बारिश की मेमरी
लेखनविषय:
बारिश की मेमरी भी बड़ी अजीब होती
पत्तो को हरा कर देती है, इंसान को सुखा ।
खैर वो छोड़ो
खिड़की से बाहर हाथ निकालकर देखा है कभी,
वोही बारिश अपने पन का भी एहसास देती है ।
तुम्हे याद है 'सखी' वो बारिश का दिन जब हम दोनों हाथ में सैंडल लिए,
नंगे पांव एक अजनबी रस्ते पे पागलो जैसे घूम रहे थे ।
उस दिन मिटटी की खुशबु भी अजीब ही थी, जैसे किसीने नए सेंट की बॉटल खोली हो ।
वैसे तो एक अर्सा गुजर गया है इस बात को पर आज भी वो दिन याद से गया नहीं ।
वो एक दिन था, और आज एक दिन है
उस वक़्त हम साथ होने के सपने बुनते थे,
आज सपने सच हो के साथ है ।
#Gypsy
#सखी
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प्रतिक्रिया
19
काव्य छान आहे..
वाह
In reply to वाह by मिसळलेला काव्यप्रेमी
मि.का.अपडेट सह ,स्विकरणीय!
In reply to वाह by मिसळलेला काव्यप्रेमी
किंवा असंही
प्रयत्न करेन
कविता चांगली आहे. मिसळपाव हे
मस्तच आहे भाउ कविता,
In reply to मस्तच आहे भाउ कविता, by जडभरत
नसीरुद्दीन शाहचा आवाज अजून
आजचा प्रोग्रांम ठरला. रात्री
मंदार सर तुम्ही भावानुवाद कराच...
In reply to मंदार सर तुम्ही भावानुवाद कराच... by ज्ञानोबाचे पैजार
मस्त
बुवा! मस्तच मस्तच मस्तच!
छान आहे!
क्या बात!पैजारबुवा सुंदर!
पैजारबुवा
मूळ कविता सुंदर आणि
आज पुन्हा ही कविता वाचत आहे.
कविता आवडली!
कविता छानच...