पडघम- २०१४ भाग १: राज्य विधानसभा आणि लोकसभा निवडणुकांमधील मतदानामधील फरक
| मध्य प्रदेश | २००८-०९ | |||||
|---|---|---|---|---|---|---|
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ३७.६% | ४३.४% | ५.८% | १४३ | १२२ | -२१ |
| कॉंग्रेस | ३२.४% | ४०.१% | ७.७% | ७१ | १०० | २९ |
| बसप | ९.०% | ५.९% | -३.१% | ७ | ७ | ० |
| अपक्ष आणि इतर | २१.०% | १०.६% | -१०.४% | ९ | १ | -८ |
| राजस्थान | २००८-०९ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ३४.३% | ३६.६% | २.३% | ७८ | ४२ | -३६ |
| कॉंग्रेस | ३६.८% | ४७.२% | १०.४% | ९६ | १४४ | ४८ |
| बसप | ७.६% | ३.४% | -४.२% | ६ | ० | -६ |
| अपक्ष आणि इतर | २१.३% | १२.८% | -८.५% | २० | १४ | -६ |
| दिल्ली | २००८-०९ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ३६.३% | ३५.२% | -१.१% | २३ | २ | -२१ |
| कॉंग्रेस | ४०.३% | ५७.१% | १६.८% | ४३ | ६८ | २५ |
| बसप | १४.०% | ५.३% | -८.७% | २ | ० | -२ |
| अपक्ष आणि इतर | ९.४% | २.४% | -७.०% | २ | ० | -२ |
| छत्तिसगड | २००८-०९ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ४०.३% | ४५.०% | ४.७% | ५० | ६० | १० |
| कॉंग्रेस | ३८.६% | ३३.७% | -४.९% | ३८ | २३ | -१५ |
| बसप | ६.१% | ४.३% | -१.८% | २ | १ | -१ |
| अपक्ष आणि इतर | १५.०% | १७.०% | २.०% | ० | ६ | ६ |
| मध्य प्रदेश | २००३-०४ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ४२.५% | ४८.१% | ५.६% | १७३ | १८७ | १४ |
| कॉंग्रेस | ३१.६% | ३४.१% | २.५% | ३८ | ३८ | ० |
| बसप | ७.३% | ४.८% | -२.५% | २ | २ | ० |
| अपक्ष आणि इतर | १८.६% | १३.०% | -५.६% | १७ | ३ | -१४ |
| राजस्थान | २००३-०४ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ३९.२% | ४९.०% | ९.८% | १२० | १४० | २० |
| कॉंग्रेस | ३५.६% | ४१.५% | ५.९% | ५६ | ५८ | २ |
| बसप | ४.०% | ३.२% | -०.८% | २ | ० | -२ |
| अपक्ष आणि इतर | २१.२% | ६.३% | -१४.९% | २२ | २ | -२० |
| दिल्ली | २००३-०४ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ३५.२% | ४०.७% | ५.५% | २० | १४ | -६ |
| कॉंग्रेस | ४८.१% | ५४.८% | ६.७% | ४७ | ५६ | ९ |
| बसप | ५.८% | २.५% | -३.३% | २ | ० | -२ |
| अपक्ष आणि इतर | १०.९% | २.०% | -८.९% | १ | ० | -१ |
| छतिसगड | २००३-०४ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ३९.३% | ४७.८% | ८.५% | ५० | ७३ | २३ |
| कॉंग्रेस | ३६.७% | ४०.२% | ३.५% | ३७ | १७ | -२० |
| बसप | ४.४% | ४.५% | ०.१% | २ | ० | -२ |
| अपक्ष आणि इतर | १९.६% | ७.५% | -१२.१% | १ | ० | -१ |
| कर्नाटक | २००८-०९ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ३३.९% | ४१.६% | ७.७% | ११० | १४० | ३० |
| कॉंग्रेस | ३४.८% | ३७.६% | २.८% | ८० | ६२ | -१८ |
