दूर देशी गेला बाबा....विडंबन
माननीय सलीलजी कुलकर्णी व संदीपजी खरे यांची माफी मागून, माझ्या एका अत्यंत आवडीच्या त्यांच्याच गाण्यावर माझे विडंबन सादर करत आहे.
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गीतकार : संदीप खरे, गायक : सलील कुळकर्णी
दूरदेशी गेला बाबा, गेली कामावर आई
नीज दाटली डोळ्यांत परी घरी कुणी नाही
कसा चिमणासा जीव, कसाबसा रमवला
चार भिंतीत धावून दिसभरं दमवला
आता पुरे, झोप सोन्या कुणी म्हणतच नाही
नीज दाटली डोळ्यांत तरी घरी कुणी नाही
कशासाठी कोण जाणे देती शाळेमध्ये सुट्टी
कोणी बोलायाला ना
मिसळपाव