देखो... जरूरत है मुझे कुछ नये नफरत करनेवालों की पुराने वाले तो अब चाहने लगे है मुझे.... मेरे रोने की हकीकत जिस में थी एक मुद्दत तक वो कागज नम रहा... है परेशानियां युं तो बहुत सी जिंदगी में तेरी मोहब्बत सा मगर कोई तंग नही करता.... वो कहानी थी चलती रही मै किस्सा था, खत्म हुआं... दिल से ज्यादा महफूज जगह नही दुनियां मे पर सबसे ज्यादा लापता भी लोग यही से होते है... ऐ इश्क, जन्नत नसीब न होगी तुझे बडे मासूम लोगो को तूने बरबाद किया है.... शौक थे अपने- अपने किसी ने इश्क किया... कोई जिंदा रहा... दीदार की तलब हो तो नजरे जमाएं रखना क्योंकी नकाब हो या नसीब सरकता जरूर है... छीन लेता है हर अजीज चीज मुझसे ऐ किस्मत के देवता, क्या तू भी गरीब है... हवाएं हडताल पर है शायद आज तुम्हारी खुशबू नही आयी... डुबे हुओ को हमने बिठाया था अपनी कश्ती में यारो... और फिर कश्ती का बोझ कह कर हमे ही उतारा गया... कोई तो है मेरे अंदर मुझे सम्भाले हुए... जो इतना बेकरार होते हुए भी बरकरार हूं... जुबाँ न भी बोले तो मुश्किल नही फिक्र तब होती है जब खामोशी भी बोलना छोड दे... वो भी आधी रात को निकलता है और मै भी ... फिर क्यो उसे चाँद और मुझे आवारा कहते है लोग... फिक्र तो उसकी आज भी करते है, बस जिक्र करने का हक नही... काश के वो लौट आए मुझसे ये कहने की तुम कौन होते हो मुझसे बिछडनेवाले... मेरे शब्दो को इतनी दिलचस्पी से ना पढा करो कुछ याद रह गया तो हमे भूल नही पाओगे...
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प्रतिक्रिया

वेडावून गेल्यासारखं झालंय या कवितांनी. आणि अपरिचित रचना अशा समोर येताहेत की त्या इथे देण्याचा मोह आवरता येत नाहीय... पुन्हा एकदा गुलजार... गर्मी सें कल रात अचानक आँख खुली तो जी चाहा के स्विमींग पूल के ठंडे पानीमें एक डुबकी मारके आऊं बाहर आके स्विमींग पूलपें देखा तो हैरान हुआ जाने कबसे बिन पुंछे एक चांद आया और मेरे पुल पे लेटा था और तैर रहा था उफ्फ कल रात बहुत गर्मी थी ! एक नज्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने यही पडी थी बाल्कनी में गोल तिपाही के उपर थी व्हिस्की वाले ग्लास के नीचे रखी थी नज्म के हल्के हल्के सिप मैं घोल रहा था होठों में शायद कोई फोन आया था अन्दर जाके लौटा तो फिर नज्म वहां से गायब थी अब्र के उपर नीचे देखी सुट शफक की जेब टटोली झांक के देखा पार उफक के कही नजर ना आयी वो नज्म मुझे आधी रात आवाज सुनी तो उठ के देखा टांग पे टांग रख के आकाश में चांद तरन्नुम में पढ पढ के दुनिया भर को अपनी कह के नज्म सुनाने बैठा था छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी हम उपलों पर शक्लें गूंथा करते थे आँख लगाकर, कान बनाकर नाक सजा कर पगड़ी वाला, टोपी वाला मेरा उपला तेरा उपला अपने अपने जाने पहचाने नामों से उपले थापा करते थे हँसता खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर गोबर के उपलों पर खेला करता था मेरा उपला सूख गया उसका उपला टूट गया रात को आंगन में जब चूल्हा जलता था हम सारे चूल्हा घेर कर बैठे रहते थे किस उपले की बारी आई किसका उपला राख हुआ वह पंडित था वह मास्टर था इक मुन्ना था इक दशरथ था बरसों बाद श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ आज की रात इस वक़्त के जलते चूल्हे में इक दोस्त का उपला और गया!

ये दिन हैं की यारों का भरोसा भी नही है, वो दिन थे की दुश्मन से भी नफरत ना हुई थी. निशाने उनके कभी चूंकते नहीं देखे, बहोत करीब से जो लोग वार करते हैं. इस शहर में ऐसी भी कयामत ना हुई थी, तनहा थे मगर खुद से तो वहशत ना हुई थी.

