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आवडलेलं काही...

म
माधुरी विनायक यांनी
Sat, 10/17/2015 - 16:59  ·  लेख
लेख
कविता हा अभिव्यक्तीचा सहजसोपा आणि तितकाच हवाहवासा आविष्कार. मला कविता आवडते. अगदी हायकू, चारोळी, छंदबद्ध आणि मुक्तछंद हे आणि असे सगळेच प्रकार आवडतात. उर्दू शायरी हा असाच जिव्हाळ्याचा विषय. हायकू तीन ओळींचा, त्याहून कमी, म्हणजे दोनच ओळींमध्ये केवढं सांगता येतं, ते सिद्ध करणाऱ्या अशा असंख्य ओळी भेटत राहिल्या. नकळत मनात रेंगाळत राहिल्या. रचनाकार नाही माहिती, पण या ओळींचा उल्लेख आला की त्या शब्दप्रभूंना मनोमन सलाम केला जातो. अशाच काही ओळी देतेय... वाचकांनी भर घातली तर माझा हा आनंदाचा ठेवा आणखी वाढेल... सजदे में आज भी झुकते है सर बस, मौला बदल गया देखो... जरूरत है मुझे कुछ नये नफरत करनेवालों की पुराने वाले तो अब चाहने लगे है मुझे.... मेरे रोने की हकीकत जिस में थी एक मुद्दत तक वो कागज नम रहा... है परेशानियां युं तो बहुत सी जिंदगी में तेरी मोहब्बत सा मगर कोई तंग नही करता.... वो कहानी थी चलती रही मै किस्सा था, खत्म हुआं... दिल से ज्यादा महफूज जगह नही दुनियां मे पर सबसे ज्यादा लापता भी लोग यही से होते है... ऐ इश्क, जन्नत नसीब न होगी तुझे बडे मासूम लोगो को तूने बरबाद किया है.... शौक थे अपने- अपने किसी ने इश्क किया... कोई जिंदा रहा... दीदार की तलब हो तो नजरे जमाएं रखना क्योंकी नकाब हो या नसीब सरकता जरूर है... छीन लेता है हर अजीज चीज मुझसे ऐ किस्मत के देवता, क्या तू भी गरीब है... हवाएं हडताल पर है शायद आज तुम्हारी खुशबू नही आयी... डुबे हुओ को हमने बिठाया था अपनी कश्ती में यारो... और फिर कश्ती का बोझ कह कर हमे ही उतारा गया... कोई तो है मेरे अंदर मुझे सम्भाले हुए... जो इतना बेकरार होते हुए भी बरकरार हूं... जुबाँ न भी बोले तो मुश्किल नही फिक्र तब होती है जब खामोशी भी बोलना छोड दे... वो भी आधी रात को निकलता है और मै भी ... फिर क्यो उसे चाँद और मुझे आवारा कहते है लोग... फिक्र तो उसकी आज भी करते है, बस जिक्र करने का हक नही... काश के वो लौट आए मुझसे ये कहने की तुम कौन होते हो मुझसे बिछडनेवाले... मेरे शब्दो को इतनी दिलचस्पी से ना पढा करो कुछ याद रह गया तो हमे भूल नही पाओगे...
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प्रतिक्रिया

जिंदगी ...

मधुमति
Sun, 10/25/2015 - 12:48 नवीन
अपनी कीमत उतनी रखिए,जो अदा हो सके ! अगर अनमोल हो गए तो,तन्हा हो जाओगे..! खेल ताश का हो या ज़िन्दगी का, अपना इक्का तभी दिखाना जब सामनेवाला बादशाह निकाले.. !! कुछ यूँ बसर होती है जिंदगी .................. हम ढूंढ़ लेते हैं हर चेहरे में अक्स उनका.......!! ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी कितना अजीब है, ...... शामें कटती नहीं, और साल गुज़रते चले जा रहे हैं....!!
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सुंदर धागा !

मारवा
Sun, 10/25/2015 - 13:21 नवीन
ज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी कितना अजीब है, ...... शामें कटती नहीं, और साल गुज़रते चले जा रहे हैं....!! उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए ! बशीर बद्र कुछ यूँ बसर होती है जिंदगी .................. हम ढूंढ़ लेते हैं हर चेहरे में अक्स उनका.......!! पानी से डरे है सगगजीदा जिस तरह डरता हु आईने से मै के मर्दुमगजीदा हु मै. मिर्जा गालिब. सगगजीदा- कुत्ते का काटा हुआ इन्सान मर्दुमगजीदा- माणसांनी चावलेला ( म्हणजे माणसांनी दुखावलेला/ व्यथित केलेला या अर्थाने ) कुत्रा चावलेला माणुस जसा पाण्याला घाबरतो तसा माणसांनी दुखावलेला स्वतःच्या अक्स (आरशातील प्रतिबिंबा ला घाबरतो.) मिट चले मेरी उम्मीदों की तरह हर्फ़ मगर, आज तक तेरे ख़तों से तेरी ख़ुशबू न गई! तुझ को छु लु तो फिर ए जान-ए-तमन्ना मुझको देर तक अपने बदन से तेरी खुशबु आये. प्यार का पहला खत लिखने मे वक्त तो लगता है नये परिंदो को उडने मे वक्त तो लगता है देके खत मुह देखता है नामाबर कुछ तो पैगाम-ए-जुबानी और है नामाबर- संदेशवाहक कोइ दिनगर जिन्दगानी और है दिल मे हमने अपने ठानी और हे हो चुकी गालिब बलाए सब तमाम एक मर्ग-ए-नागहानी और है. मर्ग-ए-नागहानी- अचानक ओढवणारा अपघात/ मृत्यु.
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वा! मारवा,मधुमती बहार आणली

अजया
Mon, 10/26/2015 - 08:50 नवीन
वा! मारवा,मधुमती बहार आणली तुम्ही या धाग्यात.क्या बात है!
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↩ प्रतिसाद: मारवा

मस्तच!

शब्दबम्बाळ
Mon, 10/26/2015 - 00:15 नवीन
एक से एक शेर वाचायला मिळाले! :)
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ये सच्चे मोती है !

