मराठी साहित्य, संस्कृती आणि लेखनाचे व्यासपीठ

निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण ७: काही अज्ञात पर्यावरणप्रेमी!

मार्गी ·

कलंत्री 03/06/2016 - 15:11
पर्यटनाऐवजी पर्यावरणाला महत्त्व दिले तर बरेच मानवनिर्मित प्रश्न सुटतील.

कलंत्री 03/06/2016 - 15:11
पर्यटनाऐवजी पर्यावरणाला महत्त्व दिले तर बरेच मानवनिर्मित प्रश्न सुटतील.

निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण ६: फॉरेस्ट मॅन: जादव पायेंग

मार्गी ·

एस 26/05/2016 - 23:52
चैतन्य गौरांगप्रभू यांच्या पायेंग यांच्यावरील एका लेखाची आठवण झाली. सतत आपल्या ध्येय्याचा पाठलाग चिकाटीने करत राहणे हे अशा यशासाठी आवश्यक असते हे अधोरेखित होते. पुभाप्र.

अभिरुप 27/05/2016 - 14:00
या माणसाने जमिनीला भुसभुशीत करणार्‍या एक प्रकारच्या लाल जंगली मुंग्या हाताने वाहून नेल्या आहेत असे ऐकले आहे.त्यांच्या कार्याला सलाम.

पैसा 28/05/2016 - 12:45
आपल्याला जमेल तितकी झाडे लावायची, निदान लाकडी फर्निचर, कागद तरी साक्षेपाने वापरावेत. एवढ्याने बरेच साध्य होईल.

एस 26/05/2016 - 23:52
चैतन्य गौरांगप्रभू यांच्या पायेंग यांच्यावरील एका लेखाची आठवण झाली. सतत आपल्या ध्येय्याचा पाठलाग चिकाटीने करत राहणे हे अशा यशासाठी आवश्यक असते हे अधोरेखित होते. पुभाप्र.

अभिरुप 27/05/2016 - 14:00
या माणसाने जमिनीला भुसभुशीत करणार्‍या एक प्रकारच्या लाल जंगली मुंग्या हाताने वाहून नेल्या आहेत असे ऐकले आहे.त्यांच्या कार्याला सलाम.

पैसा 28/05/2016 - 12:45
आपल्याला जमेल तितकी झाडे लावायची, निदान लाकडी फर्निचर, कागद तरी साक्षेपाने वापरावेत. एवढ्याने बरेच साध्य होईल.

निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण ५: पाणीवाले बाबा: राजेंद्रसिंह राणा

मार्गी ·

एस 21/05/2016 - 23:57
राजेंद्र सिंह यांनी नक्की कसे कार्य केलेय त्यासंबंधी जास्त माहिती यायला हवी होती. लेखमाला थोडीशी गोलगोल व्हायला लागलीये असे मला व्यक्तिशः वाटले. प्रश्नांना थेटपणे भिडत नाहीये. वरवरच स्पर्श करून पुढे सरकतेय असे जाणवले. पुभाप्र.

In reply to by एस

अंतरा आनंद 22/05/2016 - 07:43
खरय. त्यामुळे पुढचा लेख वाचून प्रतिक्रिया देऊया असं म्हणत वाचतेय. छान सविस्तर लिहा ना. नुसते मुद्दे ही चालतील पण नुसतच विषयाला भोज्जा केल्यासारखं नको. नावं ठेवत नाहीय लेख म्हणून चांगलाच आहे. पण अजून महितीपर आणि स्पष्ट झालं तरच लिहीण्याच्या मागील हेतू साध्य होईल म्हणून ही प्रामाणिक सूचना.

In reply to by अंतरा आनंद

मार्गी 22/05/2016 - 11:05
वाचनाबद्दल व प्रतिक्रियेबद्दल धन्यवाद! तुमच्या विचारांचं स्वागत आहे. पण मी हे लेख त्या कामांविषयी असे लिहित नाहीय. पर्यावरण हा मुख्य विषय आहे. त्या संदर्भात त्या कामांचं मला झालेलं आकलन मी समोर आणतोय. माझ्या नजरेतून. त्याला धरून इतरही अनेक बाबी मांडतोय. त्या विषयांबद्दल शास्त्रशुद्ध माहिती हवी असेल तर ती इंटरनेटवर उपलब्ध आहेच. पण मी असं थिअरीटिकल न लिहिता जे अनुभवलं; जे त्याविषयी वाटतं त्यानुसार लिहितोय. :)

पैसा 28/05/2016 - 12:41
श्री राणा यांच्याबद्दल अजून शोध घ्यावा लागेल. पण अनेकजणांना यांचे असे काही काम आहे हेच माहीत नसते. त्यांच्यासाठी सुरुवात स्वागतार्हच.

