वाह वाह विजुभाऊ
लाजवाब!!
--प्रभो
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काय संगावे स्वतः विषयी,आहात तुम्ही सूज्ञ !! एका सारखे एकच आम्ही,बाकी सगळे शून्य !!
आपले शीघ्रपचन आवडले बुवा..:D
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मला इतरांच्या खरडवहीत लिहिण्याची सुविधा अद्यापही उपलब्ध झाली नसल्याने मी कुणाच्याही खरडींना प्रतिक्रिया देवु शकत नाही आहे.
ypj@indiatimes.com.
प्रेषक लेंडी हजार
विडंबण आवडे , शेवट खासंच !!
- लेंडी हजार
भें^चो + मा^द = बाझ^व
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प्रेषक कुबट गावठी
ऑरगॅझम छान ,
सामंत आजोबांची "मस्ती ची बालवाडी" आठवली.
"थोबाडांची रद्दी आहे,
आम्ही विकाया येतो आहे,
ही थोबाडं तुझी माझी
फिरती शौचालयं "
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प्रेषक II मोजे II
+२
मस्त रे !
क्या बात है !
***
"हज़ारों लौंडीया ऐसी की हर लौंडी पे दम निकले,
बहुत मिले मौके हमे लेकिन सिर्फ हम ही निकम्मे निकले । "
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प्रेषक अनिल हॉटेला
मस्त रे ....................... :)
मनोबा वेलचीकर !!!
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प्रेषक गणपा
बेवड्याची मांडलेली खंत आवडली.
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प्रेषक अतिशय घाणपाद्रे
श्री विजुभाऊ, चांगलं विडंबण. विडंबणाचे शीर्षक 'पाचक' असायला हवे होते असे वाटले.
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प्रेषक क्रान्तिविर
शेवट वाचून "अन जवनिकेतून कर्णिकेकडे खळाळणारा रुधीरप्रवाह" आठवलं! सुरेख कविता.
क्रान्तिविर
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प्रेषक अपंगयात्री
छान विडंबण. तिरळं असल्याने आवडलं .. हार्डकोअर बेवेड्याचे वर्णन छान केले आहे. शेवट थोडा साचेबद्ध आहे खरा (खंत वैगेरे), पण उर्वरित ८२.१२% विडंबण आवडलं. असंच साचा -फिचा नसणारं विडंबण येउद्या अजुन !!
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प्रेषक स्वानंदयात्री
प्रकाटाआ
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प्रेषक विदेशी
त्याच्या बेवड्याचे "कौतुक" सुरेख केलेले आहे , कौतुकने !
तू आणि तुझी सरमाडी ........
नंतरच्या '.....' मळी 'घाल चुलीवरची पहिल्या धारेची !' असेच शब्द त्याच्या तोंडून आल्याचा भास झाला.
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प्रेषक श्रावणिका ( शुक्र, 10/23/2009 - 23:29) .
खुपच छान विडंबण
- श्रावणी
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प्रेषक पित्त मात्र
विजुभौंचं विडंबण आवडलं
वाह वाह
आपले
प्रेषक
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
अगागागागा
टार्या,
हवाबाण
मस्त