जयन्त बा शिम्पि
Mon, 10/26/2015 - 07:43 नवीन
ये सच्चे मोती है ! फाँकोने तस्वीर बना दी ऑंखोंमें , गोल हो कोई चीज , तो रोटी लगती है ! उस के पाँव की एडी चोटी लगती है, माँ के पाँव के नीचे , जन्नत छोटी लगती है ! बिकने को निकले तो, दाम अक्सर घट जाते है, ना बिकने का इरादा हो तो , दाम बढ जाते है ! आ भी जाओ के हम बुलाते है, तुम बुलाते और जो हम ना आते तो ! डॉ. नवाज देवबंदीचे हे शेर मला फार आवडतात. उन्हे ये जीद थी कि हम बुलाते , हमें ये उम्मीद के वो पुकारे , जुबाँपे है नाम अब भी लेकीन, आवाज मे पड गयी दरारे ! ह्यातली ' खिंचातानी ' अगदी लक्षात घेण्यासारखी आहे.
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वाहवा... मस्त होतोय संग्रह...

माधुरी विनायक
Mon, 10/26/2015 - 12:01 नवीन
कितने झुठे हो गए है हम बचपन में अपनो से रोज रूठते थे आज दुश्मनों से भी मुस्कुरा कर मिलते है... वक्त के एक दौर में इस कदर भूखा था मै कि कुछ न मिला तो धोखा ही खा गया... पलट कर भी न देखो और ना आवाज दो मुझको बडी मुश्कील से सीखा है किसी को अलविदा कहना फरिश्ते ही होंगे जिनका हुआ इश्क मुकम्मल इन्सानों को तो हमने सिर्फ बरबाद होते देखा है... तेरे बाद हमने इस दिल का दरवाजा खोला ही नही वरना बहुत से चाँद आए थे इस घर को सजाने के लिए इश्क का बँटवारा रजामंदी से हुआ चमक उन्होने बटोरी, तडप हम ले आए... कुछ जख्म बरसों बाद भी ताजा रहते है दोस्तो वक्त के पास हर दर्द की दवा नही होती... कितनी झूठी होती है मुहोब्बत की कस्में देखो, तुम भी जिंदा हो और हम भी... अपनी वजहे-बरबादी सुनिये तो मज़े की है ज़िंदगी से यूँ खेले जैसे दूसरे की है रिश्तों की बाते बस दिल तक रखना दिमाग चालाक है, हिसाब लगायेगा
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बालकवींच्या "फुलराणी" ची मैत्रीण - आपल्या पंतांची "रश्मि"

मारवा
Mon, 10/26/2015 - 17:07 नवीन
प्रथम रश्मि- सुमित्रानंदन "पंत" प्रथम रश्मि का आना, रंगिणि , तुने कैसे पहचाना ? कहॉ कहॉ हे बाल विहंगिनी, पाया तुने यह गाना ? सोई थी तु स्वप्न नीड में, पंखो के सुख मे छिपकर , झूम रहे थे , घूम द्वार पर प्रहरी-से जुगनु नाना : शशि किरणो से उतर-उतर कर भू पर कामरुप नभचर, चूम नवल कलियो का मृदु मुख सिखा रहे थे मुसकाना ; स्नेह-हीन तारो के दीपक, श्वास शून्य थे तरु के पात, विचर रहे थे स्वप्न-अवनी मे, तम ने था मंडप ताना; कूक उठी सहसा तरु-वासिनि ! गा तु स्वागत का गाना, किसने तुझको अन्तर्यामिनि ! बतलाया उसका आना ? निकल सृष्टी के अंध-गर्भ से , छाया-तन बहु छाया-हीन, चक्र रच रहे थे खल निशिचर, चला कुहुक टोना-माना; छिपा रही थी मुख शशि बाला, निशि के श्रम से हो श्री-हीन, कमल-क्रोड मे बन्दी था अलि. कोक शोक से दीवाना मुर्च्छित ही इन्द्रियॉ, स्तब्ध जग , जड-चेतन सब एकाकार, शून्य विश्व के उर मे केवल, सॉसो का आना जाना ; तुने ही पहले बहु दर्शिनि ! गाया जागृति का गाना, श्री-सुख-सौरभ का, नभचारिणि, गुंथ दिया ताना बाना ! निराकार तम मानो सहसा, ज्योति-पुंज मे हो साकार, बदल गया द्रुत जगत-जाल मे, धर कर नाम-रुप नाना. सिहर उठे पुलकित हो द्रुम-दल, सुप्त समीरण हुआ अधीर, झलका हात कुसुम-अधरो पर , हिल मोती का सा दाना. खुले पलक, फ़ैली सुवर्ण छवि, जगी सुरभि, डोले मधु बाल, स्प्न्दन, कम्पन औ नव जीवन, सीखा जगन ने अपनाना, प्रथम रश्मि का आना, रंगिणि , तुने कैसे पहचाना ? कहॉ कहॉ हे बाल विहंगिनी, पाया तुने यह गाना ? फुलराणी हिरवे हिरवेगार गालिचे - हरित तृणाच्या मखमालीचे; त्या सुंदर मखमालीवरती - फुलराणी ही खेळत होती. गोड निळ्या वातावरणात - अव्याज-मने होती डोलत; प्रणयचंचला त्या भ्रूलीला - अवगत नव्हत्या कुमारिकेला, आईच्या मांडीवर बसुनी - झोके घ्यावे, गावी गाणी; याहुनि ठावे काय तियेला - साध्या भोळ्या फुलराणीला ? पुरा विनोदी संध्यावात - डोलडोलवी हिरवे शेत; तोच एकदा हासत आला - चुंबून म्हणे फुलराणीला- "छानी माझी सोनुकली ती - कुणाकडे ग पाहत होती ? कोण बरे त्या संध्येतून - हळुच पाहते डोकावून ? तो रविकर का गोजिरवाणा - आवडला अमुच्या राणींना ?" लाजलाजली या वचनांनी - साधी भोळी ती फुलराणी ! आन्दोली संध्येच्या बसुनी - झोके झोके घेते रजनी; त्या रजनीचे नेत्र विलोल - नभी चमकती ते ग्रहगोल ! जादूटोणा त्यांनी केला - चैन पडेना फुलराणीला; निजली शेते, निजले रान, - निजले प्राणी थोर लहान. अजून जागी फुलराणि ही - आज कशी ताळ्यावर नाही ? लागेना डोळ्याशी डोळा - काय जाहले फुलराणीला ? या कुंजातुन त्या कुंजातुन - इवल्याश्या या दिवट्या लावुन, मध्यरात्रिच्या निवान्त समयी - खेळ खेळते वनदेवी ही. त्या देवीला ओव्या सुंदर - निर्झर गातो; त्या तालावर - झुलुनि राहिले सगळे रान - स्वप्नसंगमी दंग होउन! प्रणयचिंतनी विलीनवृत्ति - कुमारिका ही डोलत होती; डुलता डुलता गुंग होउनी - स्वप्ने पाही मग फुलराणी - "कुणी कुणाला आकाशात - प्रणयगायने होते गात; हळुच मागुनी आले कोण - कुणी कुणा दे चुंबनदान !" प्रणयखेळ हे पाहुनि चित्ति - विरहार्ता फुलराणी होती; तो व्योमीच्या प्रेमदेवता - वार्यावरती फिरता फिरता - हळूच आल्या उतरुन खाली - फुलराणीसह करण्या केली. परस्परांना खुणवुनि नयनी - त्या वदल्या ही अमुची राणी ! स्वर्गभूमीचा जुळ्वित हात - नाचनाचतो प्रभातवात; खेळुनि दमल्या त्या ग्रहमाला - हळुहळु लागति लपावयाला आकाशीची गंभीर शान्ती - मंदमंद ये अवनीवरती; विरू लागले संशयजाल, - संपत ये विरहाचा काल. शुभ्र धुक्याचे वस्त्र लेवुनि - हर्षनिर्भरा नटली अवनी; स्वप्नसंगमी रंगत होती - तरीहि अजुनी फुलराणी ती! तेजोमय नव मंडप केला, - लख्ख पांढरा दहा दिशाला, जिकडे तिकडे उधळित मोती - दिव्य वर्हाडी गगनी येती; लाल सुवर्णी झगे घालुनी - हासत हासत आले कोणी; कुणी बांधिला गुलाबि फेटा - झकमणारा सुंदर मोठा! आकाशी चंडोल चालला - हा वाङनिश्चय करावयाला; हे थाटाचे लग्न कुणाचे - साध्या भोळ्या फुलराणीचे ! गाउ लागले मंगलपाठ - सृष्टीचे गाणारे भाट, वाजवि सनई मारुतराणा - कोकिळ घे तानावर ताना! नाचु लागले भारद्वाज, - वाजविती निर्झर पखवाज, नवरदेव सोनेरी रविकर - नवरी ही फुलराणी सुंदर ! लग्न लागते! सावध सारे! सावध पक्षी ! सावध वारे ! दवमय हा अंतपट फिटला - भेटे रविकर फुलराणीला ! वधूवरांना दिव्य रवांनी, - कुणी गाइली मंगल गाणी; त्यात कुणीसे गुंफित होते - परस्परांचे प्रेम ! अहा ते ! आणिक तेथिल वनदेवीही - दिव्य आपुल्या उच्छवासाही लिहीत होत्या वातावरणी - फुलराणीची गोड कहाणी ! गुंतत गुंतत कवि त्या ठायी - स्फुर्तीसह विहराया जाई; त्याने तर अभिषेकच केला - नवगीतांनी फुलराणीला !
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ख्वाब