राजेन्द्र सिंगजींना भेटलो आहे, बोललो आहे, प्रश्न विचारले आहेत. ती मुलाखत मी मागे फेसबुकवर टाकली होती. हिंदीत आहे. मराठी तर्जुमा करावा लागेल.सध्या हिंदीतच वाचा. :D आज श्री. राजेन्द्र सिंहजी से हुई चर्चा के कुछ प्रमुख मुद्दे। एक दो मुद्दे छोड़कर बाकी सब में मैं सहमत था। 1. प्र. :- नदी जोड़ो का विरोध अधिक मुखर हो कर क्यों नहीं किया जा रहा है? " - दिल्ली का एक युवा कार्यकर्ता उत्तर :- नदी जोड़ो परियोजना दरअसल देश तोड़ो परियोजना है। अगर छोटामोटा डायवर्सन है या जिस में एक ही कंटूर में कम खर्चे में पानी मोड़ा जाएगा जैसे गंगा का पानी हिंडौन में छोड़ा गया तो ठीक है, लेकिन बड़ी बड़ी परियोजनाएँ तो अंततः नुकसानदेह ही है। " "नरेंद्र मोदी बुलेट ट्रेन है। बहुत तेज़ी से चल रहें हैं। लेकिन रफ़्तार जितनी ज़्यादा हो एक्सीडेंट की संभावनाएँ भी उतनी ही बढ़ जाती है। गंगा स्वच्छ होगी लोगों के द्वारा ही, सरकार फिर चाहे कितना ही पैसा लगा लें। मैंने तो मोदी जी को बोला है, बस उन्होंने सुनने के लिए अपनी रफ़्तार धीमी करने की ज़रूरत है। " 2 प्र. :- महाराष्ट्र में जलयुक्त शिवार योजना के फायदे तो दिख रहें है लेकिन अगर किसानों का गन्ने के प्रति प्यार कम ना हुआ तो क्या? - स्वामी संकेतानंद उ :- "जलयुक्त शिवार अच्छे से कार्यान्वित हो रही है। इस के फायदे भी दिख रहे है। मैंने स्वयं ड्राफ्ट बनते समय प्रावधान किया की यह पानी गन्ने को न जाए। पारंपरिक कृषि को बढ़ावा दिया जाएगा। इस विषय में जाग्रति भी लायी जा रही है। महाराष्ट्र में बीजेपी सरकार इस क्षेत्र में तो अच्छा काम कर रही है। इस वर्ष तो उन्होंने सूखाग्रस्त क्षेत्र में गन्ने की खेती पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया है।" प्र. :- काम ज़रूर अच्छा हो रहा है। सरकार तो गन्ने की खेती पर प्रतिबन्ध लगा देगी, लेकिन अगले 2 3 वर्ष अच्छी वर्षा हुई तो कहीं वहीं ढाक के तीन पात ना हो जाए। क्या लोग इतनी आसानीसे अपनी आदतें बदलेंगे? - स्वामी संकेतानंद उ :- ज़रूर बदलेंगे। या कहूँ की बदल रहें हैं। लोग धीरे धीरे खेती का ढंग बदल रहें हैं। आप उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट में जा कर देखिए। पहले वे भी संपन्न किसान थे। फिर ख़स्ताहाल हो गए। अब उन को अपनी किसानी का ढंग बदलना पड़ा। यही महाराष्ट्र में होगा। ( यहाँ पर मैं ज़्यादा सहमत नहीं हुआ। मुझे अब भी लगता है कि किसान शायद फिर से गन्ने की ओर चलें जाएँगे। हमें किसानों को नहीं यहाँ की शुगर पॉलिटिक्स को ही बदलने की ज़रूरत है। गन्ने को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलनी बंद हो गयी तो लोग ज़्यादा तेज़ी से अन्य उत्पादों की तरफ जाएँगे। ये बात कही भी मैंने लेकिन वे मुझ से ज़्यादा आशावादी है। :D ) प्र :- अगर हम लोगों की नदियों के लिए जो परंपरागत धार्मिक भावना रही है वो फिर से जगाएँ, तो क्या इस से हमें नदियाँ बचाने में ज़्यादा आसानी नहीं होगी? गंगा स्वच्छ रखने में लोग जुट जाएँगे। हर कोई मन लगाकर अपनी नदियाँ polluted न हो इस की कोशिश करेगा? हम तो नेचर वर्शिपर ही तो है। - अलीगढ़ क्षेत्र में काम करने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता बहन उ:- अब के माहोल में धार्मिक भावना चेताना ज़्यादा मुश्किलें खड़ी कर देगा। हम सिर्फ भगवान बना के बस पूजा करते है, आदर नहीं करते। धर्म का रूप ही बदल गया है। अगर हम नेचर वर्शिपर है तो फिर से वही पुराने ढंग की नेचर वरशिप करनी होगी। जो आज के ज़माने में शायद हो नहीं पाएगा और नदियों को स्वच्छ करने के प्रयास में धार्मिक हालात और ख़राब हो जाएँगे। यहाँ धर्म ना आएँ तो ही अच्छा है। सब से बढ़िया मार्ग तो लोगों को नदियों का महत्व समझाना ही है। प्र :- ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को नियंत्रित करने के चक्कर में हम असम की ज़मीन की उर्वरकता ही तो नहीं ख़त्म कर देंगे? ब्रह्मपुत्र की बाढ़ तो हर वर्ष आती है और गाद बहा कर ज़मीन उपजाऊँ बनाती है। - स्वामी संकेतानंद ( यह मुद्दा मैंने तब उठाया जब उन्होंने कहा की ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को कण्ट्रोल करने के उपाय खोजने चाहिए।( उ :- बाढ़ और drought तो एक ही सिक्के के दो पहलु है। हमें दोनों को नियंत्रित करना चाहिए। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ तो ज़मीन की उपजाऊँ परत बहा कर ले जा रही है। नुक्सान ही है। इस लिए बाढ़ नियंत्रण के किए हमें अरुणाचल से ही शुरुवात करनी चाहिए। ( यहाँ पर भी मैं सहमत नहीं हुआ। और अब भी नहीं हूँ। बाढ़ और सूखा एक सिक्के के दो पहलूँ अवश्य है लेकिन मेरा मानना है कि बाढ़ का पानी हमारे घर में नहीं घुसता, हम ने नदियों के फ्लड प्लेन्स में अपने घर बना लिए है। इजिप्ट ने आसवान डैम बनाया इस से बाढ़ आनी बंद हो गयी और ज़मीन की उर्वरकता में कमी आयी। डेल्टा क्षेत्र में भी मछलियाँ कम हो गयी। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को हमें रोकना नहीं चाहिए बल्कि हमारा व्यवस्थापन इस तरह से हो की जानमाल का कम से कम नुकसान हो। मैं ये मुद्दे उछालना चाहता था लेकिन फिर कार्यक्रम के आयोजकों ने चायपानी के बुला लिया। ) वैसे उन से बातें करने वाले हम सब युवा ही थे और उन्होंने कहा की सारे बदलाव तो आप लोगों को ही लाने है। युवाशक्ति जागृत होगी तभी इस समस्याओं से निपट पाएँगे। ( हाय राम! हर कोई आकर हमारे कंधो पर सारी ज़िम्मेदारी डाल देता है। :P :P :P ) एक कॉलेज का बंदा बोला की सर आप फेसबुक पे आइये, हमारे मार्गदर्शक बनिए। हम खूब काम करेंगे। तो वे बोले की अरे बेटा फेसबुक मेरे बस का नहीं। मैं तो मेल भी प्रिंट आउट निकाल कर पढता हूँ। :D :D :D - स्वामी

मार्गी 30/05/2016 - 09:04
अरे वा! नमस्कार स्वामीजी! मस्त मुलाखत झाली तर! इथे शेअर केल्याबद्दल धन्यवाद.

एस 21/05/2016 - 23:57
राजेंद्र सिंह यांनी नक्की कसे कार्य केलेय त्यासंबंधी जास्त माहिती यायला हवी होती. लेखमाला थोडीशी गोलगोल व्हायला लागलीये असे मला व्यक्तिशः वाटले. प्रश्नांना थेटपणे भिडत नाहीये. वरवरच स्पर्श करून पुढे सरकतेय असे जाणवले. पुभाप्र.

In reply to by एस

अंतरा आनंद 22/05/2016 - 07:43
खरय. त्यामुळे पुढचा लेख वाचून प्रतिक्रिया देऊया असं म्हणत वाचतेय. छान सविस्तर लिहा ना. नुसते मुद्दे ही चालतील पण नुसतच विषयाला भोज्जा केल्यासारखं नको. नावं ठेवत नाहीय लेख म्हणून चांगलाच आहे. पण अजून महितीपर आणि स्पष्ट झालं तरच लिहीण्याच्या मागील हेतू साध्य होईल म्हणून ही प्रामाणिक सूचना.

In reply to by अंतरा आनंद

मार्गी 22/05/2016 - 11:05
वाचनाबद्दल व प्रतिक्रियेबद्दल धन्यवाद! तुमच्या विचारांचं स्वागत आहे. पण मी हे लेख त्या कामांविषयी असे लिहित नाहीय. पर्यावरण हा मुख्य विषय आहे. त्या संदर्भात त्या कामांचं मला झालेलं आकलन मी समोर आणतोय. माझ्या नजरेतून. त्याला धरून इतरही अनेक बाबी मांडतोय. त्या विषयांबद्दल शास्त्रशुद्ध माहिती हवी असेल तर ती इंटरनेटवर उपलब्ध आहेच. पण मी असं थिअरीटिकल न लिहिता जे अनुभवलं; जे त्याविषयी वाटतं त्यानुसार लिहितोय. :)

पैसा 28/05/2016 - 12:41
श्री राणा यांच्याबद्दल अजून शोध घ्यावा लागेल. पण अनेकजणांना यांचे असे काही काम आहे हेच माहीत नसते. त्यांच्यासाठी सुरुवात स्वागतार्हच.

