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Whatsapp Romantic Shayari

लेखक तृप्ति २३ यांनी शनिवार, 28/12/2019 16:01 या दिवशी प्रकाशित केले.
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खामोश दिल हमारा सब कुछ सह लेता है…. तेरी याद मे शायद ये दिल युही रोये जाता है…
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काव्यरस

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प्रतिक्रिया 115

प्रतिक्रिया

दुआ करो कि मैं उस के लिए दुआ हो जाऊँ वो एक शख़्स जो दिल को दुआ सा लगता है -दिलीप बिरुटे

काश हम भी सलीम के जमाने को महसूस करते अनारकलीसे ना सही , हमी भी किसी को बेइन्तहा प्यार करते यहा तो हरेक सलीम कई कालियोको लेके घुमता हुआ देखा है वोह जमानाही कुछ और था , जिसमे तक्त झुकते हुए देखा है

In reply to by खिलजि

छान ! पण पंचला थोडा गडबडल्यासारखा वाटतो (जाणकार प्रकाश टाकतीलच !)
का लि यो को लेके घुमता हुआ देखा है
शोलेतल्या गब्बरची आठवण आली

ये कहना था उनसे मोहब्बत है मुझको ये कहने में मुझ को ज़माने लगे हैं -दिलीप बिरुटे (उशीर झालेला)

In reply to by प्रा.डॉ.दिलीप बिरुटे

मुझे फिर वहीं याद आने लगे है ! जिन्हे भुलनेमें जमाने लगे है ! ये कहना है उनसे मुहब्बत है मुझको ! ये कहने में उनसे जमाने लगे है ! हरिहरनच्या आवाजात कितीही वेळा ऐकलं तरी कमीच वाटतं :)

कातील हू काबिल नहीं मै माशुका हमें फर्माती थी अरसो गुजर गये उसे जातें हम काबील बनने से रहे हरेक माशुका बेवकूफ नजर आती है जिसे दिल तोहफेमे पेश करें ऐसी कोई शायद बनी हि नहीं

गझल म्हणजे ..... अमृताची अक्षयाची अक्षरांची पालखी गझल म्हणजे गच्च ओल्या भावनांची पालखी ताजसम पृथ्वीवरी या आठवे आश्चर्य ती गझल म्हणजे तर अलौकीक वेदनांची पालखी हीर रांझा कृष्ण राधा मजनु लैला तर कधी गझल मीरेच्या मनातिल यातनांची पालखी वेद रामायण महाभारत महाकाव्यातली गझल शांतीची सुखाची चेतनांची पालखी श्रावणाचा मास वासंतिक बहर वर्षा ऋतू गझल एके उत्सवांची अन् सणांची पालखी - ए.के. शेख

In reply to by चौथा कोनाडा

क्या बात है मस्त.
हीर रांझा कृष्ण राधा मजनु लैला तर कधी गझल मीरेच्या मनातिल यातनांची पालखी
-दिलीप बिरुटे (प्रेमातल्या यातना भोगत असलेला) :)

लोग टूट जाते हैं एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलाने में इति :- बशीर बद्र दिल्लीत जो हिंसाचार झाला आहे त्यात अत्यंत क्रूर घटना समोर आलेली आहे, ती म्हणजे आयबी अधिकारी अंकित शर्मा यांची हत्या ! त्यांना अत्यंत क्रूरपणे ठार करण्यात आले असुन ४ तासात त्यांना ४०० वेळा भोसकले गेले होते ! :( अशी क्रूरता करणार्‍या हैवानांना आयबीवाल्यांनी शोधले पाहिजे आणि त्यांना उभे सोलुन काढले पाहिजे !

मदनबाण.....

आजची स्वाक्षरी :- मराठमोळ्या माधुरी कानिटकर देशाच्या तिसऱ्या महिला लेफ्टनंट

तुम्हारा नाम आया और हम तकने लगे रस्ता, तुम्हारी याद आई, और खिडकी खोल दी हमने. -दिलीप बिरुटे

जाने किस रंग से रूठेगी तबीअत उस की जाने किस ढंग से अब उस को मनाना होगा -दिलीप बिरुटे

In reply to by प्रा.डॉ.दिलीप बिरुटे

नाकाम थीं मेरी सब कोशिशें उस को मनाने की, पता नहीं कहां से सीखी जालिम ने अदाएं रूठ जाने की. .. तुम तरकीब निकालते हो दिल जलाने की, हम तरकीब निकालते है तुम्हे मनाने की.