आताच वाचनात आलेला एक.... यही सोचकर कोई सफाई ना दी हमने, इल्जाम झूठ ही सही, लगाये तो है तुमने

१ नद्य: समुद्राहितचक्रवाकास्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा, दृप्ता नवप्रावृत्तपुर्ण भोगादृतं स्वभर्तारमुपोषयन्ति. (किष्कींधा कांड, सर्ग-८ श्लोक- ३९) अर्थ- मदमत्त झालेल्या नदीरुप कामातुर स्त्रिया चक्रवाकरुप स्तन उन्नत करुन, पतीकडे जाण्याला आडकाठी करणा‍र्‍या तटरुप वृद्ध स्त्रियांना दुर लोटुन, विषयोपभोग परिपुर्ण घेता यावा म्हणून पुष्पादी शेले पांघरुन उत्सुकतेने सागराकडे निघाल्या आहेत. २ हीनवर बीजवर दोघी त्या गडणी । अखंड कहाणी संसाराची । माझा पति बहु लहान चि आहे । खेळावया जाय पोरांसवे । माझे दु:ख जरी ऎकशील सई । ह्यातारा तो बाई खोकतसे । खेळे सांजवरी बाहेरी तो राहे । वाट मी वो पाहे सेजेवरी । पुर्व पुण्य माझे नाही बाई नीट । बहु होती कष्ट सांगो काई । जवळ मी जाते अंगा अंग लावूं । नेदी जवळ येऊं कंटाळतो । पुर्व सुकृताचा हा चि बाई ठेवा । तुका ह्यणे देवा काय बोल । ( अभंग क्रमांक - ४४९५ ) ३ पानं विड्याची तबकात सुकली आज स्वारी कुणिकडे झुकली ? शेज फुलांची रचुन ठेवली उटी केशरी अंगाला लावली समईत ज्योत सरसावली अशा सुखाला की हो मुकली आज स्वारी कुणिकडे झुकली. ४ उदवृत्तः स्तनभार एष तरले नेत्रे चले भ्रुलते | रागाधिष्ठितमोष्ठपल्लवमिदं कुर्वन्तु नाम व्यथाम | सौभाग्यक्षरपंक्तिरेव लिखिता पुष्यायुधेन स्वयम | मध्यस्थापि करोति तापमधिकं रोमावली केन सा | मराठी अनुवाद स्वभावे उदवृत्त स्तन चपळ हे लोचनयुगे | तसा रागी ओष्ट प्रकृतिकुटिल भूभ्रमण गे | करो पीडा माते तदपि तव सौभाग्यलिपीका | करी कष्टा मध्यस्थित असुनियां रोमलतिका | श्लोक-१५ श्रुंगार-शतक - भर्तुहरि

१ नद्य: समुद्राहितचक्रवाकास्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा, दृप्ता नवप्रावृत्तपुर्ण भोगादृतं स्वभर्तारमुपोषयन्ति. (किष्कींधा कांड, सर्ग-८ श्लोक- ३९) अर्थ- मदमत्त झालेल्या नदीरुप कामातुर स्त्रिया चक्रवाकरुप स्तन उन्नत करुन, पतीकडे जाण्याला आडकाठी करणा‍र्‍या तटरुप वृद्ध स्त्रियांना दुर लोटुन, विषयोपभोग परिपुर्ण घेता यावा म्हणून पुष्पादी शेले पांघरुन उत्सुकतेने सागराकडे निघाल्या आहेत. २ हीनवर बीजवर दोघी त्या गडणी । अखंड कहाणी संसाराची । माझा पति बहु लहान चि आहे । खेळावया जाय पोरांसवे । माझे दु:ख जरी ऎकशील सई । ह्यातारा तो बाई खोकतसे । खेळे सांजवरी बाहेरी तो राहे । वाट मी वो पाहे सेजेवरी । पुर्व पुण्य माझे नाही बाई नीट । बहु होती कष्ट सांगो काई । जवळ मी जाते अंगा अंग लावूं । नेदी जवळ येऊं कंटाळतो । पुर्व सुकृताचा हा चि बाई ठेवा । तुका ह्यणे देवा काय बोल । ( अभंग क्रमांक - ४४९५ ) ३ पानं विड्याची तबकात सुकली आज स्वारी कुणिकडे झुकली ? शेज फुलांची रचुन ठेवली उटी केशरी अंगाला लावली समईत ज्योत सरसावली अशा सुखाला की हो मुकली आज स्वारी कुणिकडे झुकली. ४ उदवृत्तः स्तनभार एष तरले नेत्रे चले भ्रुलते | रागाधिष्ठितमोष्ठपल्लवमिदं कुर्वन्तु नाम व्यथाम | सौभाग्यक्षरपंक्तिरेव लिखिता पुष्यायुधेन स्वयम | मध्यस्थापि करोति तापमधिकं रोमावली केन सा | मराठी अनुवाद स्वभावे उदवृत्त स्तन चपळ हे लोचनयुगे | तसा रागी ओष्ट प्रकृतिकुटिल भूभ्रमण गे | करो पीडा माते तदपि तव सौभाग्यलिपीका | करी कष्टा मध्यस्थित असुनियां रोमलतिका | श्लोक-१५ श्रुंगार-शतक - भर्तुहरि