राजेन्द्र सिंगजींना भेटलो आहे, बोललो आहे, प्रश्न विचारले आहेत. ती मुलाखत मी मागे फेसबुकवर टाकली होती. हिंदीत आहे. मराठी तर्जुमा करावा लागेल.सध्या हिंदीतच वाचा. :D आज श्री. राजेन्द्र सिंहजी से हुई चर्चा के कुछ प्रमुख मुद्दे। एक दो मुद्दे छोड़कर बाकी सब में मैं सहमत था। 1. प्र. :- नदी जोड़ो का विरोध अधिक मुखर हो कर क्यों नहीं किया जा रहा है? " - दिल्ली का एक युवा कार्यकर्ता उत्तर :- नदी जोड़ो परियोजना दरअसल देश तोड़ो परियोजना है। अगर छोटामोटा डायवर्सन है या जिस में एक ही कंटूर में कम खर्चे में पानी मोड़ा जाएगा जैसे गंगा का पानी हिंडौन में छोड़ा गया तो ठीक है, लेकिन बड़ी बड़ी परियोजनाएँ तो अंततः नुकसानदेह ही है। " "नरेंद्र मोदी बुलेट ट्रेन है। बहुत तेज़ी से चल रहें हैं। लेकिन रफ़्तार जितनी ज़्यादा हो एक्सीडेंट की संभावनाएँ भी उतनी ही बढ़ जाती है। गंगा स्वच्छ होगी लोगों के द्वारा ही, सरकार फिर चाहे कितना ही पैसा लगा लें। मैंने तो मोदी जी को बोला है, बस उन्होंने सुनने के लिए अपनी रफ़्तार धीमी करने की ज़रूरत है। " 2 प्र. :- महाराष्ट्र में जलयुक्त शिवार योजना के फायदे तो दिख रहें है लेकिन अगर किसानों का गन्ने के प्रति प्यार कम ना हुआ तो क्या? - स्वामी संकेतानंद उ :- "जलयुक्त शिवार अच्छे से कार्यान्वित हो रही है। इस के फायदे भी दिख रहे है। मैंने स्वयं ड्राफ्ट बनते समय प्रावधान किया की यह पानी गन्ने को न जाए। पारंपरिक कृषि को बढ़ावा दिया जाएगा। इस विषय में जाग्रति भी लायी जा रही है। महाराष्ट्र में बीजेपी सरकार इस क्षेत्र में तो अच्छा काम कर रही है। इस वर्ष तो उन्होंने सूखाग्रस्त क्षेत्र में गन्ने की खेती पर प्रतिबन्ध भी लगा दिया है।" प्र. :- काम ज़रूर अच्छा हो रहा है। सरकार तो गन्ने की खेती पर प्रतिबन्ध लगा देगी, लेकिन अगले 2 3 वर्ष अच्छी वर्षा हुई तो कहीं वहीं ढाक के तीन पात ना हो जाए। क्या लोग इतनी आसानीसे अपनी आदतें बदलेंगे? - स्वामी संकेतानंद उ :- ज़रूर बदलेंगे। या कहूँ की बदल रहें हैं। लोग धीरे धीरे खेती का ढंग बदल रहें हैं। आप उत्तर प्रदेश के गन्ना बेल्ट में जा कर देखिए। पहले वे भी संपन्न किसान थे। फिर ख़स्ताहाल हो गए। अब उन को अपनी किसानी का ढंग बदलना पड़ा। यही महाराष्ट्र में होगा। ( यहाँ पर मैं ज़्यादा सहमत नहीं हुआ। मुझे अब भी लगता है कि किसान शायद फिर से गन्ने की ओर चलें जाएँगे। हमें किसानों को नहीं यहाँ की शुगर पॉलिटिक्स को ही बदलने की ज़रूरत है। गन्ने को स्पेशल ट्रीटमेंट मिलनी बंद हो गयी तो लोग ज़्यादा तेज़ी से अन्य उत्पादों की तरफ जाएँगे। ये बात कही भी मैंने लेकिन वे मुझ से ज़्यादा आशावादी है। :D ) प्र :- अगर हम लोगों की नदियों के लिए जो परंपरागत धार्मिक भावना रही है वो फिर से जगाएँ, तो क्या इस से हमें नदियाँ बचाने में ज़्यादा आसानी नहीं होगी? गंगा स्वच्छ रखने में लोग जुट जाएँगे। हर कोई मन लगाकर अपनी नदियाँ polluted न हो इस की कोशिश करेगा? हम तो नेचर वर्शिपर ही तो है। - अलीगढ़ क्षेत्र में काम करने वाली एक सामाजिक कार्यकर्ता बहन उ:- अब के माहोल में धार्मिक भावना चेताना ज़्यादा मुश्किलें खड़ी कर देगा। हम सिर्फ भगवान बना के बस पूजा करते है, आदर नहीं करते। धर्म का रूप ही बदल गया है। अगर हम नेचर वर्शिपर है तो फिर से वही पुराने ढंग की नेचर वरशिप करनी होगी। जो आज के ज़माने में शायद हो नहीं पाएगा और नदियों को स्वच्छ करने के प्रयास में धार्मिक हालात और ख़राब हो जाएँगे। यहाँ धर्म ना आएँ तो ही अच्छा है। सब से बढ़िया मार्ग तो लोगों को नदियों का महत्व समझाना ही है। प्र :- ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को नियंत्रित करने के चक्कर में हम असम की ज़मीन की उर्वरकता ही तो नहीं ख़त्म कर देंगे? ब्रह्मपुत्र की बाढ़ तो हर वर्ष आती है और गाद बहा कर ज़मीन उपजाऊँ बनाती है। - स्वामी संकेतानंद ( यह मुद्दा मैंने तब उठाया जब उन्होंने कहा की ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को कण्ट्रोल करने के उपाय खोजने चाहिए।( उ :- बाढ़ और drought तो एक ही सिक्के के दो पहलु है। हमें दोनों को नियंत्रित करना चाहिए। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ तो ज़मीन की उपजाऊँ परत बहा कर ले जा रही है। नुक्सान ही है। इस लिए बाढ़ नियंत्रण के किए हमें अरुणाचल से ही शुरुवात करनी चाहिए। ( यहाँ पर भी मैं सहमत नहीं हुआ। और अब भी नहीं हूँ। बाढ़ और सूखा एक सिक्के के दो पहलूँ अवश्य है लेकिन मेरा मानना है कि बाढ़ का पानी हमारे घर में नहीं घुसता, हम ने नदियों के फ्लड प्लेन्स में अपने घर बना लिए है। इजिप्ट ने आसवान डैम बनाया इस से बाढ़ आनी बंद हो गयी और ज़मीन की उर्वरकता में कमी आयी। डेल्टा क्षेत्र में भी मछलियाँ कम हो गयी। ब्रह्मपुत्र की बाढ़ को हमें रोकना नहीं चाहिए बल्कि हमारा व्यवस्थापन इस तरह से हो की जानमाल का कम से कम नुकसान हो। मैं ये मुद्दे उछालना चाहता था लेकिन फिर कार्यक्रम के आयोजकों ने चायपानी के बुला लिया। ) वैसे उन से बातें करने वाले हम सब युवा ही थे और उन्होंने कहा की सारे बदलाव तो आप लोगों को ही लाने है। युवाशक्ति जागृत होगी तभी इस समस्याओं से निपट पाएँगे। ( हाय राम! हर कोई आकर हमारे कंधो पर सारी ज़िम्मेदारी डाल देता है। :P :P :P ) एक कॉलेज का बंदा बोला की सर आप फेसबुक पे आइये, हमारे मार्गदर्शक बनिए। हम खूब काम करेंगे। तो वे बोले की अरे बेटा फेसबुक मेरे बस का नहीं। मैं तो मेल भी प्रिंट आउट निकाल कर पढता हूँ। :D :D :D - स्वामी

मार्गी 30/05/2016 - 09:04
अरे वा! नमस्कार स्वामीजी! मस्त मुलाखत झाली तर! इथे शेअर केल्याबद्दल धन्यवाद.

निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण ३: आर्थिक विकासातला अनर्थ

मार्गी ·

एस 14/05/2016 - 18:52
आधी एका लेखावरील प्रतिसादांत म्हटल्याप्रमाणे निसर्गाचे लाभ वैयक्तिक पण त्यामुळे होणारी हानी व त्याचे दुष्परिणाम मात्र सार्वजनिक, अशी जी वाटणी सध्या धडाक्याने सुरू आहे त्यामुळे हा प्रश्न उभा राहिला आहे.

अभ्या.. 04/06/2016 - 14:39
सुंदर लेखमाला. कधी कधी असं वाटतं, हा यंत्रांचा, सुविधांचा उपयोग कशासाठी तर माणसांचे श्रम कमी करायसाठी. हापसे बंद होऊन मोटरी बसल्या. जिम वाढल्या. माणसे तेथे घाम गाळू लागले. जमीन लेव्हलिंगला जेसीबी लावायचे. टेकडी १५ दिवसात जमीनीशी समांतर होते. तिथे राहून आठवडाभरातले पाच दिवस पेट्रोल, वीज जाळायची अन वीकांताला ट्रेक करायला निसर्गाकडे जायचे. सायकली चालवायच्या. जंगले उडवायची अन तिथे प्लान्ड रिसॉर्ट्, मासेमारीला मोठमोठे ट्रेलर्स वापरायचे अन समुद्रजीव वाचवायला मोहीमा चालवायच्या. बीचवर गर्दी करुन तेथले समुद्रजीवन उध्वस्त करायचे, ते तसेच सोडून परत नव्या व्हर्जिन बीचचा शोध चालूच. काय चाललय हे कळेनासे होतय खरे. :(

एस 14/05/2016 - 18:52
आधी एका लेखावरील प्रतिसादांत म्हटल्याप्रमाणे निसर्गाचे लाभ वैयक्तिक पण त्यामुळे होणारी हानी व त्याचे दुष्परिणाम मात्र सार्वजनिक, अशी जी वाटणी सध्या धडाक्याने सुरू आहे त्यामुळे हा प्रश्न उभा राहिला आहे.