मधुमति
Tue, 10/27/2015 - 10:43 नवीन
"मुझे मालूम है कि ये ख्वाब झूठे हैं और ख्वाहिशे अधूरी हैं, मगर जिंदा रहने के लिए कुछ गलतफहमियां जरूरी हैं..!!" एक अजीब सी दौड़ है ये ज़िन्दगी, जीत जाओ तो कई अपने पीछे छूट जाते हैं, और हार जाओ तो अपने ही पीछे छोड़ जाते हैं !!! हो सकती है जिन्दगी में मोहोब्बत दोबारा भी ... बस होसला हो ऐक दफा फिर बरबाद होने का !!!
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हर आदमी मे होते है दस

मारवा
Tue, 10/27/2015 - 11:53 नवीन
१ दो चार गाम राह को हम पार देखना हर एक कदम पे एक नयी दीवार देखना हर आदमी मे होते है दस- बीस आदमी जिसको भी देखना हो कइ बार देखना. २ झुम के जब रिंदो ने पीला दी शेख ने चुपके चुपके दुवा दी एक कमी थी ताजमहल मे हमने तेरी तस्वीर लगा दी ३ अपने हाथों की लकीरों में बसा ले मुझको मैं हूँ तेरा तो नसीब अपना बना ले मुझको। मुझसे तू पूछने आया है वफ़ा के माने ये तेरी सादा-दिली मार ना डाले मुझको। ख़ुद को मैं बाँट ना डालूँ कहीं दामन-दामन कर दिया तूने अगर मेरे हवाले मुझको। बादाह फिर बादाह है मैं ज़हर भी पी जाऊँ ‘क़तील’ शर्त ये है कोई बाहों में सम्भाले मुझको। ४ कभी-कभी यूँ भी हमने अपने जी को बहलाया है, जिन बातों को खुद नहीं समझे, औरों को समझाया है, हमसे पूछो इज्ज़तवालों की इज्ज़त का हाल यहाँ, हमने भी इस शहर में रहकर थोड़ा नाम कमाया है, उससे बिछड़े बरसों बीते, लेकिन आज ना जाने क्यूँ? आँगन में हँसते बच्चों को बेकार धमकाया है, कोई मिला तो हाथ मिलाया, कहीं गए तो बातें की, घर से बाहर जब भी निकले, दिन भर बोझ उठाया है.
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फिर उसने मुस्कुरा के देखा

मधुमति
Tue, 10/27/2015 - 21:42 नवीन
फिर उसने मुस्कुरा के देखा मेरी तरफ़..... फिर एक ज़रा सी बात पर जीना पड़ा मुझे। ज़रूरी तो नहीं के शायरी वो ही करे जो इश्क में हो ज़िन्दगी भी कुछ ज़ख्म बेमिसाल दिया करती है…. होसला उसमे भी न था यु मुझसे जुदा होने का, वर्ना काजल उसकी आखो में यु ना फेला होता.
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तू भी नही मैं भी नहीं

