नागीण आणि काही कविता.
लेखनविषय:
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कॉलेजच्या दिवसात लिहीलेल्या या कविता आहेत.माझ्या कॉलेज मध्ये दिलीप मालवणकर नावाचा एक चळवळ्या मुलगा होता. त्यानी एक प्रातिनिधिक काव्यसंग्रह प्रकाशीत केला होता. त्या संग्रहातल्या या माझ्या कविता आहेत. प्रकाशन दिनांक ८-११-१९८०.
नागिण
मनात आहे जपली मी पण
निवडुंगाची हिरवी जाळी
त्यात पोसली आहे सुंदर
एक विषारी नागिण काळी.
लागताच चाहूल कुणाची
जाळीमध्ये ती सरसरते
तिच्या विषारी फुत्काराने
उन कोवळे जळून जाते
अन् ग्रीष्माच्या शांत दुपारी
ऊन विखारी रखरखते
असह्य होउन जीव स्वताचा
निवडुंगाला डंख मारते.
चांदरात्री ती नाचनाचते
पाचोळ्याचे बांधून पैंजण
रात्र संपते ,कैफ विसरूनी
पुन्हा विषारी बनते नागिण.
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ दुसरी कविता
ज्या वळणावर वळत गेलो.
व्यापत त्या वळणाला
अंधार सरपटत आला.
पूर्वेकडे धावत सुटलो....
तर ती आधीच ,
पश्चीमेला मिळालेली.
पृथ्वी अशी गोल आहे
आम्ही आता वाचण्याची
आशा फोल आहे.
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ तिसरी कविता
मी रानातून चालतोय्
दहीवर झेलत पापण्यांवर.
पानांवर लिहीलेलं
हिरवं भविष्य वाचत.
पिवळी पानं उचलून
उराशी घेत,
त्यांच्या आठवणी रक्तानी
ह्रदयावर गोंदत.
सांडलेले पराग वेचत
पाखरांच्या हुंकारांना
आकार देत.
उन आठ्या घालून बघतय्
मी चालतो आहे माझ्याच ताठ्यात
माणसाच्या....
मातीत मिळण्यापूर्वी
मी पावलं मिरवीत
मी रानातून चाललोय.
------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------ चौथी कविता.
मनात जपावं काहीतरी
मोरपिसांच्या खुणांनी
जपावं क्षणाक्षणाचं
--कणाकणानी.
पापणीच्या आतला अशृ
मनाच्या मखमालीत ठेवावा
-----उर दाटला तरी
डोळा कोरडा ठेवावा.
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पाचवी कविता.
सैन्या गावात शिरले तेव्हा
बाजारपेठ ओस होती
दाराआड घराघराच्या
ठिणगी फुलत होती.
पायांनी पाचोळा उडवत
घोडी उभी अस्वस्थ
घराबाहेर.
घराबाहेर आले सगळे
विझून.
हुकूमासरशी टाचा घासत.
घरातली ठिणगी
चुलीतच जळत राहिली.
अजून म्हातार्या कोंडाळ्यातून
फुलत असते ठिणगी.
धुमसणार्या चिलमीतून.
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वाचने
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वाचनखूण
प्रतिक्रिया
15
उत्तम
In reply to उत्तम by लिखाळ
अगदी असेच
छान
छान कविता.
वा!!!
प्रकाशन
नागिण..
In reply to नागिण.. by स्वाती दिनेश
असेच म्हणतो
In reply to असेच म्हणतो by धनंजय
असेच
In reply to असेच by प्रा.डॉ.दिलीप बिरुटे
सहमत
नंदन
मराठी साहित्यविषयक अनुदिनी
संग्रहात प्रकाशित
सर्वच कविता आवडल्या.
रामदासभौ
रामदासदाद
नागीण