वादा तो यही था कि कभी फिरसे मिलेंगे पूछने आया हू की भूले तो नही! - गुलजार

वादा तो यही था कि कभी फिरसे मिलेंगे पूछने आया हू की भूले तो नही! - गुलजार

@ माधुरी विनायक @मधुमति, तुमच्या सारखीच मी सुद्धा उर्दू ची भक्त. पण लिपी लिहीता-वाचता न आल्याने शायरीच्या आनंदाला मुकातेय असा वाटणारी. पण माझी समस्या दूर केली rekhta.org ह्या website ने. The founder is a lover of Urdu who could not pursue his interest because of the script. So he has collected lot of shaayari in roman and devnagari script. The website is made so convenient that you can click on any word to know it's meaning instantly. Right now, it is the largest collection of urdu poetry... Lot of other features too... PLEASE DO VISIT!

In reply to by झकास

तुम्ही सुचवलेल्या संस्थळाला नक्की भेट देणार... वर उल्लेख केल्याप्रमाणे डॉ. विनय वाईकरांचं गजल दर्पण हे अफलातून पुस्तक विशेष वाचनीय. यात असंख्य शेर, मराठी भावानुवादासह दिले आहेत. अभ्यासपूर्ण लेखन. नक्की आवडेल तुम्हाला. काही रचनांचं रसग्रहणही या पुस्तकात वाचल्याचं आठवतंय. आवडेल तुम्हाला.

In reply to by माधुरी विनायक

आहे माझ्याकडे गजल दर्पण. खरंच खूप छान आहे. मी त्याची किती पारायणं केली असतील त्याला मर्यादा नाही. भावानुवाद असू शकतो हे मला ह्या पुस्तकामुळेच कळलं.

देखा हुआ सा कुछ है, सोचा हुआ सा कुछ , हर वक्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ होता है यु भी रास्ता खुलता नही कही, जंगल सा फ़ैल जाता है, खोया हुआ सा कुछ साहील की गिली रेत पर बच्चो के खेल सा, हर वक्त मुझ मे बसता बिखरता हुआ सा कुछ बेसन की सौंधी रोटीपर खट्टी चटनी जैसी मॉ याद आती है, चौका, बासन, चिमटा, फ़ुंकनी जैसी मॉ बान की खुर्री खाट के उपर हर आहट पर कान धरे आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी मॉ चिडीयोकी चहकार ने गुंजे, राधा मोहन अली अली मुर्गे की आवाज मे बजती, घर की कुंडी जैसी मॉ बीबी, बेटी, बहन, पडोसन, थोडी थोडी सब मे दिनभर एक रस्सी के उपर चलती नटनी जैसी मॉ बांट के अपना चेहरा, माथा, ऑखे जाने कहॉ गई फ़टे पुराने एक अलबम मे चंचल लडकी जैसी मॉ. अपनी अपनी किस्मत है , अपनी अपनी फ़ितरत है खुशियॊ से पामाला कइ है, गम से मालामाल कइ इंसानो का काल पडा है, वक्त कडा है दुनिया पर ऎसे कडे कब वक्त पडे थे, यु तो पडे है काल कई कितने मंजर पिनहॉ है, मदहोशी की गहराइ मे होश का आलम एक मगर, मदहोशी के पाताल कइ. हर रस्ता अनजानासा, हर फ़लसफ़ॉ नादान सा सदीयो पुरानी है मगर , हर पल नयी है जींदगी उसने शादी का जोडा पहनकर सिर्फ़ चुमा था मेरे कफ़नको बस उसी दिन से ये जन्नत की हुरे मुझको दुल्हा बनाए हुए है. जानेवाले कमर को रोके कोइ, शबके पैक-ए-सफ़र को रोके कोइ थक के मेरे जानु पे वो सोया है अभी, रोके रोके सहर को रोके कोइ (क्मर-चंद्र , पैक-ए-सफ़र- रात्रीचा दुत ) कर रहा था गमे जहॉ का हिसाब आज तुम बेहिसाब याद आए ऎ रहरवान-ए-राह ए मोहब्बत चले चलो इस रहगुजर मे साया-ए-दीवारो दर नही क्यो कर ना सोऊ लिपट के तुझसे ए कब्र मैने भी तो जान देके पाया है तुझे ना जाने कौन सा लम्हा बुलाने आ जाए मिलो हर एक से ऎसे की फ़िर मिले ना मिले किसी रइस की महफ़ील का जिक्र क्या है अमीर खुदा के घर भी न जाएंगे बिन बुलाए हुए