मधुमति
Wed, 10/28/2015 - 10:12 नवीन
ग़लतियों से जुदा तू भी नही मैं भी नहीं... दोनो इंसान हैं; खुदा तू भी नही मैं भी नहीं...!! तू मुझे और मैं तुझे इल्जाम देते हैं मगर .. अपने अंदर झाकता तू भी नही मैं भी नहीं !! गलत फहमियों ने कर दी दोनो मैं पैदा दूरियाँ वरना फितरत का बुरा तू भी नहीं मैं भी नही ...!!!
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गलत फहमियों ने कर दी दोनो मैं

प्यारे१
Wed, 10/28/2015 - 11:24 नवीन
गलत फहमियों ने कर दी दोनो मैं पैदा दूरियाँ वरना फितरत का बुरा तू भी नहीं मैं भी नही ...!!! क्या खूब लिखा है! अक्सर गलतफहमियां जित जाती है पुरानी दोस्ती को तोड़ मरोड़ जाती है लेकिन आखिर अच्छा ही होता है दोस्ती का इम्तेहान लिए जाती है
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↩ प्रतिसाद: मधुमति

>>>अक्सर गलतफहमियां जित जाती

प्यारे१
Wed, 10/28/2015 - 20:31 नवीन
>>>अक्सर गलतफहमियां जित जाती है पुरानी दोस्ती को तोड़ मरोड़ जाती है लेकिन आखिर अच्छा ही होता है दोस्ती का इम्तेहान लिए जाती है हे पिल्लू आपलंय बरंका. ;)
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↩ प्रतिसाद: प्यारे१

अहाहा.

अभ्या..
Wed, 10/28/2015 - 20:13 नवीन
अहाहा. मधुमतीतै तुम्ही इतरत्र धाग्यावर दिसत नाहीत पण या धाग्यावर जी रोशनी आणलीय की पूछो मत. तुमच्या संग्रहाला अन दर्दीपणाला सलाम. अप्रतिम..केवळ अप्रतिम
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↩ प्रतिसाद: मधुमति

क्या बात.. क्या बात..

चिगो
Wed, 10/28/2015 - 17:40 नवीन
यहाँ तो महफील सजी हैं, यारों.. एकापेक्षा एक दर्दी लोक येऊन आपला खजाना रिता करताहेत.. आमचे दोन पैसे (शायर आठवत नाहीत) - इन्सान के ख्वाँहीशों की कोई इन्तेहा नहीं, दो गज जमीन चाहीएं, दो गज कफन के बाद.. शगुफ्ताँ लोग भी टुंटे होते है अंदर से, बहुत रोते हैं वो, जिन्हें लतीफे याद रहते हैं.. अनेक वर्षांआधी, जेव्हा 'आँखों में सपने हैं और वहीं बस अपने हैं'च्या जमान्यात लिहीलेली.. 'ये माना कि जितना हमारी किस्मत में नहीं, पर क्या करें कि हार जाना हमारी आदत में नहीं लकीरें जरा धुंधली हैं हाथों की मेरे, ऐ दोस्त मगर लकीरों से मात खाना हमारी तर्बियत में नहीं..'
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सौंदर्य आणि निरागसता आणि त्याचे क्रुरतेने कुस्करले जाणे

मारवा
Wed, 10/28/2015 - 18:45 नवीन
मानवी जीवनातील एकुण सौंदर्य आणि निरागसता याचे प्रतीक असलेली मरमेड मराठीत आपण मत्सकन्या किंवा जलपरी म्हणु या व तिचं असंवेदनशीलता व क्रौर्य यांजकडुन कुस्करलं जाणं याचा अत्यंत संवेदनशील प्रत्यय देणारी पाब्लो नेरुदा ची ही सुंदर कविता पाब्लो नेरुदा च्या कवितेचं मार्क्वेझ च्या ( हे दोन्ही लॅटीन अमेरीकन लिटरेचर चे लायन्स ) इनोसंट इरेंदिरा ( इंदिरा नव्हे ) या असामान्य दिर्घ कथे च्या मध्यवर्ती संकल्पनेशी अत्यंत सुंदर अस साम्य. इरेंदिरा व मरमेड जणु बहीणी च आलटुन पालटुन एकापाठोपाठ वाचल्यास विलक्षण अनुभव येतो मराठीत एक भाषांतर देखील उपलब्ध आहे रंगनाथ पठारेंच पण ते फारसं भावल नाही. Fable of the Mermaid and the Drunks by Pablo Neruda All those men were there inside, when she came in completely naked. They had been drinking: they began to spit. Newly come from the river, she knew nothing. She was a mermaid who had lost her way. The insults flowed down her gleaming flesh. Obscenities drowned her golden breasts. Not knowing tears, she didn't cry tears. Not knowing clothes, she didn't have clothes. They blackened her with burnt corks and cigarette butts, and rolled around laughing on the tavern floor. She did not speak because she couldn't speak. Her eyes were the color of distant love, her twin arms were made of white topaz. Her lips moved, silently, in a coral light, and suddenly she left by that door. Entering the river she was cleaned, shining like a white rock in the rain, and without looking back she swam again swam toward emptiness, swam toward death. .
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हरवलेल्या तारुण्या वर अनेक कविता आहेत पण हे एक गाणं आहे छान !

