पिछली चांद की रात तो बरसी बहुत
हम फिरभी अपनी तिश्नगी साथ लिये लौटे
अजीब है ये वाक़या, मगर
बात हुई ही नही
दूर उफ़क की लकीर सुर्ख हो चली थी
उनके आमद की खबर गर्म हो चली थी
सुनते है वो आये तो थे
कायनात पे छाये तो थे
हम न जाने किस चांद की
याद मे मसरूफ़ थे के
बात हुई ही नही
जो बात रात रात भर बारीशे करते है
इस जमी से
शायद आसमा के पैगाम हो
इस जमी के नाम जैसे
ऐसे ही वो बात जो हमे
उनसे करनी थी
रातें गुजरी
मगर बात हुई ही नही
ना चांद रुका
ना उफ़क पंछि रुका
और ना ही बारीशे रुकि
रातें बिती, हा हमपे बिती
मगर आखिर
बात हुई ही नही
|-मिसळलेला काव्यप्रेमी-|
(२४/१०/२०२०)
उफ़क = क्षितिज
आमद = येण्या
दोन घोट कोणत्या पेयाचे
हा...हा...हा
:) _/\_
द्रव झाला महाग असा ... मोजावे
चौको भाऊ,थोडी दुरूस्ती.....
In reply to चौको भाऊ,थोडी दुरूस्ती..... by कर्नलतपस्वी
हा .... हा .... हा .... !
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:)) __/\__
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डोळ्यांत टच्चकन
वाह छान.
In reply to वाह छान. by गवि
आम्ही आपले भूछत्री आणि जिलबी