शोर एक बैरागी के
मन का एक शोर,
न पा सका खुद को
न पा सका भगवान को,
बस टूटता बिखारता
चालता गया,
न थम सका शोर
न थम सकी सासें,
बुंद, बुंद टपकाता शोर
रुह को चिरता शोर,
बैरागी थक गया
शोर से छाल गया,
गुमनाम शोर को
साथ लकेर सो गया............
- अबोली
काव्यरस
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वाह! खूप सुंदर.. म्हटलं तर
छान लिहिलंय!