मारवा
Wed, 10/28/2015 - 18:53 नवीन
आपल्या कडे संध्याछाया भिववीती ह्रद्या आहे त्याच्या थोडं वेगळ्या दिशेने हरवलेल्या युथ वर अनेक सुंदर कविता इंग्रजीत आहेत. पण हे गाणं फार सुंदर मला अत्यंत आवडणांर नॉस्टॅल्जिक करणारं गाणं अत्यंत नादमय अस गीत आहे हे. सहज गातां येतं. हे वाचतांना आपण नकळत कधी ते गुणगुणु लागतो ते कळतं नाहीं OFTEN I think of the beautiful town That is seated by the sea; Often in thought go up and down The pleasant streets of that dear old town, And my youth comes back to me. And a verse of a Lapland song Is haunting my memory still: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." I can see the shadowy lines of its trees, And catch, in sudden gleams, The sheen of the far-surrounding seas, And islands that were the Hesperides Of all my boyish dreams. And the burden of that old song, It murmurs and whispers still: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." I remember the black wharves and the slips, And the sea-tides tossing free; And Spanish sailors with bearded lips, And the beauty and mystery of the ships, And the magic of the sea. And the voice of that wayward song Is singing and saying still: 25 "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." I remember the bulwarks by the shore, And the fort upon the hill; The sunrise gun, with its hollow roar, The drum-beat repeated o'er and o'er, And the bugle wild and shrill. And the music of that old song Throbs in my memory still: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." I remember the sea-fight far away, How it thundered o'er the tide! And the dead captains, as they lay In their graves, o'erlooking the tranquil bay, Where they in battle died. And the sound of that mournful song Goes through me with a thrill: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." I can see the breezy dome of groves, The shadows of Deering's Woods; And the friendships old and the early loves Come back with a Sabbath sound, as of doves In quiet neighborhoods. And the verse of that sweet old song, It flutters and murmurs still: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." I remember the gleams and glooms that dart Across the school-boy's brain; The song and the silence in the heart, That in part are prophecies, and in part Are longings wild and vain. And the voice of that fitful song Sings on, and is never still: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." There are things of which I may not speak; There are dreams that cannot die; There are thoughts that make the strong heart weak, And bring a pallor into the cheek, And a mist before the eye. And the words of that fatal song Come over me like a chill: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." Strange to me now are the forms I meet When I visit the dear old town; But the native air is pure and sweet, And the trees that o'ershadow each well-known street, As they balance up and down, Are singing the beautiful song, Are sighing and whispering still: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts." And Deering's Woods are fresh and fair, And with joy that is almost pain My heart goes back to wander there, And among the dreams of the days that were, I find my lost youth again. And the strange and beautiful song, The groves are repeating it still: "A boy's will is the wind's will, And the thoughts of youth are long, long thoughts."
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हाथ की लकीरे

मधुमति
गुरुवार, 10/29/2015 - 09:22 नवीन
हाथ की लकीरे भी कितनी अज़ीब हैं......, कमबख्त मुट्ठी में हैं, लेकिन काबू में नहीं! हाथ की लकीरे तो सिर्फ सजावट बयां करती है। किस्मत अगर मालूम होती तो इश्क़ ना करते।। हाथ की लकीरें इंसान को मजबूर बना देती है | जीतने के पहले ही हार का आभास करा देती है | कौन कहता है की हाथ की लकीरों में ही किस्मत है, नसीब तो उनका भी होता है जिनकी हथेलिया नहीं होती||
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हल्की-फुल्की सी है जिंदगी, बोझ तो ख्वाहिशों का है...

माधुरी विनायक
गुरुवार, 10/29/2015 - 12:03 नवीन
किसी ने पुछा, वो याद नही करते तुम्हे... तुम क्यों याद करते हों? हमने मुस्कुरा कर कहा, रिश्ता निभानेवाले मुकाबला नही किया करते... अगर वो पुछ ले हमसे की तुम्हे किस बात का गम है तो फिर किस बात का गम है, अगर वो पूछ ले हम से... जान जब प्यारी थी, तब दुश्मन हजारों थे अब मरने का शौक है, तो कातिल नही मिलते... इश्क वो नही, जो तुझे मेरा कर दें... इश्क वो है, जो तुझे किसी और का होने न दें... किसी भी मौसम में खरीद लिजिए दिल के जख्म हमेशा ताजा ही मिलेंगे... तजुर्बा है मेरा, मिट्टी की पकड मजबूत होती है संगेमरमर पर तो हमने पाँव फिसलते देखें है... बस एक छोटी सी दुआ रब से... जिन लम्हों में आप मुस्कुराते हों वो लम्हे कभी खत्म ना हो... बिन धागे की सुई सी है ये जिंदगी सिलती कुछ नही, बस चुभती जा रही है...
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बिन धागे की सुई सी है ये

अभ्या..
गुरुवार, 10/29/2015 - 12:15 नवीन
बिन धागे की सुई सी है ये जिंदगी सिलती कुछ नही, बस चुभती जा रही है...
वाहवा. वाहवा.
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↩ प्रतिसाद: माधुरी विनायक

माफ करा हं...

माधुरी विनायक
गुरुवार, 10/29/2015 - 15:33 नवीन
वेडावून गेल्यासारखं झालंय या कवितांनी. आणि अपरिचित रचना अशा समोर येताहेत की त्या इथे देण्याचा मोह आवरता येत नाहीय... पुन्हा एकदा गुलजार... गर्मी सें कल रात अचानक आँख खुली तो जी चाहा के स्विमींग पूल के ठंडे पानीमें एक डुबकी मारके आऊं बाहर आके स्विमींग पूलपें देखा तो हैरान हुआ जाने कबसे बिन पुंछे एक चांद आया और मेरे पुल पे लेटा था और तैर रहा था उफ्फ कल रात बहुत गर्मी थी ! एक नज्म मेरी चोरी कर ली कल रात किसी ने यही पडी थी बाल्कनी में गोल तिपाही के उपर थी व्हिस्की वाले ग्लास के नीचे रखी थी नज्म के हल्के हल्के सिप मैं घोल रहा था होठों में शायद कोई फोन आया था अन्दर जाके लौटा तो फिर नज्म वहां से गायब थी अब्र के उपर नीचे देखी सुट शफक की जेब टटोली झांक के देखा पार उफक के कही नजर ना आयी वो नज्म मुझे आधी रात आवाज सुनी तो उठ के देखा टांग पे टांग रख के आकाश में चांद तरन्नुम में पढ पढ के दुनिया भर को अपनी कह के नज्म सुनाने बैठा था छोटे थे, माँ उपले थापा करती थी हम उपलों पर शक्लें गूंथा करते थे आँख लगाकर, कान बनाकर नाक सजा कर पगड़ी वाला, टोपी वाला मेरा उपला तेरा उपला अपने अपने जाने पहचाने नामों से उपले थापा करते थे हँसता खेलता सूरज रोज़ सवेरे आकर गोबर के उपलों पर खेला करता था मेरा उपला सूख गया उसका उपला टूट गया रात को आंगन में जब चूल्हा जलता था हम सारे चूल्हा घेर कर बैठे रहते थे किस उपले की बारी आई किसका उपला राख हुआ वह पंडित था वह मास्टर था इक मुन्ना था इक दशरथ था बरसों बाद श्मशान में बैठा सोच रहा हूँ आज की रात इस वक़्त के जलते चूल्हे में इक दोस्त का उपला और गया!
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ये दिन हैं की यारों का भरोसा

नीलमोहर
गुरुवार, 10/29/2015 - 16:15 नवीन
ये दिन हैं की यारों का भरोसा भी नही है, वो दिन थे की दुश्मन से भी नफरत ना हुई थी. निशाने उनके कभी चूंकते नहीं देखे, बहोत करीब से जो लोग वार करते हैं. इस शहर में ऐसी भी कयामत ना हुई थी, तनहा थे मगर खुद से तो वहशत ना हुई थी.
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आताच वाचनात आलेला एक....