| जनता दल (ध) | १९.०% | १३.६% | -५.४% | २८ | २२ | -६ |
| अपक्ष आणि इतर | १२.३% | ७.२% | -५.१% | ६ | ० | -६ |
| हिमाचल प्रदेश | २००७-०९ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ४३.८% | ४९.६% | ५.८% | ४१ | ४८ | ७ |
| कॉंग्रेस | ३८.९% | ४५.६% | ६.७% | २३ | २० | -३ |
| अपक्ष आणि इतर | १७.३% | ४.८% | -१२.५% | ४ | ० | -४ |
| गुजरात | २००७-०९ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| भाजप | ४९.१% | ४६.५% | -२.६% | ११७ | १०५ | -१२ |
| कॉंग्रेस | ३८.०% | ४३.४% | ५.४% | ५९ | ७६ | १७ |
| अपक्ष आणि इतर | १२.९% | १०.१% | -२.८% | ६ | १ | -५ |
| कर्नाटक | १९९४-९६ | |||||
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | ||||
| जनता दल | ३३.५% | ३४.९% | १.४% | |||
| भाजप | १७.०% | २४.८% | ७.८% | |||
| कॉंग्रेस | २७.०% | ३०.३% | ३.३% | |||
| कर्नाटक कॉंग्रेस पक्ष | ७.३% | ३.१% | -४.२% | |||
| अपक्ष आणि इतर | १५.२% | ६.९% | -८.३% |
| उत्तर प्रदेश | २००७-०९ | |||||
|---|---|---|---|---|---|---|
| विधानसभा मते% | लोकसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा जागा विजय | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | जागांमधील फरक | |
| सप | २५.४% | २३.३% | -२.१% | ९७ | ११८ | २१ |
| बसप | ३०.४% | २७.४% | -३.०% | २०६ | १०० | -१०६ |
| भाजप | १७.०% | १७.५% | ०.५% | ५१ | ६२ | ११ |
| कॉंग्रेस | ८.६% | १८.३% | ९.७% | २२ | ९५ | ७३ |
| अपक्ष आणि इतर | १८.६% | १३.५% | -५.१% | २७ | ५० | २३ |
| वर्ष | राज्य | निवडणुक | कॉंग्रेस | भाजप | प्रादेशिक १ | प्रादेशिक २ | प्रादेशिक ३ | अपक्ष/इतर | प्रादेशिक पक्ष |
| २००९ | आंध्र प्रदेश | लोकसभा | ३८.९% | ३.८% | २४.९% | १५.७% | ६.१% | १०.६% | १: तेलुगु देसम, २: प्रजाराज्यम, ३: तेलंगण राष्ट्रसमिती |
| २००९ | आंध्र प्रदेश | विधानसभा | ३६.५% | २.९% | २८.१% | १६.३% | ४.०% | १२.२% | १: तेलुगु देसम, २: प्रजाराज्यम, ३: तेलंगण राष्ट्रसमिती |
| २००९ | ओरिसा | लोकसभा | ३२.७% | १६.९% | ३७.२% | १३.२% | १: बिजू जनता दल | ||
| २००९ | ओरिसा | विधानसभा | २९.१% | १५.१% | ३८.९% | १६.९% | १: बिजू जनता दल | ||
| २००४ | कर्नाटक | लोकसभा | ३६.८% | ३४.७% | २०.५% | ८.०% | १: जनता दल (ध) | ||
| २००४ | कर्नाटक | विधानसभा | ३५.३% | २८.३% | २०.८% | १५.६% | १: जनता दल (ध) | ||
| १९९९ | कर्नाटक | लोकसभा | ४५.४% | २७.२% | १०.९% | १३.३% | ३.२% | १: जनता दल (ध), २: जनता दल (युनायटेड) | |
| १९९९ | कर्नाटक | विधानसभा | ४०.८% | २०.७% | १०.४% | १३.५% | १४.६% | १: जनता दल (ध), २: जनता दल (युनायटेड) | |
| १९९९ | महाराष्ट्र | लोकसभा | २९.७% | २१.२% | २१.६% | १६.९% | १०.६% | १: राष्ट्रवादी, २: शिवसेना | |
