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हाक

लेखक मंदार दिलीप जोशी यांनी शनिवार, 31/10/2015 19:56 या दिवशी प्रकाशित केले.

हाकेसरशी धावून येणं
सदैव पाठीशी असणं
काहीच पुरेसं नव्हतं
मान्य

तुझ्या आर्त मूक हाका
ऐकू आल्या नाहीत
खोट्या हास्यामागचं
वेदनांनी होरपळलेलं मन
दिसू शकलं नाही
मान्य

तरीही इतकं सारं बिघडण्याआधी
स्वतःहून साद घालणं
फार कठीण होतं का?

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पूर्वप्रकाशितः
https://mandarvichar.blogspot.in/2015/10/blog-post_31.html

अश्विन कृ. ५, शालीवाहन शके १९३७
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काव्यरस
लेखनविषय:

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प्रतिक्रिया 12

प्रतिक्रिया

मंदार,

मस्त जमलीय. हाक कधी कधी मारली जातच नाही. कम्युनिकेशनच्या अभावाने लैच गोंधळ होतो :)