प्यारे१
गुरुवार, 10/29/2015 - 16:37 नवीन
आताच वाचनात आलेला एक.... यही सोचकर कोई सफाई ना दी हमने, इल्जाम झूठ ही सही, लगाये तो है तुमने
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१

मारवा
गुरुवार, 10/29/2015 - 21:15 नवीन
१ नद्य: समुद्राहितचक्रवाकास्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा, दृप्ता नवप्रावृत्तपुर्ण भोगादृतं स्वभर्तारमुपोषयन्ति. (किष्कींधा कांड, सर्ग-८ श्लोक- ३९) अर्थ- मदमत्त झालेल्या नदीरुप कामातुर स्त्रिया चक्रवाकरुप स्तन उन्नत करुन, पतीकडे जाण्याला आडकाठी करणा‍र्‍या तटरुप वृद्ध स्त्रियांना दुर लोटुन, विषयोपभोग परिपुर्ण घेता यावा म्हणून पुष्पादी शेले पांघरुन उत्सुकतेने सागराकडे निघाल्या आहेत. २ हीनवर बीजवर दोघी त्या गडणी । अखंड कहाणी संसाराची । माझा पति बहु लहान चि आहे । खेळावया जाय पोरांसवे । माझे दु:ख जरी ऎकशील सई । ह्यातारा तो बाई खोकतसे । खेळे सांजवरी बाहेरी तो राहे । वाट मी वो पाहे सेजेवरी । पुर्व पुण्य माझे नाही बाई नीट । बहु होती कष्ट सांगो काई । जवळ मी जाते अंगा अंग लावूं । नेदी जवळ येऊं कंटाळतो । पुर्व सुकृताचा हा चि बाई ठेवा । तुका ह्यणे देवा काय बोल । ( अभंग क्रमांक - ४४९५ ) ३ पानं विड्याची तबकात सुकली आज स्वारी कुणिकडे झुकली ? शेज फुलांची रचुन ठेवली उटी केशरी अंगाला लावली समईत ज्योत सरसावली अशा सुखाला की हो मुकली आज स्वारी कुणिकडे झुकली. ४ उदवृत्तः स्तनभार एष तरले नेत्रे चले भ्रुलते | रागाधिष्ठितमोष्ठपल्लवमिदं कुर्वन्तु नाम व्यथाम | सौभाग्यक्षरपंक्तिरेव लिखिता पुष्यायुधेन स्वयम | मध्यस्थापि करोति तापमधिकं रोमावली केन सा | मराठी अनुवाद स्वभावे उदवृत्त स्तन चपळ हे लोचनयुगे | तसा रागी ओष्ट प्रकृतिकुटिल भूभ्रमण गे | करो पीडा माते तदपि तव सौभाग्यलिपीका | करी कष्टा मध्यस्थित असुनियां रोमलतिका | श्लोक-१५ श्रुंगार-शतक - भर्तुहरि
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श्रुंगार रस चतुर्थी

मारवा
गुरुवार, 10/29/2015 - 21:16 नवीन
१ नद्य: समुद्राहितचक्रवाकास्तटानि शीर्णान्यपवाहयित्वा, दृप्ता नवप्रावृत्तपुर्ण भोगादृतं स्वभर्तारमुपोषयन्ति. (किष्कींधा कांड, सर्ग-८ श्लोक- ३९) अर्थ- मदमत्त झालेल्या नदीरुप कामातुर स्त्रिया चक्रवाकरुप स्तन उन्नत करुन, पतीकडे जाण्याला आडकाठी करणा‍र्‍या तटरुप वृद्ध स्त्रियांना दुर लोटुन, विषयोपभोग परिपुर्ण घेता यावा म्हणून पुष्पादी शेले पांघरुन उत्सुकतेने सागराकडे निघाल्या आहेत. २ हीनवर बीजवर दोघी त्या गडणी । अखंड कहाणी संसाराची । माझा पति बहु लहान चि आहे । खेळावया जाय पोरांसवे । माझे दु:ख जरी ऎकशील सई । ह्यातारा तो बाई खोकतसे । खेळे सांजवरी बाहेरी तो राहे । वाट मी वो पाहे सेजेवरी । पुर्व पुण्य माझे नाही बाई नीट । बहु होती कष्ट सांगो काई । जवळ मी जाते अंगा अंग लावूं । नेदी जवळ येऊं कंटाळतो । पुर्व सुकृताचा हा चि बाई ठेवा । तुका ह्यणे देवा काय बोल । ( अभंग क्रमांक - ४४९५ ) ३ पानं विड्याची तबकात सुकली आज स्वारी कुणिकडे झुकली ? शेज फुलांची रचुन ठेवली उटी केशरी अंगाला लावली समईत ज्योत सरसावली अशा सुखाला की हो मुकली आज स्वारी कुणिकडे झुकली. ४ उदवृत्तः स्तनभार एष तरले नेत्रे चले भ्रुलते | रागाधिष्ठितमोष्ठपल्लवमिदं कुर्वन्तु नाम व्यथाम | सौभाग्यक्षरपंक्तिरेव लिखिता पुष्यायुधेन स्वयम | मध्यस्थापि करोति तापमधिकं रोमावली केन सा | मराठी अनुवाद स्वभावे उदवृत्त स्तन चपळ हे लोचनयुगे | तसा रागी ओष्ट प्रकृतिकुटिल भूभ्रमण गे | करो पीडा माते तदपि तव सौभाग्यलिपीका | करी कष्टा मध्यस्थित असुनियां रोमलतिका | श्लोक-१५ श्रुंगार-शतक - भर्तुहरि
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गुलजार

चांदणे संदीप
गुरुवार, 10/29/2015 - 23:11 नवीन
वादा तो यही था कि कभी फिरसे मिलेंगे पूछने आया हू की भूले तो नही! - गुलजार
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गुलजार

चांदणे संदीप
गुरुवार, 10/29/2015 - 23:12 नवीन
वादा तो यही था कि कभी फिरसे मिलेंगे पूछने आया हू की भूले तो नही! - गुलजार
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rekhta.org.... DO VISIT !!

