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पंचशील ..........संभोगाच्या अपूर्ण कथा

लेखक पालीचा खंडोबा १ यांनी शुक्रवार, 04/12/2015 11:12 या दिवशी प्रकाशित केले.

- 1 -

आलास समोर | चढले खूळ |
नजरेत अतर्क्य | विखार दाटलेले |

तुटले टाके | उसवले बंध |
विलग होवुनी | वस्त्र फडफडले |

मनात गाणी | दाटती सूर |
रक्तबंबाळ बोटे | विखुरल्या तारा |

राणीचे उसासे | रखेलीचा टाहो |
निपुत्रिक राजा | चढे सरणावरी |

बाटला देह | विटाळ घेवुनी |
धर्माची स्थापना | कुणी करावी ?

विजयकुमार.........
०७ . ०२ . २०१०, मुंबई

- २ -
भरल्या स्तनात | दुधाच्या गाठी |
मृत गर्भाचे | काळे ओठ |

भुकेल्या देहात | गर्भाची पेरणी |
ठिणग्या उडवती | विझल्या चुली |

ओल्या शरीरास | गर्भाची शिक्षा |
कुलवंतीनीचा जार | चांडाळ ठरला |

सुटता हात | तीन्हीसांजी धूळ |
उष्ण शरीरास | संध्या जाळी |

हुंगून वासनेस | फुल जळाले |
उजवीत माड्या | पुरुष परागंदा |

विजयकुमार.........
०७.०२.२०१०, मुंबई
-३-
डोहाचे फुगवटे | संथ नदीत |
अतृप्त आत्मे | पाण्यात तरंगती |

प्राशुनी वारुणी | नजरचोरटे भय |
पडक्या वाड्यात | भुते चेकाळाती |

बाभळीची फुले | झुलती काटे |
पाशवी वासना | अंगभर दाटलेली |

मायेच्या संगास | गर्भाची आण |
उसळले तारुण्य | बाप देशोधडी |

लावता कवाड | अंधारव्यापी पणती |
फाटक्या चिरंगुटात | स्वप्ने गळालेली |

विजयकुमार.........
०७.०२.२०१०, मुंबई

-४-
खोंडाच्या जत्रेत | एकाकी गाय |
फोडती हंबरडे | पान्हा सुटलेले |

पेटत्या वणव्यात | भिजते जंगल |
मनाविरुध्द घडला | असंगाशी संग |

टाळता नजर | उठतो विखार |
फिरती रानोमाळ | विषग्रंथीविना सर्प |

वाटतात सारे | कैफभिजले काटे |
बृहन्नडेच्या पायी | घुंगरू रुतलेले |

ब्रह्मचार्याच्या शपथेने | बांधलेले शरीर |
फोडती हंबरडा | संभोगाचे कैवारी |

विजयकुमार.........
०७ . ०२ . २०१०, मुंबई

-५-

केसाळ नागाचा | मणी विझला |
सुहासिन सांगते | बिळे लिपा |

घोडेस्वार राजा | आडावारती ओलेत्या |
पौगंडावस्थेतील पोरांच्या | संभोग कथा |

पांघरूणातील उसासे | निजभरली पहाट |
ओलेत्या अंगाचा | खडखडतो रहाट |

ऋतू पाळून | श्रावण मोहरतो |
उध्वस्थ घराचा | कोसळतो मांडव |

मागू नये कुणी | बाळांतीणीचे वस्त्रे |
मोहात अडकले | कारुण्य पुरुषाचे |

विजयकुमार.........
०७. ०२. २०१०, मुंबई

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प्रतिक्रिया

ह्या कविता ? ह्या रटाळ ओळी इकडुन तिकडुन साभार परत आल्यावर मिपाकर्रांच्या माथी मारल्यात.