फारच छान.+1 नुकतेच वाचनात आलेले तजुर्बा है मेरा - मिट्टी कि पकड मजबुत होती है संगमरमर पर तो हमने ....पैर फिसलते देखें है इन्सान कि चाहत है कि उडने को पर मिले और परिंदे सोचते है कि रहेने को घर मिले

In reply to by मधुमति

मला सुद्धा त्या website बद्दल कळलं तेंव्हा असंच वाटलं कि आधी का नाही माहीत नव्हती. आणि निव्वळ उर्दुच्या प्रेमापोटी तयार झालेली website असल्याने मी interested असलेल्या सर्वाना सांगत असते. :)

उम्र भर ग़ालिब ये ही भूल करता रहा..........., धूल चेहरे पे थी और आईना साफ़ करता रहा ! खूबसूरत क्या कह दिया उनको, हमको छोड़ कर वो शीशे की हो गई, "झूठ,लालच,और फरेब से परे है... खुदा का शुक्र है, आइने आज भी खरे हैं........!!

ना पिने का शौक था ना पिलाने का ना पिने का शौक था ना पिलाने का हमे तो बस नजरे मिलाने का शौक था पर कम्बखत हम नजरे हि उनसे मिला बैठे जिन्हे नजरो से पिलाने का शौक था ....

उसके चेहरे की चमक के सामने सादा लगा आसमाँ पे चाँद पूरा था, मगर आधा लगा - इफ़्तिख़ार नसीम

तू कहाँ का दाना था, किस हुनर में यकताँ था। बेसबब हुआ ग़ालिब दुश्मन आसमाँ अपना॥ (यकताँ = एखाद्या विषयातील प्रकांडपंडित वगैरे)

मुमकिन है सफ़र हो आसाँ अब साथ भी चलकर देखे, कुछ तुम भी बदलकर देखो कुछ हम भी बदलकर देखे मुझसे नफरत ही करनी है तो इरादे मजबूत रखना, जरा सा भी चूके तो मोहब्बत हो जायेगी………!! पूछा था हाल उन्हॊने बड़ी मुद्दतों के बाद... कुछ गिर गया है आँख में...कहकर हम रो पड़े.

रौनके कहाँ दिखाई देती है अब पहले जैसी.. अखबारों के इश्तेहार बताते हैं.. कोई त्योहार आया है..!! थोड़ी-थोड़ी सर्द हवा और थोड़ा दर्द-ए-दिल.. अंदाज बहुत अच्छा है नवम्बर तेरे आने का..!! सुबह उठते ही तेरे जिस्म की खुशबु आई, शायद रात भर तूने मुझे खवाब मे देखा है…

वो भी शायद रो पडे विरान कागज देखकर, मैने उनको आखरी खत में लिखा कुछ भी नही... आज महफील शांत कैसे है दोस्तों, जख्म भर गये या मोहोब्बत फिर से मिल गयी.. नींद आए या ना आए, चिराग बुझा दिया करो, यूँ रात भर किसी का जलना, हमसे देखा नहीं जाता....!!! तेरे शहर के कारीगर बङे अजीब हैं ए दिल, काँच की मरम्मत करते हैं पत्थर के औजारों से …! आवाज़ का लहज़ा इक पल में बता देता है क़ी रिश्ता कितना गहरा है दौड़ने दो खुले मैदानों में नन्हे क़दमों को ... ज़िन्दगी बहुत भगाती है,बचपन गुज़रने के बाद !! मौसम बहुत सर्द है ऐ-दिल ! चलो कुछ ख्वाहिशों को आग लगाते हैं...

हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया --जिगर मुरादाबादी उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है -- हैदर अली आतिश

कहीं पर दुआ का एक लफ़्ज भी असर कर जाता हैं तो कहीं बरसों की इबादत भी हार जाती हैं

फ़िक्र सबकी करो तो अच्छा है दिल में ज़िंदा रहो तो अच्छा है मौत बन कर खड़ा है कोरोना अपने घर में रहो तो अच्छा है फ़र्ज़ अपना निभा के चलना है और सब को बचा के चलना है फिर मिलेंगे मिलेगा जब मौक़ा आज दूरी बना के चलना है

सध्या चालु असलेल्या चीन वादामुळे , जुन्या आँखे चित्रपटातील ( धर्मेद्र , धुमाळ ) या ओळी आठवल्या . "उस मुल्क की सरहद को कोई छु नही सकता , जिस मुल्क की सरहद की निगेहबान है आँखे" .