- 1 -
आलास समोर | चढले खूळ |
नजरेत अतर्क्य | विखार दाटलेले |
तुटले टाके | उसवले बंध |
विलग होवुनी | वस्त्र फडफडले |
मनात गाणी | दाटती सूर |
रक्तबंबाळ बोटे | विखुरल्या तारा |
राणीचे उसासे | रखेलीचा टाहो |
निपुत्रिक राजा | चढे सरणावरी |
बाटला देह | विटाळ घेवुनी |
धर्माची स्थापना | कुणी करावी ?
विजयकुमार.........
०७ . ०२ . २०१०, मुंबई
- २ -
भरल्या स्तनात | दुधाच्या गाठी |
मृत गर्भाचे | काळे ओठ |
भुकेल्या देहात | गर्भाची पेरणी |
ठिणग्या उडवती | विझल्या चुली |
ओल्या शरीरास | गर्भाची शिक्षा |
कुलवंतीनीचा जार | चांडाळ ठरला |
सुटता हात | तीन्हीसांजी धूळ |
उष्ण शरीरास | संध्या जाळी |
हुंगून वासनेस | फुल जळाले |
उजवीत माड्या | पुरुष परागंदा |
विजयकुमार.........
०७.०२.२०१०, मुंबई
-३-
डोहाचे फुगवटे | संथ नदीत |
अतृप्त आत्मे | पाण्यात तरंगती |
प्राशुनी वारुणी | नजरचोरटे भय |
पडक्या वाड्यात | भुते चेकाळाती |
बाभळीची फुले | झुलती काटे |
पाशवी वासना | अंगभर दाटलेली |
मायेच्या संगास | गर्भाची आण |
उसळले तारुण्य | बाप देशोधडी |
लावता कवाड | अंधारव्यापी पणती |
फाटक्या चिरंगुटात | स्वप्ने गळालेली |
विजयकुमार.........
०७.०२.२०१०, मुंबई
-४-
खोंडाच्या जत्रेत | एकाकी गाय |
फोडती हंबरडे | पान्हा सुटलेले |
पेटत्या वणव्यात | भिजते जंगल |
मनाविरुध्द घडला | असंगाशी संग |
टाळता नजर | उठतो विखार |
फिरती रानोमाळ | विषग्रंथीविना सर्प |
वाटतात सारे | कैफभिजले काटे |
बृहन्नडेच्या पायी | घुंगरू रुतलेले |
ब्रह्मचार्याच्या शपथेने | बांधलेले शरीर |
फोडती हंबरडा | संभोगाचे कैवारी |
विजयकुमार.........
०७ . ०२ . २०१०, मुंबई
-५-
केसाळ नागाचा | मणी विझला |
सुहासिन सांगते | बिळे लिपा |
घोडेस्वार राजा | आडावारती ओलेत्या |
पौगंडावस्थेतील पोरांच्या | संभोग कथा |
पांघरूणातील उसासे | निजभरली पहाट |
ओलेत्या अंगाचा | खडखडतो रहाट |
ऋतू पाळून | श्रावण मोहरतो |
उध्वस्थ घराचा | कोसळतो मांडव |
मागू नये कुणी | बाळांतीणीचे वस्त्रे |
मोहात अडकले | कारुण्य पुरुषाचे |
विजयकुमार.........
०७. ०२. २०१०, मुंबई
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इथे एक चांगला मुद्दा आपण
In reply to माझे मत by माहितगार
कवीने स्वतः प्रतिमांच्या
In reply to इथे एक चांगला मुद्दा आपण by संदीप डांगे
सहमत.
In reply to कवीने स्वतः प्रतिमांच्या by माहितगार
विवेचन ठीकाये, पण मुद्दा नेमका हुकलायं
In reply to लोक अॅब्स्ट्रॅक्ट by संदीप डांगे
विवेचन ठीकाये, पण मुद्दा नेमका हुकलायं
In reply to लोक अॅब्स्ट्रॅक्ट by संदीप डांगे
स्पष्टीकरण आवडले.
In reply to लोक अॅब्स्ट्रॅक्ट by संदीप डांगे
शब्दांनाच काय तर
In reply to स्पष्टीकरण आवडले. by बोका-ए-आझम
हो बरोबर पण
In reply to शब्दांनाच काय तर by संदीप डांगे
येस. निरपेक्ष सर्वमान्य
In reply to हो बरोबर पण by बोका-ए-आझम
इथ कुठ्रे आण ता तुम्हि गाय
In reply to लोक अॅब्स्ट्रॅक्ट by संदीप डांगे
अतिशय
In reply to लोक अॅब्स्ट्रॅक्ट by संदीप डांगे
कविता झेपली नाही. पण तुमचा
In reply to लोक अॅब्स्ट्रॅक्ट by संदीप डांगे
जबतक फुकट है मजे लो. प्रितमची
संभोग 'साधता' आला नाही तर भोग
विवेक ठाकूरांनी कवितेत Ph.D केलेली दिसतेयं…
न्यू जॉइनी शिक्षक स्वारी सर
In reply to विवेक ठाकूरांनी कवितेत Ph.D केलेली दिसतेयं… by पर्ण
अहो अलीकडे कोणीही पीएचडी
In reply to विवेक ठाकूरांनी कवितेत Ph.D केलेली दिसतेयं… by पर्ण
चित्रकार ,डिझाइनरांसाठी एक
@विवेक ठाकूर सहमत आहे .
ठाकुरांशी सहमत. मुक्तछंद हा
येस !
In reply to ठाकुरांशी सहमत. मुक्तछंद हा by कहर
कविता