कव्वाली: एक उत्कट गायनप्रकार - ४था व अंतिम भाग
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हे प्रार्थना गुरुदेव से यह स्वर्गसम संसार हो, अति उच्चतम जिवन बने, परमार्थमय व्यवहार हो, ना हम रहे, अपने लिये, हम को सभी से गर्ज है, गुरुदेव यह आशिष दे, जो सोचनेका फर्ज है ll हम हो पुजारी तत्व के,गुरुदेव के आदेशके सच प्रेम के नित नेम के , सद्धर्म के , सत्कर्म केहो चिढ झुठी शहकी, अन्यायकी अभिमानकी,सेवा कर्म को दासी की, परवाह नही हो जानक