या तुम नहीं या हम नहीं
यारो सितम अब ना सहो
खोलो जुबाँ चूप ना रहो
फिरकापरस्तों से कहो
करते रहो मश्के-सितम
हम ने भी खायी है कसम
या तुम नहीं या हम नहीं
माना फुजूं है हौसला
ये जंग का है मरहल्ला
आसाँ नही है फैसला
इतना तो होगा कम से कम
या तुम नहीं या हम नहीं
रुत अश्क बारी की गयी
अब शोला बारी चाहिये
हर हमला भारी चाहिये
हर जर्ब कारी चाहिये
सर हो के तलवार खम
या तुम नहीं या हम नहीं
तुम हो हिसार अंदर हिसार
और अपनी सफ में इतशाद
है खेल अभी जीत-हार
हम को भी होने दो बहम
या तुम नहीं या हम नहीं
-कैफ़ी आज़मी
सदर कविता ही उर्दू असून तिचा आस्वाद येथील वाचकांनादेखील घेता यावा या हेतूने इथे देत आहे.
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