हाक
हाकेसरशी धावून येणं
सदैव पाठीशी असणं
काहीच पुरेसं नव्हतं
मान्य
तुझ्या आर्त मूक हाका
ऐकू आल्या नाहीत
खोट्या हास्यामागचं
वेदनांनी होरपळलेलं मन
दिसू शकलं नाही
मान्य
तरीही इतकं सारं बिघडण्याआधी
स्वतःहून साद घालणं
फार कठीण होतं का?
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पूर्वप्रकाशितः
http://mandarvichar.blogspot.in/2015/10/blog-post_31.html
अश्विन कृ. ५, शालीवाहन शके १९३७
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वाह! आवडली!!!
छान
वा!!!!
आवडली
आर्त कविता ,आवडली , कळली.
कविता आवडली
फारच सूचक!
जबराकुस....
सुरेख!
सर्वांना धन्यवाद.
मंदार,
हेच म्हणायचे होते.