| १९९९ | महाराष्ट्र | विधानसभा | ३१.२% | १६.७% | २५.९% | १९.९% | ६.३% | १: राष्ट्रवादी, २: शिवसेना | |
| १९९८ | गुजरात | लोकसभा | ३६.५% | ४८.३% | १०.२% | ५.०% | १: राष्ट्रीय जनता पक्ष (वाघेला) | ||
| १९९८ | गुजरात | विधानसभा | ३४.८% | ४४.८% | ११.७% | ८.७% | १: राष्ट्रीय जनता पक्ष (वाघेला) | ||
| १९९६ | आसाम | लोकसभा | ३१.६% | १५.९% | २७.२% | ३.९% | ३.४% | १८.०% | १: आसाम गण परिषद, २: दोन्ही कम्युनिस्ट, ३: तिवारी कॉंग्रेस |
| १९९६ | आसाम | विधानसभा | ३०.६% | १०.४% | २९.७% | ३.९% | ३.७% | २१.७% | १: आसाम गण परिषद, २: दोन्ही कम्युनिस्ट, ३: तिवारी कॉंग्रेस |
| १९९१ | आसाम | लोकसभा | २८.५% | ९.६% | १७.६% | ६.८% | ५.८% | ३१.७% | १: आसाम गण परिषद, २: दोन्ही कम्युनिस्ट, २: नूतन आसाम गण परिषद (फुकन) |
| १९९१ | आसाम | विधानसभा | २९.४% | ६.६% | १७.९% | ६.३% | ५.५% | ३४.३% | १: आसाम गण परिषद, २: दोन्ही कम्युनिस्ट, २: नूतन आसाम गण परिषद (फुकन) |
| १९९१ | उत्तर प्रदेश | लोकसभा | १८.०% | ३२.८% | २१.३% | १०.५% | ८.७% | ८.७% | १: जनता दल, २: जनता दल (ध)-चंद्रशेखर, ३: बसप |
| १९९१ | उत्तर प्रदेश | विधानसभा | १७.३% | ३१.५% | १८.८% | १२.५% | ९.४% | १०.५% | १: जनता दल, २: जनता दल (ध)-चंद्रशेखर, ३: बसप |
| १९८९ | उत्तर प्रदेश | लोकसभा | ३१.८% | ७.६% | ३५.९% | ९.९% | १४.८% | १: जनता दल, २: बसप | |
| १९८९ | उत्तर प्रदेश | विधानसभा | २७.६% | ११.६% | २९.७% | ९.४% | २१.७% | १: जनता दल, २: बसप |
In reply to उत्तम लेख आणि विदा. सर्वच by राजेश घासकडवी
स्थानिक पक्ष हा राष्ट्रीय पातळीवर सत्ता कधीच स्थापन करू शकत नाही.हो काहीही झाले तरी एखाद्या प्रादेशिक पक्षाला लोकसभेत बहुमत मिळणार नाही.तरीही मला वाटते की लोक मत देताना सत्तेत कोण येणार यापेक्षाही उमेदवार निवडून यायची शक्यता कितपत आहे याचा अंदाज बांधून मत देत असतात.एक उदाहरण द्यायचे झाले तर १९९४ च्या कर्नाटक विधानसभा निवडणुकांमध्ये माजी मुख्यमंत्री एस.बंगाराप्पा यांच्या कर्नाटक कॉंग्रेस पक्षाने ७.३% मते मिळवली होती पण १९९६ च्या लोकसभा निवडणुकांमध्ये त्या पक्षाची मते कमी होऊन ३.१% झाली.स्वत: बंगाराप्पा शिमोगा लोकसभा मतदारसंघातून लोकसभेवर निवडून गेले पण पक्षाचे इतर सगळे उमेदवार हरले.पक्षाचे इतर उमेदवार का हरले असावेत?ते उमेदवार विधानसभा निवडणुकीत निवडून जाऊ शकले असते पण लोकसभेत मात्र ते निवडून जायची शक्यता कमी (कारण मतदारसंघ मोठे असतात. तेव्हा मोठ्या प्रदेशात लोकांना हे उमेदवार निदान माहित तरी असतील ही शक्यता लहान प्रदेशापेक्षा कमी असते) हे मतदारांच्या लक्षात आले असावे.