In reply to by प्रा.डॉ.दिलीप बिरुटे

नाराज़गी नहीं है कोई … मै किससे शिकायत करूँ! . . . . ये रूठने मनाने की रस्म तो अपनों में हुआ करती है!!

रंग लिया है मैने सारे रंगो में अपने आप को.... पता नही कौन से रंग में तुझे पसन्द आ जाऊँ।। -दिलीप बिरुटे (कलरफुल)

मेरी ख़्वाहिश है कि मैं फिर से फ़रिश्ता हो जाऊँ माँ से इस तरह लिपट जाऊँ कि बच्चा हो जाऊँ - मुनव्वर राना

शायर बन न पाये हम की मुहोब्बत मे दिल न टूटा हमारा! एक कसक सी रह गयी दिल मे जिनसे की मुहोब्बत शादी उन्हीसे हो गई!

शायर बन न पाये हम की मुहोब्बत मे दिल न टूटा हमारा! एक कसक सी रह गयी दिल मे जिनसे की मुहोब्बत शादी उन्हीसे हो गई!

उडा देती है नींदे कुछ जिम्मेदारीयां घर की... रात में जागनेवाला हर शख्स आशिक नहीं होता!

In reply to by सुबोध खरे

डॉक्टर साहेब, स्वागत. येऊ द्या अजुन. -दिलीप बिरुटे

मुझे मालूम नहीं मेरी आखों को तलाश किसकी है, तुझे देखता हूँ तो मंजिल का एहसास होता है। - दिलीप बिरुटे

In reply to by टर्मीनेटर

मस्त होता. अर्ज है...लकी फारुकी हसरतचा शेर आहे. अपने कानों में पहन ले मेरे दिल की धड़कन मैं तिरे वास्ते लाया हूँ ले झुमका दिल का -दिलीप बिरुटे

दौर काग़ज़ी था- देर तक ख़तों में जज़्बात महफ़ूज़ रहते थे, मशीनी दौर है- ऊँगली से मिटा दी जाती हैं उम्र भर की यादें

याद करोगे तो याद रहोगे, क्योंकि हमारी भी याददाश्त बहुत कम है. -दिलीप बिरुटे

यहाॅ हर मर्ज की दवा है और हर उदासी का सबब किसम किसम के बंदे है कहते है, मिपा ऐसी जगह है जहाॅ मुर्दे भी जींदा होते है -लखनपुरीया बाकी के बादमे.....

In reply to by कर्नलतपस्वी

मिपा ऐसी जगह है जहाॅ मुर्दे भी जींदा होते है
जिंदगी जिते हैं 'जिंदादिल'... 'मुर्दादिल' क्या खांक जिया करते हैं... (- टर्मीनेटर मिपावाला)

धागा चालू राहायला पाहिजे.. आदरणीय गुलजार: मुझको इतने से काम पे रख लो... जब भी सीने पे झूलता लॉकेट उल्टा हो जाए तो मैं हाथों से सीधा करता रहूँ उसको मुझको इतने से काम पे रख लो... जब भी आवेज़ा उलझे बालों में मुस्कुराके बस इतना सा कह दो आह चुभता है ये अलग कर दो मुझको इतने से काम पे रख लो.... जब ग़रारे में पाँव फँस जाए या दुपट्टा किवाड़ में अटके एक नज़र देख लो तो काफ़ी है मुझको इतने से काम पे रख लो...

मेरी आँखों ने वो मंज़र भी देखा है हमदर्दों को ही बेरहम होते देखा है ।। महफ़िलो में जिनको रहम दिल देखा है अंधेरो में उनको ही खंज़र चलाते देखा है ।।

मुर्दो के शहरमें,शमशान का पता बतायें कौन? ठंडी,चलती फिरती लाशोंको जगाये कौन? सब अपने अपने गठ्ठर ढो रहे है, मेरे गठ्ठर को हात लगाये कौन? ll एक और.... फाग का महिना है, तपिश बढ रही है गला सुख रहा है,पानी तो पिला दे ए साकी समय नही हुआ,अब भी होरी को चंद दिन बाकी है ll -लखनपुरीया