अभ्या.. 04/06/2016 - 14:39
सुंदर लेखमाला. कधी कधी असं वाटतं, हा यंत्रांचा, सुविधांचा उपयोग कशासाठी तर माणसांचे श्रम कमी करायसाठी. हापसे बंद होऊन मोटरी बसल्या. जिम वाढल्या. माणसे तेथे घाम गाळू लागले. जमीन लेव्हलिंगला जेसीबी लावायचे. टेकडी १५ दिवसात जमीनीशी समांतर होते. तिथे राहून आठवडाभरातले पाच दिवस पेट्रोल, वीज जाळायची अन वीकांताला ट्रेक करायला निसर्गाकडे जायचे. सायकली चालवायच्या. जंगले उडवायची अन तिथे प्लान्ड रिसॉर्ट्, मासेमारीला मोठमोठे ट्रेलर्स वापरायचे अन समुद्रजीव वाचवायला मोहीमा चालवायच्या. बीचवर गर्दी करुन तेथले समुद्रजीवन उध्वस्त करायचे, ते तसेच सोडून परत नव्या व्हर्जिन बीचचा शोध चालूच. काय चाललय हे कळेनासे होतय खरे. :(
निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण १: प्रस्तावना निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण २: नैसर्गिक असंतुलनामध्ये मानवाची भुमिका आर्थिक विकासातला अनर्थ आज आपण ज्याला विकास म्हणतो, तो प्रत्यक्षात काय आहे? आज आपण म्हणतो की, अनेक देश विकसित आहेत आणि अनेक विकसनशील आहेत. किंवा अमुक सरकारच्या पाच वर्षांमध्ये राज्याचा काहीच विकास झाला नाही. विकासाचा 'अर्थ' काय आहे? विकासाची प्रचलित संकल्पना पश्चिमेकडून आलेली आहे आणि ती मुख्यत: आर्थिक विकासावर आधारित आहे.

निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण २: नैसर्गिक असंतुलनामध्ये मानवाची भुमिका

मार्गी ·

पैसा 12/05/2016 - 22:22
निसर्गाला केंद्रस्थानी ठेवून समतोल ठेवणे आवश्यक. आपण निसर्गाकडून फारच जास्त ओरबाडून घेत आहोत आणि नको तिथे बदल करायच्या प्रयत्नात आहोत.

पैसा 12/05/2016 - 22:22
निसर्गाला केंद्रस्थानी ठेवून समतोल ठेवणे आवश्यक. आपण निसर्गाकडून फारच जास्त ओरबाडून घेत आहोत आणि नको तिथे बदल करायच्या प्रयत्नात आहोत.
निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण १: प्रस्तावना नैसर्गिक असंतुलनामध्ये मानवाची भुमिका मागच्या लेखात आपण बघितलं की, निसर्गाच्या नियमानुसार सर्व सृष्टी चालते. त्याची एक व्यवस्था असते. जर ह्या व्यवस्थेवर ताण पडला, तर निसर्गही बदलतो. जसं गुरुत्वाकर्षण हा एक नियम आहे. जर आपण वाकडे तिकडे चाललो तर आपण ह्या नियमामुळेच पडतो. त्याच प्रकारे आपण आणि निसर्ग ह्यांच्यात तणाव निर्माण होऊ शकतो.

ऊड ऊड रे प्लोव्हू... ३०,००० किमीची फेरी मारून येऊ ! : ०६ : चिमुकल्या साँगबर्डचे नाव छोटे, लक्षण मोठे...

डॉ सुहास म्हात्रे ·

नाखु 09/05/2016 - 11:53
माहीती तीही ललीत स्वरूपात दिल्याने जास्त मस्त वाटली नाहीतर एखाद सरकारी माहीतीप्त्रक वाटले असते.

सुबोध खरे 13/05/2016 - 18:13
खूपच छान लेखमाला. सहाही भाग आतुरतेने वाचून काढले होते प्रतिसाद देण्यासाठी उशीर झायाबाद्द्ल क्षमस्व १०० भागापर्यंत मालिका चालूच ठेवा अशी विनंती.

46 birds fall from sky in Boston मॅसेच्युसेट्सच्या डोरचेस्टर प्रभागात ४६ सॉंगबर्ड्स आकाशात उडताना खाली पडलेले सापडले. त्यातले काही मृत पावले होते तर काही आजारी होते. शहराचा आरोग्यविभाग असे का झाले असावे याबाबत तपास करत आहे.

नाखु 09/05/2016 - 11:53
माहीती तीही ललीत स्वरूपात दिल्याने जास्त मस्त वाटली नाहीतर एखाद सरकारी माहीतीप्त्रक वाटले असते.

सुबोध खरे 13/05/2016 - 18:13
खूपच छान लेखमाला. सहाही भाग आतुरतेने वाचून काढले होते प्रतिसाद देण्यासाठी उशीर झायाबाद्द्ल क्षमस्व १०० भागापर्यंत मालिका चालूच ठेवा अशी विनंती.

46 birds fall from sky in Boston मॅसेच्युसेट्सच्या डोरचेस्टर प्रभागात ४६ सॉंगबर्ड्स आकाशात उडताना खाली पडलेले सापडले. त्यातले काही मृत पावले होते तर काही आजारी होते. शहराचा आरोग्यविभाग असे का झाले असावे याबाबत तपास करत आहे.
=================================================================== ऊड ऊड रे प्लोव्हू... ३०,००० किमीची फेरी मारून येऊ !

निसर्ग, पर्यावरण आणि आपण १: प्रस्तावना

मार्गी ·

खेडूत 09/05/2016 - 09:38
वाचतोय. तुम्ही केलेल्या प्रवास, पाहिलेली वस्तुस्थिती, आणि चिंतनातून बरीच माहिती मिळेल अशी खात्री आहे! पुभाप्र.

खेडूत 09/05/2016 - 09:38
वाचतोय. तुम्ही केलेल्या प्रवास, पाहिलेली वस्तुस्थिती, आणि चिंतनातून बरीच माहिती मिळेल अशी खात्री आहे! पुभाप्र.
प्रस्तावना आज पर्यावरणात अनेक ठिकाणी उद्रेक होताना दिसतात. देशामध्ये अनेक ठिकाणी दुष्काळ पसरला आहे, पहाडामध्ये वणवे पेटत आहेत आणि संपूर्ण जगात कुठे भूकंप येत आहेत, कुठे वादळ तर कुठे लँडस्लाईड. आपल्या देशाच्या संदर्भात दुष्काळाची समस्या अगदी गंभीर स्थितीत आहे. अशावेळी प्रश्न पडतो की, ह्या सगळ्यांसाठी आपण काय करू शकतो? ह्या विषयावर आपल्याशी बोलू इच्छितो. आजवर ह्या विषयाबद्दल जे समजून घेतलं ते आपल्याला सांगू इच्छितो. दुष्काळाच्या संदर्भात वर दिसत असलेली स्थिती ही मूळ समस्येची समोरची बाजू. समस्येचं समोर येणारं आणि दिसत असलेलं रूप.

ऊड ऊड रे प्लोव्हू... ३०,००० किमीची फेरी मारून येऊ ! : ०५ : बगळ्यांची माळ फुले अजुनि अंबरात

डॉ सुहास म्हात्रे ·

प्रचेतस 03/05/2016 - 09:26
भन्नाट माहिती. पक्ष्यांचे व्ही फॉर्मेशन केवळ प्रवासी पक्ष्यांच्याच नाही तर आपल्या अगदी नेहमीच्या जवळच्या पक्ष्यांतही दिसते. चिंचवडच्या टेल्को मध्ये वटवाघळांची खूप मोठी वसाहत आहे. अक्षरशः हजारो भलीमोठी वाघळं आहेत. संध्याकाळी ६ च्या नंतर चिंचवडच्या आकाशात नजर टाकली तर कुणालाही ही हजारो वटवाघळं बाहेर पडून व्ही आकारात उडताना दिसतात.

In reply to by प्रचेतस

धन्यवाद ! दीर्घपल्ल्याच्या उड्डाणांमध्ये, या फॉर्मेशनमध्ये होणारी "उर्जेची बचत" व "थव्यातील पक्षांनी ते करताना एकमेकाला केलेले सहकार्य" हे कळीचे मुद्दे असतात. याशिवाय, समुद्रावरच्या दीर्घसफरी करण्याच्या वेळेस ते जीवन-मरणाचे मुद्दे होऊ शकतात. मोठ्या आकाराचे काही स्थानिक पक्षीही व्ही फॉर्मेशनने ऊडतात हे खरे आहे. उर्जा वाचवणे किंवा आळस करणे किंवा दुसर्‍याच्या श्रमाचा फायदा लुटणे ही काही मानवाची मक्तेदारी नाही ! हे प्राण्यांच्या (यात मानवसुद्धा आलाच) "दुधारी" हुशारीचेच लक्षण आहे ;) =))

प्रत्येक भाग वाचनीय. प्राणी-पक्षी ह्यांच्याविषयी वाचले की एकच समजते....."मानव हा पृथ्वीवरील सगळ्यात उपद्रवी जीव आहे."