त्यामुळे त्या उमेदवारांना मत देऊन आपले मत फुकट का घालवा असा व्यवहारी विचार अधिक लोकांकडून केला जायची शक्यता जास्त. पण स्वत: बंगाराप्पा मात्र निवडून जायची शक्यता होतीच.तेव्हा त्यांना मत दिले तरी ते फुकट जाणार नाही असे वाटून लोकांनी त्यांना मत दिले असावे. अर्थातच हे सिध्द करण्यासाठी माझ्याकडे इतर कोणताही विदा किंवा इतर माहिती नाही.निवडणुकांमध्ये मला अतोनात रस असल्यामुळे गेली अनेक वर्षे निवडणुकांची आकडेवारी मी अभ्यासत आलेलो आहे.राष्ट्रीय पक्षांना लोकसभेत विधानसभेपेक्षा जास्त मते मिळतात तर प्रादेशिक पक्षांच्या बाबतीत याउलट घडते हे मी बघितलेले होते.तरीही गेल्या एका वर्षात सगळी आकडेवारी एक्सेलमध्ये आणल्यानंतर याविषयी मी अधिक ठोसपणे विधान करू शकलो.हे का घडत असावे याविषयीचा माझा हा अंदाज आहे.तो कितपत योग्य आहे याची कल्पना नाही.
दुसरी अशी शक्यता आहे की मतदारांना खरोखर कुठल्यातरी पातळीवर राज्यसरकारने केलेली कामं आणि केंद्र सरकारने केलेली कामं यातला फरक कळतो.हो बरोबर. लेखात लिहिलेल्या दोन शक्यतांमध्ये "राष्ट्रीय पातळीवरील मुद्द्यांसाठी राष्ट्रीय पक्षाला मत दिले जाणे आणि स्थानिक पातळीवरील मुद्द्यांसाठी प्रादेशिक पक्षाला मत दिले जाणे" ही पण एक शक्यता आहेच.
In reply to छानच लेख ! by विटेकर
याचबरोबर अन्टी इन्क्म्बसी चा किती फरक पडतो म्हणजे दोन्हीकडेही ..?हो प्रस्थापित विरोधी मत नक्की टक्केवारीत कसे दिसते हे एका लेखात लिहिणार आहे.
प्रादेशिक पक्ष हे लोकसभेला जागा जिंकत नसतील ही पण ते जागा पाडण्याचे काम नक्की करतात. उदा. मागच्या लोकसभेत पुण्याची सीट मनसेमुळे भाजपाला मिळाली नाही !हो बरोबर.या लेखात प्रामुख्याने मतांच्या टक्केवारीवर लक्ष केंद्रित केले आहे.कोणता पक्ष किती जागा जिंकतो यावर नाही. त्याविषयी नंतर लिहिणार आहे.
अशा परिस्थितीत प्रादेशिक पक्षांना लोकसभेत निवडणूक लढविण्यासच प्रत्यवाय करावा असे वाटते. राष्ट्रीय पातळीवर २-३ विचारधारा असणे फायद्याचे ठरेल. नाहीतरी इतक्या पक्षांचे अस्तित्व असूनही आपल्याकडे खर्या अर्थाने तीन च आघाड्या आहेत!लोकशाहीमध्ये तसे करता येणे शक्य नाही.राजकीय पक्षांची स्थापना करणे आणि निवडणुक लढविणे हा घटनेने सर्व नागरिकांना दिलेला अधिकार असल्यामुळे कोणालाही निवडणुक लढवायला बंदी कशी करणार? दुसरे म्हणजे सुरवातीपासून असा नियम असता तर लोकसभेत कॉंग्रेस सोडून अन्य पक्षांना निवडणुक लढवताच आली नसती.आज भाजप हा एक प्रबळ राष्ट्रीय पक्ष आहे.तरी १९५२ साली त्यांचे (जनसंघाचे) किती खासदार निवडून आले होते? तर ३. तर १९५७ साली ४ खासदार निवडून आले होते. सुरवातीला जनसंघही हा एका अर्थी प्रादेशिक पक्षाप्रमाणेच होता. भाजपने पहिल्यांदा तीन आकडी संख्या गाठली १९९१ मध्ये--पक्ष स्थापन होऊन ४० वर्षे झाल्यानंतर.जर अशी बंदी असती तर पक्षाला लोकसभा निवडणुक लढवता आलीच नसती आणि इतके मोठे व्हायची संधी मिळालीच नसती.
