| काव्य |
माय-(मराठीची) पोएम |
अनन्त्_यात्री |
| काव्य |
भादरायला हवे वाढलेले, भादरायला गेलो |
खिलजि |
| काव्य |
शेतकी कॉलेजचे दिवस |
बबु |
| काव्य |
बघुनी तुझी ती रंगीत अम्ब्रेला |
खिलजि |
| काव्य |
ग चांदण्यांनो |
चांदणे संदीप |
| काव्य |
एकदा प्रेमी राधा कृष्ण होऊन पहावे. |
माहितगार |
| काव्य |
मिळालं का तुला माझं प्रेमाचं फूल सेंट केलेलं ? |
खिलजि |
| काव्य |
गणित.. |
प्राची अश्विनी |
| काव्य |
मंत्रालयात 'आग'-बाई |
माहितगार |
| काव्य |
केयलफिड्डी! |
चलत मुसाफिर |
| काव्य |
परकीमिलन |
माहितगार |
| काव्य |
मिलिंदमिलन |
मायमराठी |
| काव्य |
रोमांचक भूल ! |
अविनाशकुलकर्णी |
| काव्य |
लयीत एका झुलवीत |
बिपीन सुरेश सांगळे |
| काव्य |
कोण कुठली रोहिणी |
Rohini Mansukh |
| काव्य |
एकदाच ओलांडून अंतर... |
प्राची अश्विनी |
| काव्य |
एका उदास संध्याकाळी |
पाषाणभेद |
| काव्य |
(डबा) |
ज्ञानोबाचे पैजार |
| काव्य |
डबा |
Rohini Mansukh |
| काव्य |
'इमॅजिन' (कल्पना कर...) |
कुमार जावडेकर |
| काव्य |
अनामिक |
Rohini Mansukh |
| काव्य |
एकदा तरी माती व्हावे |
पाषाणभेद |
| काव्य |
"शर" |
परशु |
| काव्य |
मास्तरा- जाशिल कधि परतून? |
Sumant Juvekar |
| काव्य |
मास्तरा- जाशिल कधि परतून? |
Sumant Juvekar |
| काव्य |
वणवा |
चांदणशेला |
| काव्य |
कुणी स्पेस देता का रे स्पेस? |
अबोलघेवडा |
| काव्य |
वास्तव |
Rohini Mansukh |
| काव्य |
चांदणं चाहूल |
चांदणशेला |
| काव्य |
मला कुठे शोधशील ? |
Rohini Mansukh |