In reply to by डॉ सुहास म्हात्रे

पण काका लेख वाचून तर द्या सगळ्यांना आधीचा काय धन्यावादाची घाई करताय? व्ही शेप प्रेमी पैजारबुवा,

स्वीट टॉकर 04/05/2016 - 12:02
तुमचा प्रत्येक लेख वाचनीयच असतो! खूप नवीन माहिती आणि अतिशय रोचक. त्यातून या वेळेस वाचता वाचता सुरेल पार्श्वसंगीताची देखील तुम्ही व्यवस्था केलीत! पुढच्या लेखांच्या प्रतीक्षेत! नाखु - तुमच्या प्रतिसादात एक दुरुस्ती करू का? मानव हा पृथ्वीवरील एकमेव उपद्रवी+लोभी जीव आहे.

वेल्लाभट 04/05/2016 - 17:04
जबरदस्त लेखमाला इतकी रंजक माहिती आहे ही...... अनेक गोष्टी माहिती नव्हत्या यातल्या. एरोडायनॅमिक्स वगैरे तर क्लासच.

वेगळाच धम्माल विषय. सर्व लेख आत्ताच वाचले. एक प्रश्न आहे. पचनसंस्थेच्या घटलेल्या वजनाचे रूपांतर ऊर्जेत होते का? किंवा पचनसंस्थेचा काही भाग इंधनाचे कार्य करतो का? एका अफलातून लेखमालेबद्दल धन्यवाद. पुभाप्र.

In reply to by सुधीर कांदळकर

धन्यवाद ! पचनसंस्था आकसू लागली की त्यापासून मिळणारी उर्जा अर्थातच वापरली जाते हे नक्की. ती साठवून मग उड्डाणाला वापरली जाते की सुरुवातीच्या उड्डाणासाठी तडक खर्च केली जाते याबद्दल माझ्या वाचनात काही आले नाही. मात्र, त्या पचनसंस्थेच्या आकसण्यामुळे पक्षाच्या कमी झालेल्या दोन-पाच ग्रॅम वजनामुळे महाभरार्‍यांसाठी लागणार्‍या उर्जेमधे बचत होते हे नक्की.

प्रचेतस 03/05/2016 - 09:26
भन्नाट माहिती. पक्ष्यांचे व्ही फॉर्मेशन केवळ प्रवासी पक्ष्यांच्याच नाही तर आपल्या अगदी नेहमीच्या जवळच्या पक्ष्यांतही दिसते. चिंचवडच्या टेल्को मध्ये वटवाघळांची खूप मोठी वसाहत आहे. अक्षरशः हजारो भलीमोठी वाघळं आहेत. संध्याकाळी ६ च्या नंतर चिंचवडच्या आकाशात नजर टाकली तर कुणालाही ही हजारो वटवाघळं बाहेर पडून व्ही आकारात उडताना दिसतात.

In reply to by प्रचेतस

धन्यवाद ! दीर्घपल्ल्याच्या उड्डाणांमध्ये, या फॉर्मेशनमध्ये होणारी "उर्जेची बचत" व "थव्यातील पक्षांनी ते करताना एकमेकाला केलेले सहकार्य" हे कळीचे मुद्दे असतात. याशिवाय, समुद्रावरच्या दीर्घसफरी करण्याच्या वेळेस ते जीवन-मरणाचे मुद्दे होऊ शकतात. मोठ्या आकाराचे काही स्थानिक पक्षीही व्ही फॉर्मेशनने ऊडतात हे खरे आहे. उर्जा वाचवणे किंवा आळस करणे किंवा दुसर्‍याच्या श्रमाचा फायदा लुटणे ही काही मानवाची मक्तेदारी नाही ! हे प्राण्यांच्या (यात मानवसुद्धा आलाच) "दुधारी" हुशारीचेच लक्षण आहे ;) =))

प्रत्येक भाग वाचनीय. प्राणी-पक्षी ह्यांच्याविषयी वाचले की एकच समजते....."मानव हा पृथ्वीवरील सगळ्यात उपद्रवी जीव आहे."

In reply to by डॉ सुहास म्हात्रे

पण काका लेख वाचून तर द्या सगळ्यांना आधीचा काय धन्यावादाची घाई करताय? व्ही शेप प्रेमी पैजारबुवा,

स्वीट टॉकर 04/05/2016 - 12:02
तुमचा प्रत्येक लेख वाचनीयच असतो! खूप नवीन माहिती आणि अतिशय रोचक. त्यातून या वेळेस वाचता वाचता सुरेल पार्श्वसंगीताची देखील तुम्ही व्यवस्था केलीत! पुढच्या लेखांच्या प्रतीक्षेत! नाखु - तुमच्या प्रतिसादात एक दुरुस्ती करू का? मानव हा पृथ्वीवरील एकमेव उपद्रवी+लोभी जीव आहे.

वेल्लाभट 04/05/2016 - 17:04
जबरदस्त लेखमाला इतकी रंजक माहिती आहे ही...... अनेक गोष्टी माहिती नव्हत्या यातल्या. एरोडायनॅमिक्स वगैरे तर क्लासच.

वेगळाच धम्माल विषय. सर्व लेख आत्ताच वाचले. एक प्रश्न आहे. पचनसंस्थेच्या घटलेल्या वजनाचे रूपांतर ऊर्जेत होते का? किंवा पचनसंस्थेचा काही भाग इंधनाचे कार्य करतो का? एका अफलातून लेखमालेबद्दल धन्यवाद. पुभाप्र.

In reply to by सुधीर कांदळकर

धन्यवाद ! पचनसंस्था आकसू लागली की त्यापासून मिळणारी उर्जा अर्थातच वापरली जाते हे नक्की. ती साठवून मग उड्डाणाला वापरली जाते की सुरुवातीच्या उड्डाणासाठी तडक खर्च केली जाते याबद्दल माझ्या वाचनात काही आले नाही. मात्र, त्या पचनसंस्थेच्या आकसण्यामुळे पक्षाच्या कमी झालेल्या दोन-पाच ग्रॅम वजनामुळे महाभरार्‍यांसाठी लागणार्‍या उर्जेमधे बचत होते हे नक्की.
=================================================================== ऊड ऊड रे प्लोव्हू... ३०,००० किमीची फेरी मारून येऊ !

ऊड ऊड रे प्लोव्हू... ३०,००० किमीची फेरी मारून येऊ ! : ०४ : डोळे हे चुंबकीय गडे !

डॉ सुहास म्हात्रे ·

या लेखमाले नंतर माणसाकडे काय काय नाही याची यादी बरीच मोठी होणार असे दिसते. ही असली चुंबकिय दृष्टीची कल्पना सुध्दा मी या आधी कधी केली नव्हती. पैजारबुवा,

सनईचौघडा 29/04/2016 - 12:16
खरे तर आपल्यापेक्षा प्राणी जगत हे संदेश दळणव़ळणामध्ये खुपच प्रगत आहे. डॉल्फिन विषयी तर सगळेजण जाणतातच के ते सोनार व्हेव्हज वापरुन एकमेकांशी संभाषण करतात. मागे डिस्कवरीवर दाखवले होते की हत्ती सुध्दा अशा प्रकारचे आवाज काढातात जे मानावाला जाणवतच नाहीत. जी ने ३० वर्षे संशोधन केले आहे अशा एका शास्त्रज्ञ बाईने ते आवाज रेकॉर्ड केले व ऐकण्याचा प्रयत्न केला तेव्हा अवाज ऐकु आले नाहीत. पण जेव्हा ती कॅसेट १०००० का काहीश्या पटीने वेगात फिरवली तेव्हा काही तरी बारीक कुचुकूचु असे आवाज ऐकु आले. तिला आढळले की हत्ती प्रवास करताना एक कळप ३० कि.मी लांब असलेल्या कळपाला सोनार व्हेव्हजने पुढे काही धोका आहे का किंवा पाणी उप्लब्ध आहे की नाही हे कळवतात. मग भले मधे डोंगर जरी आडवा असला तरी काही अडथळा येत नाही. सगळे अजब आहे. सामान्यज्ञानचा अभिलाषी पम्या

