हाक

मंदार दिलीप जोशी जे न देखे रवी...
हाकेसरशी धावून येणं सदैव पाठीशी असणं काहीच पुरेसं नव्हतं मान्य तुझ्या आर्त मूक हाका ऐकू आल्या नाहीत खोट्या हास्यामागचं वेदनांनी होरपळलेलं मन दिसू शकलं नाही मान्य तरीही इतकं सारं बिघडण्याआधी स्वतःहून साद घालणं फार कठीण होतं का? ------------------------------------------------------------------------- पूर्वप्रकाशितः http://mandarvichar.blogspot.in/2015/10/blog-post_31.html अश्विन कृ. ५, शालीवाहन शके १९३७ -------------------------------------------------------------------------
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लेखनविषय:
काव्यरस

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Comments

मोगा नवीन

काव्यगुरु बेफिकिरना दाखवा.

अनिरुद्ध.वैद्य नवीन

मंदार, मस्त जमलीय. हाक कधी कधी मारली जातच नाही. कम्युनिकेशनच्या अभावाने लैच गोंधळ होतो :)