काही बाही

दीप्या जे न देखे रवी...
बरीच घरे ......बरी>>>>>>>च घरे ! घ री च बरे !!
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काव्यरस

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शुचि नवीन

काळे काकूंनी काळे काकांचे चेरीच्या कामाचे कोरे रकरीत कागद काळ्या कात्रीने राकरा कापून काढले की . ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~~ जितनी दिल की गहराई हो उतना गहरा है प्याला, जितनी मन की मादकता हो उतनी मादक है हाला, जितनी उर की भावुकता हो उतना सुन्दर साकी है,जितना ही जो रसिक, उसे है उतनी रसमय मधुशाला।।