झकास
गुरुवार, 10/29/2015 - 23:49 नवीन
@ माधुरी विनायक @मधुमति, तुमच्या सारखीच मी सुद्धा उर्दू ची भक्त. पण लिपी लिहीता-वाचता न आल्याने शायरीच्या आनंदाला मुकातेय असा वाटणारी. पण माझी समस्या दूर केली rekhta.org ह्या website ने. The founder is a lover of Urdu who could not pursue his interest because of the script. So he has collected lot of shaayari in roman and devnagari script. The website is made so convenient that you can click on any word to know it's meaning instantly. Right now, it is the largest collection of urdu poetry... Lot of other features too... PLEASE DO VISIT!
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धन्यवाद...

माधुरी विनायक
Fri, 10/30/2015 - 11:34 नवीन
तुम्ही सुचवलेल्या संस्थळाला नक्की भेट देणार... वर उल्लेख केल्याप्रमाणे डॉ. विनय वाईकरांचं गजल दर्पण हे अफलातून पुस्तक विशेष वाचनीय. यात असंख्य शेर, मराठी भावानुवादासह दिले आहेत. अभ्यासपूर्ण लेखन. नक्की आवडेल तुम्हाला. काही रचनांचं रसग्रहणही या पुस्तकात वाचल्याचं आठवतंय. आवडेल तुम्हाला.
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↩ प्रतिसाद: झकास

आहे माझ्याकडे गजल दर्पण. खरंच

झकास
Fri, 10/30/2015 - 21:09 नवीन
आहे माझ्याकडे गजल दर्पण. खरंच खूप छान आहे. मी त्याची किती पारायणं केली असतील त्याला मर्यादा नाही. भावानुवाद असू शकतो हे मला ह्या पुस्तकामुळेच कळलं.
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↩ प्रतिसाद: माधुरी विनायक

सम मोअर

मारवा
Fri, 10/30/2015 - 08:06 नवीन
देखा हुआ सा कुछ है, सोचा हुआ सा कुछ , हर वक्त मेरे साथ है उलझा हुआ सा कुछ होता है यु भी रास्ता खुलता नही कही, जंगल सा फ़ैल जाता है, खोया हुआ सा कुछ साहील की गिली रेत पर बच्चो के खेल सा, हर वक्त मुझ मे बसता बिखरता हुआ सा कुछ बेसन की सौंधी रोटीपर खट्टी चटनी जैसी मॉ याद आती है, चौका, बासन, चिमटा, फ़ुंकनी जैसी मॉ बान की खुर्री खाट के उपर हर आहट पर कान धरे आधी सोई आधी जागी थकी दुपहरी जैसी मॉ चिडीयोकी चहकार ने गुंजे, राधा मोहन अली अली मुर्गे की आवाज मे बजती, घर की कुंडी जैसी मॉ बीबी, बेटी, बहन, पडोसन, थोडी थोडी सब मे दिनभर एक रस्सी के उपर चलती नटनी जैसी मॉ बांट के अपना चेहरा, माथा, ऑखे जाने कहॉ गई फ़टे पुराने एक अलबम मे चंचल लडकी जैसी मॉ. अपनी अपनी किस्मत है , अपनी अपनी फ़ितरत है खुशियॊ से पामाला कइ है, गम से मालामाल कइ इंसानो का काल पडा है, वक्त कडा है दुनिया पर ऎसे कडे कब वक्त पडे थे, यु तो पडे है काल कई कितने मंजर पिनहॉ है, मदहोशी की गहराइ मे होश का आलम एक मगर, मदहोशी के पाताल कइ. हर रस्ता अनजानासा, हर फ़लसफ़ॉ नादान सा सदीयो पुरानी है मगर , हर पल नयी है जींदगी उसने शादी का जोडा पहनकर सिर्फ़ चुमा था मेरे कफ़नको बस उसी दिन से ये जन्नत की हुरे मुझको दुल्हा बनाए हुए है. जानेवाले कमर को रोके कोइ, शबके पैक-ए-सफ़र को रोके कोइ थक के मेरे जानु पे वो सोया है अभी, रोके रोके सहर को रोके कोइ (क्मर-चंद्र , पैक-ए-सफ़र- रात्रीचा दुत ) कर रहा था गमे जहॉ का हिसाब आज तुम बेहिसाब याद आए ऎ रहरवान-ए-राह ए मोहब्बत चले चलो इस रहगुजर मे साया-ए-दीवारो दर नही क्यो कर ना सोऊ लिपट के तुझसे ए कब्र मैने भी तो जान देके पाया है तुझे ना जाने कौन सा लम्हा बुलाने आ जाए मिलो हर एक से ऎसे की फ़िर मिले ना मिले किसी रइस की महफ़ील का जिक्र क्या है अमीर खुदा के घर भी न जाएंगे बिन बुलाए हुए
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फारच छान.+1

vishal jawale
Fri, 10/30/2015 - 11:38 नवीन
फारच छान.+1 नुकतेच वाचनात आलेले तजुर्बा है मेरा - मिट्टी कि पकड मजबुत होती है संगमरमर पर तो हमने ....पैर फिसलते देखें है इन्सान कि चाहत है कि उडने को पर मिले और परिंदे सोचते है कि रहेने को घर मिले
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धन्यवाद झकास

मधुमति
Fri, 10/30/2015 - 19:53 नवीन
धन्यवाद, होय https://rekhta.org/ या स्थळावर उर्दू शायरी चा खूप चांगला संग्रह आहे,
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मला सुद्धा त्या website बद्दल

झकास
Fri, 10/30/2015 - 21:29 नवीन
मला सुद्धा त्या website बद्दल कळलं तेंव्हा असंच वाटलं कि आधी का नाही माहीत नव्हती. आणि निव्वळ उर्दुच्या प्रेमापोटी तयार झालेली website असल्याने मी interested असलेल्या सर्वाना सांगत असते. :)
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↩ प्रतिसाद: मधुमति

