मराठी साहित्य, संस्कृती आणि लेखनाचे व्यासपीठ

काही बाही

दीप्या · · जे न देखे रवी...
लेखनविषय:
काव्यरस
बरीच घरे ......बरी>>>>>>>च घरे ! घ री च बरे !!

वाचने 991 वाचनखूण प्रतिक्रिया 1

शुचि 19/03/2010 - 23:43
काळे काकूंनी काळे काकांचे चेरीच्या कामाचे कोरे रकरीत कागद काळ्या कात्रीने राकरा कापून काढले की . ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला, जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला, जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,जितना ही जो रसिक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।