In reply to by सनईचौघडा

धन्यवाद ! एकमेकाशी संवाद साधण्याच्या अनेक दृश्य व आवाजी पद्धती अनेक प्राण्यांमधे विकसित झाल्या आहेत यात वादच नाही. तसेच इतर बर्‍याच प्राण्यांची ज्ञानेंद्रिये मानवी ज्ञानेंद्रियांपेक्षा खूप वेगळ्या पद्धतिने विकसित झाली आहेत, उदा: कुत्रे व डॉल्फिन मानवी कानाच्या क्षमतेच्या श्रेणीबाहेरील (रेंज) खूप कमी तरंगलांबीचे आवाज ऐकू शकतात. पण ही सगळी वेगवेगळ्या प्राण्यांमधे त्याच संवेदना (उदा आवाज) स्विकारण्याच्या वेगवेगळ्या क्षमतेची उदाहरणे आहेत. याविरुद्ध, "पृथ्वीच्या चुंबकीय क्षेत्राची संवेदना असणे आणि त्याचे पृथ्वीच्या पोटातील हालचालीने होणार्‍या आवाजाबरोबर एकत्रिकरण करून प्रवासी नकाशा बनविण्याची क्षमता इवल्याश्या मेंदूत असणे", ही अत्यंत वेगळी आणि कल्पनेपलिकडील क्षमता प्रवासी पक्षांत आहे. हे खूपच विशेष आहे. मुख्य म्हणजे अश्या "साय्-फाय् चित्रपटात"ही अविश्वसनिय वाटणार्‍या गोष्टी मानवापेक्षा उत्क्रांतीच्या अनेक पायर्‍या खाली असलेल्या प्राण्यांत सतत उघडकीस येत आहेत ! याचा साधा सरळ अर्थ असा की, माणुस आज जरी उत्क्रांतीच्या सर्वात वरच्या पायरीवर उभा असला तरी, फक्त त्याच्याकडेच सर्वोत्तम उत्क्रांत झालेल्या क्षमता आहेत असे नाही ! खरे सत्य हेच की, माणसात उत्क्रांत झालेल्या क्षमतांनी त्याला गेल्या २ लाख वर्षांत पृथ्वीवरील सर्वात प्रबळ प्राणी बनण्यास मदत केली आहे... पण तरीही, तो निसर्गात तयार झालेले सर्व बाबतीतले सर्वोत्तम उत्पादन आहे, असे अजिबात नाही ! जीवभौतीकशास्त्राच्या संशोधनात अशी अनेक उदाहरणे उघड होत आहेत की ज्यांचा मानवाला आपली साधने (टूल्स) अधिक विकसित करण्यासाठी उपयोग होत आहे. याचे उत्तम उदाहरण म्हणजे : मानवी कानांना ऐकू न येणार्‍या तरंगलांबींचा आवाज करून आणि त्याचे परावर्तन (एको) ऐकून वटवाघळे त्यांच्या उडण्याचा मार्ग ठरवतात. त्यामुळेच ती अंधार्‍या गुहेतही, भिंतींवर अथवा एकमेकावर न आदळता उडू शकतात. या माहितीचा उपयोग करून विमानांचा मागोवा घेणारे "रडार (radar)" हे उपकरण बनवले गेले आहे. निसर्गात अश्या चमत्कृतीपूर्ण गोष्टींचे मोठे भांडार दडलेले आहे... ते इतके मोठे आहे की त्याला समजून घेण्यासाठी सर्वात मोठी मर्यादा (लिमिटेशन), निसर्गातल्या सर्वात जास्त उत्क्रांत प्राण्याच्या (मानवाच्या) विचारशक्तीची मर्यादा, हीच आहे ! :)

(या पूर्वीच्या भागांना प्रतिसाद देऊ शकलो नाही.) माझ्या आवडीचा आणि अभ्यासाचा विषय. अशाच अभ्यासासाठी या वर्षी (कदाचित) पक्ष्यांना कडं लावण्याच्या प्रकल्पात सहभागी व्हायची संधी मिळण्याची शक्यता आहे. बघू या कसं जमतंय ते... तुम्ही फ्रूट फ्लाय या कीटकाचा संदर्भ दिला आहे. कीटकांमध्ये काही जातींची फूलपाखरंही स्थलांतर करतात - काही स्थानिक, तर काही खूप लांब अंतरावर स्थलांतर करतात. मोनार्च हे फूलपाखरू या बाबतीत दादा मानलं जातं, त्याच्या स्थलांतराचा बराच अभ्यास झाला आहे. अलीकडे असं आढळलंय की त्यांच्या पोटावर आडवी पसरलेली, ठिपक्यांसारखी केंद्रं असतात. ती चुंबकीय क्षेत्राला संवेदनशील असतात, त्याद्वारे त्यांना चुंबकीय क्षेत्राचं ज्ञान होतं आणि स्थलांतरासाठी दिशाज्ञान होतं. लेखमाला मस्त चालली आहे. एकूण मेजवानी आहे. त्यासाठी धन्यवाद.

In reply to by सुधांशुनूलकर

धन्यवाद ! अशाच अभ्यासासाठी या वर्षी (कदाचित) पक्ष्यांना कडं लावण्याच्या प्रकल्पात सहभागी व्हायची संधी मिळण्याची शक्यता आहे. बघू या कसं जमतंय ते... भन्नाट ! नशीबवान आहात ! मोनार्क फुलपाखरू तर प्रवासी प्राण्यांच्या यादीत फार फार वर आहे. एवढासा जीव, इवलासा मेंदू आणि इवलेसे कांपाउंड डोळे... पण भरारी मानवाला लाजवेल अशी ! जमल्यास त्याच्यावरही एक लेख या लेखमालेत टाकायचा विचार आहे.

In reply to by डॉ सुहास म्हात्रे

प्रचेतस 30/04/2016 - 09:35
मोनार्क फुलपाखरांच्या स्थलांतराचा अतिशय सुंदर व्हिडियो बीबीसी च्या प्लॅनेट अर्थ ह्या कार्यक्रमात पाहिलेला होता.

In reply to by डॉ सुहास म्हात्रे

बोका 01/05/2016 - 09:57
या निमित्ताने मिपा वरील किलमाऊस्की, (हेमांगी के ) यांच्या मोनार्क लेखमालेचा दुवा ... मोनार्क - १ मोनार्क - २ मोनार्क - ३ मोनार्क - ४

आपण आत्तापर्यंत लिहिलेल्या सर्व लेख मालिकांचे प्रत्येकी ई-बुक बनवावे हि विनंती. उत्तम संग्रह होईल. जागतिक भरारी न मारणार्‍या पण इतर वैशिष्ट्ये असलेल्या इतर पक्षांबाबतही लिहावे. उत्तम लेखमालिका अशीच चालू राहो...

चाणक्य 02/05/2016 - 13:30
आत्ता सगळे भाग वाचून काढले. काका, खूप मस्त लिहिता आहात. काय स्टॅमिना आहे या प्लोव्हर चा.

बोका-ए-आझम 02/05/2016 - 16:03
पक्ष्यांना जर माणसाप्रमाणे प्रगत मेंदू लाभला असता तर पृथ्वीवर त्यांनीच राज्य केलं असतं. पण उडताना वजनाचा अडथळा होऊ नये म्हणून तो आकाराने छोटा असतो. तरीही ते त्याच्या सहाय्याने जे काही करतात ते निव्वळ अफाट आहे!

आकार छोटा असल्यामुळे ह्या पक्षाला हवेत तरंगण्यासाठी पंखांची अधिक वेळा हालचाल करावी लगते. आकाराने मोठे असलेल्या इतर पक्षांप्रमाणे ह्या पक्षाला ग्लाइड करता येते की नाही ते माहीत नाही. मोठे पक्षी स्थलांतर करताना पंखांची मर्यादीत हालचाल करतात व उर्जा वाचवतात. जसे उष्ण हवेच्या प्रवाहाचा उपयोग करुन एअर लिफ्ट घेणे, पंख न हलवता ग्लाइड करुन अधिक अंतर कापणे, वार्‍याच्या झोताचा योग्य वापर करणे, समुहाने 'व्ही' आकारात उडणे इ. प्रकारे आपला प्रवास अधिक कार्यक्षमतेने करतात. त्यामुळे हा पक्षी आपल्या महाभरारीत नेमक्या कोणत्या कार्यक्षम पद्धती वापरतो ह्याबदल उत्सुकता आहे.