उम्र भर ग़ालिब ये ही भूल करता

मधुमति
Fri, 10/30/2015 - 19:55 नवीन
उम्र भर ग़ालिब ये ही भूल करता रहा..........., धूल चेहरे पे थी और आईना साफ़ करता रहा ! खूबसूरत क्या कह दिया उनको, हमको छोड़ कर वो शीशे की हो गई, "झूठ,लालच,और फरेब से परे है... खुदा का शुक्र है, आइने आज भी खरे हैं........!!
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ना पिने का शौक था ना पिलाने

आवडि
Fri, 10/30/2015 - 20:36 नवीन
ना पिने का शौक था ना पिलाने का ना पिने का शौक था ना पिलाने का हमे तो बस नजरे मिलाने का शौक था पर कम्बखत हम नजरे हि उनसे मिला बैठे जिन्हे नजरो से पिलाने का शौक था ....
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भाऊंचे भाऊ म्हणतो हा धागा छान

भाऊंचे भाऊ
Fri, 10/30/2015 - 21:16 नवीन
भाऊंचे भाऊ म्हणतो हा धागा छान आहे.
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one from me....

झकास
Fri, 10/30/2015 - 21:57 नवीन
उसके चेहरे की चमक के सामने सादा लगा आसमाँ पे चाँद पूरा था, मगर आधा लगा - इफ़्तिख़ार नसीम
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तू शाहीन है परवाज़ है काम

गरजू पाटिल.
Fri, 10/30/2015 - 22:57 नवीन
तू शाहीन है परवाज़ है काम तेरा तेरे सामने आसमां और भी है
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छान धागा आणि प्रतिसाद अप्रतिम आहेत

इडली डोसा
Fri, 10/30/2015 - 23:08 नवीन
अवांतरः - कबीराच्या दोह्यांचाही असा काही धागा आहे का? नसेल तर काढवा का?
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छान धागा

भुमी
Sat, 10/31/2015 - 07:19 नवीन
प्रतिसाद देखील सुंदर
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मिर्झा ग़ालिब...

एस
Sat, 10/31/2015 - 08:41 नवीन
तू कहाँ का दाना था, किस हुनर में यकताँ था। बेसबब हुआ ग़ालिब दुश्मन आसमाँ अपना॥ (यकताँ = एखाद्या विषयातील प्रकांडपंडित वगैरे)
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मुमकिन है सफ़र हो आसाँ अब साथ

मधुमति
Sat, 10/31/2015 - 10:30 नवीन
मुमकिन है सफ़र हो आसाँ अब साथ भी चलकर देखे, कुछ तुम भी बदलकर देखो कुछ हम भी बदलकर देखे मुझसे नफरत ही करनी है तो इरादे मजबूत रखना, जरा सा भी चूके तो मोहब्बत हो जायेगी………!! पूछा था हाल उन्हॊने बड़ी मुद्दतों के बाद... कुछ गिर गया है आँख में...कहकर हम रो पड़े.
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दीपावली

मधुमति
गुरुवार, 11/05/2015 - 07:55 नवीन
रौनके कहाँ दिखाई देती है अब पहले जैसी.. अखबारों के इश्तेहार बताते हैं.. कोई त्योहार आया है..!! थोड़ी-थोड़ी सर्द हवा और थोड़ा दर्द-ए-दिल.. अंदाज बहुत अच्छा है नवम्बर तेरे आने का..!! सुबह उठते ही तेरे जिस्म की खुशबु आई, शायद रात भर तूने मुझे खवाब मे देखा है…
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नव्या पंक्तींची भर घालतेय...

माधुरी विनायक
गुरुवार, 02/25/2016 - 14:30 नवीन
वो भी शायद रो पडे विरान कागज देखकर, मैने उनको आखरी खत में लिखा कुछ भी नही... आज महफील शांत कैसे है दोस्तों, जख्म भर गये या मोहोब्बत फिर से मिल गयी.. नींद आए या ना आए, चिराग बुझा दिया करो, यूँ रात भर किसी का जलना, हमसे देखा नहीं जाता....!!! तेरे शहर के कारीगर बङे अजीब हैं ए दिल, काँच की मरम्मत करते हैं पत्थर के औजारों से …! आवाज़ का लहज़ा इक पल में बता देता है क़ी रिश्ता कितना गहरा है दौड़ने दो खुले मैदानों में नन्हे क़दमों को ... ज़िन्दगी बहुत भगाती है,बचपन गुज़रने के बाद !! मौसम बहुत सर्द है ऐ-दिल ! चलो कुछ ख्वाहिशों को आग लगाते हैं...
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पाण्यात वाहणारे, सुकलेले पान

जयेशसर
गुरुवार, 02/25/2016 - 17:51 नवीन
पाण्यात वाहणारे, सुकलेले पान मी, उडताहि येत नाही, बुडताही येत नाही...
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गंध आल्यावर कळतना, जाईचं फुल

जयेशसर
गुरुवार, 02/25/2016 - 17:54 नवीन
गंध आल्यावर कळतना, जाईचं फुल फुलतयं, तस तिला अलगद काळावं,तिच्यासाठी कुणीतरी झुरतय....
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प्रेमदिन विशेष... :)

शब्दबम्बाळ
Tue, 02/14/2017 - 19:05 नवीन
हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया --जिगर मुरादाबादी उल्टी हो गईं सब तदबीरें कुछ न दवा ने काम किया देखा इस बीमारी-ए-दिल ने आख़िर काम तमाम किया बुत-ख़ाना तोड़ डालिए मस्जिद को ढाइए दिल को न तोड़िए ये ख़ुदा का मक़ाम है -- हैदर अली आतिश
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इतका सुंदर धागा वाचलाच नव्हता

विजुभाऊ
Sat, 06/20/2020 - 20:18 नवीन
इतका सुंदर धागा वाचलाच नव्हता कधी
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दुआ

रागो
गुरुवार, 06/25/2020 - 09:24 नवीन
कहीं पर दुआ का एक लफ़्ज भी असर कर जाता हैं तो कहीं बरसों की इबादत भी हार जाती हैं
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