बात हुई ही नही
लेखनविषय:
काव्यरस
पिछली चांद की रात तो बरसी बहुत
हम फिरभी अपनी तिश्नगी साथ लिये लौटे
अजीब है ये वाक़या, मगर
बात हुई ही नही
दूर उफ़क की लकीर सुर्ख हो चली थी
उनके आमद की खबर गर्म हो चली थी
सुनते है वो आये तो थे
कायनात पे छाये तो थे
हम न जाने किस चांद की
याद मे मसरूफ़ थे के
बात हुई ही नही
जो बात रात रात भर बारीशे करते है
इस जमी से
शायद आसमा के पैगाम हो
इस जमी के नाम जैसे
ऐसे ही वो बात जो हमे
उनसे करनी थी
रातें गुजरी
मगर बात हुई ही नही
ना चांद रुका
ना उफ़क पंछि रुका
और ना ही बारीशे रुकि
रातें बिती, हा हमपे बिती
मगर आखिर
बात हुई ही नही
|-मिसळलेला काव्यप्रेमी-|
(२४/१०/२०२०)
उफ़क = क्षितिज
आमद = येण्याची चाहूल , सूचना
तिश्नगी = तहान
मसरूफ़ = व्यस्त
सुर्ख = रक्तवर्णी
( शुद्धलेखनाच्या चुका माफ करा, मोबल्यावर इतकंच जमलंय )
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प्रतिक्रिया
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छानच !
In reply to छानच ! by संजय क्षीरसागर
सा सं मदत करा हो.
In reply to सा सं मदत करा हो. by मिसळलेला काव्यप्रेमी
असा !
मस्त
मस्तच
क्या बात! अप्रतिम!
छान लिहिलंयंस रे मिका!
क्या बात!
क्या बात है मिकाशेठ.
In reply to क्या बात है मिकाशेठ. by गवि
कातिल
In reply to क्या बात है मिकाशेठ. by गवि
@ गवि : क्या बात है !
भारीच!
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ना चांद रुका