या लेखमाले नंतर माणसाकडे काय काय नाही याची यादी बरीच मोठी होणार असे दिसते. ही असली चुंबकिय दृष्टीची कल्पना सुध्दा मी या आधी कधी केली नव्हती. पैजारबुवा,

सनईचौघडा 29/04/2016 - 12:16
खरे तर आपल्यापेक्षा प्राणी जगत हे संदेश दळणव़ळणामध्ये खुपच प्रगत आहे. डॉल्फिन विषयी तर सगळेजण जाणतातच के ते सोनार व्हेव्हज वापरुन एकमेकांशी संभाषण करतात. मागे डिस्कवरीवर दाखवले होते की हत्ती सुध्दा अशा प्रकारचे आवाज काढातात जे मानावाला जाणवतच नाहीत. जी ने ३० वर्षे संशोधन केले आहे अशा एका शास्त्रज्ञ बाईने ते आवाज रेकॉर्ड केले व ऐकण्याचा प्रयत्न केला तेव्हा अवाज ऐकु आले नाहीत. पण जेव्हा ती कॅसेट १०००० का काहीश्या पटीने वेगात फिरवली तेव्हा काही तरी बारीक कुचुकूचु असे आवाज ऐकु आले. तिला आढळले की हत्ती प्रवास करताना एक कळप ३० कि.मी लांब असलेल्या कळपाला सोनार व्हेव्हजने पुढे काही धोका आहे का किंवा पाणी उप्लब्ध आहे की नाही हे कळवतात. मग भले मधे डोंगर जरी आडवा असला तरी काही अडथळा येत नाही. सगळे अजब आहे. सामान्यज्ञानचा अभिलाषी पम्या

In reply to by सनईचौघडा

धन्यवाद ! एकमेकाशी संवाद साधण्याच्या अनेक दृश्य व आवाजी पद्धती अनेक प्राण्यांमधे विकसित झाल्या आहेत यात वादच नाही. तसेच इतर बर्‍याच प्राण्यांची ज्ञानेंद्रिये मानवी ज्ञानेंद्रियांपेक्षा खूप वेगळ्या पद्धतिने विकसित झाली आहेत, उदा: कुत्रे व डॉल्फिन मानवी कानाच्या क्षमतेच्या श्रेणीबाहेरील (रेंज) खूप कमी तरंगलांबीचे आवाज ऐकू शकतात. पण ही सगळी वेगवेगळ्या प्राण्यांमधे त्याच संवेदना (उदा आवाज) स्विकारण्याच्या वेगवेगळ्या क्षमतेची उदाहरणे आहेत. याविरुद्ध, "पृथ्वीच्या चुंबकीय क्षेत्राची संवेदना असणे आणि त्याचे पृथ्वीच्या पोटातील हालचालीने होणार्‍या आवाजाबरोबर एकत्रिकरण करून प्रवासी नकाशा बनविण्याची क्षमता इवल्याश्या मेंदूत असणे", ही अत्यंत वेगळी आणि कल्पनेपलिकडील क्षमता प्रवासी पक्षांत आहे. हे खूपच विशेष आहे. मुख्य म्हणजे अश्या "साय्-फाय् चित्रपटात"ही अविश्वसनिय वाटणार्‍या गोष्टी मानवापेक्षा उत्क्रांतीच्या अनेक पायर्‍या खाली असलेल्या प्राण्यांत सतत उघडकीस येत आहेत ! याचा साधा सरळ अर्थ असा की, माणुस आज जरी उत्क्रांतीच्या सर्वात वरच्या पायरीवर उभा असला तरी, फक्त त्याच्याकडेच सर्वोत्तम उत्क्रांत झालेल्या क्षमता आहेत असे नाही ! खरे सत्य हेच की, माणसात उत्क्रांत झालेल्या क्षमतांनी त्याला गेल्या २ लाख वर्षांत पृथ्वीवरील सर्वात प्रबळ प्राणी बनण्यास मदत केली आहे... पण तरीही, तो निसर्गात तयार झालेले सर्व बाबतीतले सर्वोत्तम उत्पादन आहे, असे अजिबात नाही ! जीवभौतीकशास्त्राच्या संशोधनात अशी अनेक उदाहरणे उघड होत आहेत की ज्यांचा मानवाला आपली साधने (टूल्स) अधिक विकसित करण्यासाठी उपयोग होत आहे. याचे उत्तम उदाहरण म्हणजे : मानवी कानांना ऐकू न येणार्‍या तरंगलांबींचा आवाज करून आणि त्याचे परावर्तन (एको) ऐकून वटवाघळे त्यांच्या उडण्याचा मार्ग ठरवतात. त्यामुळेच ती अंधार्‍या गुहेतही, भिंतींवर अथवा एकमेकावर न आदळता उडू शकतात. या माहितीचा उपयोग करून विमानांचा मागोवा घेणारे "रडार (radar)" हे उपकरण बनवले गेले आहे. निसर्गात अश्या चमत्कृतीपूर्ण गोष्टींचे मोठे भांडार दडलेले आहे... ते इतके मोठे आहे की त्याला समजून घेण्यासाठी सर्वात मोठी मर्यादा (लिमिटेशन), निसर्गातल्या सर्वात जास्त उत्क्रांत प्राण्याच्या (मानवाच्या) विचारशक्तीची मर्यादा, हीच आहे ! :)

(या पूर्वीच्या भागांना प्रतिसाद देऊ शकलो नाही.) माझ्या आवडीचा आणि अभ्यासाचा विषय. अशाच अभ्यासासाठी या वर्षी (कदाचित) पक्ष्यांना कडं लावण्याच्या प्रकल्पात सहभागी व्हायची संधी मिळण्याची शक्यता आहे. बघू या कसं जमतंय ते... तुम्ही फ्रूट फ्लाय या कीटकाचा संदर्भ दिला आहे. कीटकांमध्ये काही जातींची फूलपाखरंही स्थलांतर करतात - काही स्थानिक, तर काही खूप लांब अंतरावर स्थलांतर करतात. मोनार्च हे फूलपाखरू या बाबतीत दादा मानलं जातं, त्याच्या स्थलांतराचा बराच अभ्यास झाला आहे. अलीकडे असं आढळलंय की त्यांच्या पोटावर आडवी पसरलेली, ठिपक्यांसारखी केंद्रं असतात. ती चुंबकीय क्षेत्राला संवेदनशील असतात, त्याद्वारे त्यांना चुंबकीय क्षेत्राचं ज्ञान होतं आणि स्थलांतरासाठी दिशाज्ञान होतं. लेखमाला मस्त चालली आहे. एकूण मेजवानी आहे. त्यासाठी धन्यवाद.

In reply to by सुधांशुनूलकर

धन्यवाद ! अशाच अभ्यासासाठी या वर्षी (कदाचित) पक्ष्यांना कडं लावण्याच्या प्रकल्पात सहभागी व्हायची संधी मिळण्याची शक्यता आहे. बघू या कसं जमतंय ते... भन्नाट ! नशीबवान आहात ! मोनार्क फुलपाखरू तर प्रवासी प्राण्यांच्या यादीत फार फार वर आहे. एवढासा जीव, इवलासा मेंदू आणि इवलेसे कांपाउंड डोळे... पण भरारी मानवाला लाजवेल अशी ! जमल्यास त्याच्यावरही एक लेख या लेखमालेत टाकायचा विचार आहे.

In reply to by डॉ सुहास म्हात्रे

प्रचेतस 30/04/2016 - 09:35
मोनार्क फुलपाखरांच्या स्थलांतराचा अतिशय सुंदर व्हिडियो बीबीसी च्या प्लॅनेट अर्थ ह्या कार्यक्रमात पाहिलेला होता.

In reply to by डॉ सुहास म्हात्रे

बोका 01/05/2016 - 09:57
या निमित्ताने मिपा वरील किलमाऊस्की, (हेमांगी के ) यांच्या मोनार्क लेखमालेचा दुवा ... मोनार्क - १ मोनार्क - २ मोनार्क - ३ मोनार्क - ४

आपण आत्तापर्यंत लिहिलेल्या सर्व लेख मालिकांचे प्रत्येकी ई-बुक बनवावे हि विनंती. उत्तम संग्रह होईल. जागतिक भरारी न मारणार्‍या पण इतर वैशिष्ट्ये असलेल्या इतर पक्षांबाबतही लिहावे. उत्तम लेखमालिका अशीच चालू राहो...

चाणक्य 02/05/2016 - 13:30
आत्ता सगळे भाग वाचून काढले. काका, खूप मस्त लिहिता आहात. काय स्टॅमिना आहे या प्लोव्हर चा.

बोका-ए-आझम 02/05/2016 - 16:03
पक्ष्यांना जर माणसाप्रमाणे प्रगत मेंदू लाभला असता तर पृथ्वीवर त्यांनीच राज्य केलं असतं. पण उडताना वजनाचा अडथळा होऊ नये म्हणून तो आकाराने छोटा असतो. तरीही ते त्याच्या सहाय्याने जे काही करतात ते निव्वळ अफाट आहे!

आकार छोटा असल्यामुळे ह्या पक्षाला हवेत तरंगण्यासाठी पंखांची अधिक वेळा हालचाल करावी लगते. आकाराने मोठे असलेल्या इतर पक्षांप्रमाणे ह्या पक्षाला ग्लाइड करता येते की नाही ते माहीत नाही. मोठे पक्षी स्थलांतर करताना पंखांची मर्यादीत हालचाल करतात व उर्जा वाचवतात. जसे उष्ण हवेच्या प्रवाहाचा उपयोग करुन एअर लिफ्ट घेणे, पंख न हलवता ग्लाइड करुन अधिक अंतर कापणे, वार्‍याच्या झोताचा योग्य वापर करणे, समुहाने 'व्ही' आकारात उडणे इ. प्रकारे आपला प्रवास अधिक कार्यक्षमतेने करतात. त्यामुळे हा पक्षी आपल्या महाभरारीत नेमक्या कोणत्या कार्यक्षम पद्धती वापरतो ह्याबदल उत्सुकता आहे.
=================================================================== उड उड रे प्लोव्हू... ३०,००० किमीची फेरी मारून येऊ !

भारताच्या शिरपेचातला अजून एक तुरा - IRNSS

सोत्रि ·

समस्त वैज्ञानिक, तंत्रज्ञ आणि इस्रोचं अभिनंदन. जीपीएससारख्या सुविधेवर परकीयांवर अवलंबून राहाणं ही राष्ट्रीय सुरक्षेत कमतरता होती. ती यामुळे भरून निघाली.

सुबोध खरे 28/04/2016 - 19:56
कारगिल युद्धाच्या वेळी स्वतंत्र आणि भारतीय प्रादेशिक सुचालन उपग्रह प्रणालीची गरज अधोरेखित झाली होती. त्यावेळी अमेरिकेच्या GPS ह्या प्रणालीचा उपयोग भारताला करावा लागला होता यात एक सुधारणा मी सुचवेन. कारगिल युद्धाच्या वेळेस पाकिस्तानी ठाण्यांवर अचूक हल्ला करण्यासाठी आवश्यक असणारी GPS प्रणाली देण्यास अमेरिकेने नकार दिला होता. यामुळे स्वताचे तंत्रज्ञान विकसित करण्याची नितांत आवश्यकता भारताला जाणवू लागली त्याचे फलित म्हणजे हे सात उपग्रह पाठवून भारताने आपले उद्दिष्ट गाठले आहे. याबद्दल भारतीय शास्त्रज्ञांचे आणी भारत सरकारचे( कोणत्याही पक्षाचे असले तरीही) अभिनंदन करावे तेवढे थोडेच आहे http://timesofindia.indiatimes.com/home/science/How-Kargil-spurred-India-to-design-own-GPS/articleshow/33254691.cms

अनुप ढेरे 28/04/2016 - 20:25
१. Standard Positioning Service (SPS) - हे सेवा खुली असून नागरी उपयोगाकरिता वापरण्यात येईल.
आत्ताच्या स्मार्ट फोनांमध्ये हे वापरता येईल का? का ही सेवा वापरणारे वेगळे स्मार्टफोन्स/ किंवा इतर नॅविगेशन उपकरणं बनवायला लागतील?

इस्रोच्या शिरपेचात अजून एका मानाच्या तुर्‍याची भर पडली आहे ! अमेरिकेतील हितसंबधी संस्थांच्या भारत- व इस्रो- विरोधी हालचाली (लॉबियिंग) सुरु झाल्या आहेत. इस्रो उपग्रह अवकाशात पाठविण्याची उत्तम सेवा आंतरराष्ट्रिय स्तरावर तुलनेने फार कमी किमतीत विकते आहे. त्यांच्या मक्तेदारीला निर्माण झालेली ही स्पर्धा त्यांना खुपत आहे... USA & NASA Afraid of India & ISRO as the later rewrites "Space Economics" जेव्हा कोणी तुमच्यावर टीका करण्याचे कष्ट घेऊ लागले की समजावे की आपले काही स्थान नक्की निर्माण झाले आहे ! :)

शाम भागवत 29/04/2016 - 10:21
सिमेवरची घुसखोरी तसेच लपून बसलेले अतिरेक्यांवर कारवाई करणे सोपे होईल. आतिरेकी भारतात घुसविण्यासाठी पाकिस्तानी सैन्याला आता सिमेवर तोफगोळ्यांचा मारा करणे खूप महागात पडेल, कारण पाकिस्तानी तोफांचे लोकेशन शोधून केलेला हल्ला खूपच अचूक असेल. यावर सोन्याबापूं सारख्या तज्ञांचे विचार ऐकायला आवडतील.

समस्त वैज्ञानिक, तंत्रज्ञ आणि इस्रोचं अभिनंदन. जीपीएससारख्या सुविधेवर परकीयांवर अवलंबून राहाणं ही राष्ट्रीय सुरक्षेत कमतरता होती. ती यामुळे भरून निघाली.

सुबोध खरे 28/04/2016 - 19:56
कारगिल युद्धाच्या वेळी स्वतंत्र आणि भारतीय प्रादेशिक सुचालन उपग्रह प्रणालीची गरज अधोरेखित झाली होती. त्यावेळी अमेरिकेच्या GPS ह्या प्रणालीचा उपयोग भारताला करावा लागला होता यात एक सुधारणा मी सुचवेन. कारगिल युद्धाच्या वेळेस पाकिस्तानी ठाण्यांवर अचूक हल्ला करण्यासाठी आवश्यक असणारी GPS प्रणाली देण्यास अमेरिकेने नकार दिला होता. यामुळे स्वताचे तंत्रज्ञान विकसित करण्याची नितांत आवश्यकता भारताला जाणवू लागली त्याचे फलित म्हणजे हे सात उपग्रह पाठवून भारताने आपले उद्दिष्ट गाठले आहे. याबद्दल भारतीय शास्त्रज्ञांचे आणी भारत सरकारचे( कोणत्याही पक्षाचे असले तरीही) अभिनंदन करावे तेवढे थोडेच आहे http://timesofindia.indiatimes.com/home/science/How-Kargil-spurred-India-to-design-own-GPS/articleshow/33254691.cms

अनुप ढेरे 28/04/2016 - 20:25
१. Standard Positioning Service (SPS) - हे सेवा खुली असून नागरी उपयोगाकरिता वापरण्यात येईल.
आत्ताच्या स्मार्ट फोनांमध्ये हे वापरता येईल का? का ही सेवा वापरणारे वेगळे स्मार्टफोन्स/ किंवा इतर नॅविगेशन उपकरणं बनवायला लागतील?

इस्रोच्या शिरपेचात अजून एका मानाच्या तुर्‍याची भर पडली आहे ! अमेरिकेतील हितसंबधी संस्थांच्या भारत- व इस्रो- विरोधी हालचाली (लॉबियिंग) सुरु झाल्या आहेत. इस्रो उपग्रह अवकाशात पाठविण्याची उत्तम सेवा आंतरराष्ट्रिय स्तरावर तुलनेने फार कमी किमतीत विकते आहे. त्यांच्या मक्तेदारीला निर्माण झालेली ही स्पर्धा त्यांना खुपत आहे... USA & NASA Afraid of India & ISRO as the later rewrites "Space Economics" जेव्हा कोणी तुमच्यावर टीका करण्याचे कष्ट घेऊ लागले की समजावे की आपले काही स्थान नक्की निर्माण झाले आहे ! :)

शाम भागवत 29/04/2016 - 10:21
सिमेवरची घुसखोरी तसेच लपून बसलेले अतिरेक्यांवर कारवाई करणे सोपे होईल. आतिरेकी भारतात घुसविण्यासाठी पाकिस्तानी सैन्याला आता सिमेवर तोफगोळ्यांचा मारा करणे खूप महागात पडेल, कारण पाकिस्तानी तोफांचे लोकेशन शोधून केलेला हल्ला खूपच अचूक असेल. यावर सोन्याबापूं सारख्या तज्ञांचे विचार ऐकायला आवडतील.
मागे GPS वर लिहिलेल्या लेखात संपूर्ण भारतीय बनावटीच्या ग्लोबल पोजीशानिंग सिस्टिमचा उल्लेख केला होता. त्यात म्हटलेल्या आयआरएनएसएस (IRNSS) प्रादेशिक सुचालन उपग्रह प्रणालीने आज एक मैलाचा दगड पार केला.