| हरियाणा | १९९९-२००० | |||||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | विधानसभा जागा विजय | जागांमधील फरक | |
| आय.एन.एल.डी | २८.७% | २९.६% | ०.९% | ४४ | ४७ | ३ |
| भाजप | २९.२% | ८.९% | -२०.३% | ४१ | ६ | -३५ |
| कॉंग्रेस | ३४.९% | ३१.२% | -३.७% | ५ | २१ | १६ |
| हरियाणा विकास पक्ष | २.७% | ५.५% | २.८% | ० | २ | २ |
| बसप | २.०% | ५.७% | ३.७% | ० | १ | १ |
| अपक्ष आणि इतर | २.५% | १९.१% | १६.६% | ० | १३ | १३ |
| ओरिसा | १९९९-२००० | |||||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | विधानसभा जागा विजय | जागांमधील फरक | |
| बिजू जनता दल | ३३.०% | २९.४% | -३.६% | ७४ | ६८ | -६ |
| भाजप | २४.६% | १८.२% | -६.४% | ५३ | ३८ | -१५ |
| कॉंग्रेस | ३६.९% | ३३.८% | -३.१% | १९ | २६ | ७ |
| अपक्ष आणि इतर | ५.५% | १८.६% | १३.१% | १ | १५ | १४ |
| महाराष्ट्र | २००४ | |||||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | विधानसभा जागा विजय | जागांमधील फरक | |
| कॉंग्रेस | २३.८% | २१.१% | -२.७% | ७३ | ६९ | -४ |
| राष्ट्रवादी | १८.३% | १८.७% | ०.४% | ५९ | ७१ | १२ |
| भाजप | २२.६% | १३.७% | -८.९% | ७३ | ५४ | -१९ |
| शिवसेना | २०.१% | २०.०% | -०.१% | ६८ | ६२ | -६ |
| बसप | ३.१% | ४.०% | ०.९% | ० | ० | ० |
| अपक्ष आणि इतर | १२.१% | २२.५% | १०.४% | १५ | ३२ | १७ |
| हरियाणा | २००४-०५ | |||||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | विधानसभा जागा विजय | जागांमधील फरक | |
| आय.एन.एल.डी | २२.४% | २६.८% | ४.४% | १० | ९ | -१ |
| भाजप | १७.२% | १०.४% | -६.८% | ५ | २ | -३ |
| कॉंग्रेस | ४२.१% | ४२.५% | -५.९% | ७१ | ६७ | -८ |
| हरियाणा विकास पक्ष | ६.३% | ४ | ||||
| बसप | ५.०% | ३.२% | -१.८% | ० | १ | १ |
| अपक्ष आणि इतर | ७.०% | १७.१% | १०.१% | ० | ११ | ११ |
| महाराष्ट्र | २००९ | |||||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | विधानसभा मतदारसंघ आघाडी | विधानसभा जागा विजय | जागांमधील फरक | |
| कॉंग्रेस | १९.६% | २१.०% | १.४% | ७९ | ८२ | ३ |
| राष्ट्रवादी | १९.३% | १६.४% | -२.९% | ५२ | ६२ | १० |
| भाजप | १८.२% | १४.०% | -४.२% | ६१ | ४६ | -१५ |
| शिवसेना | १७.०% | १६.३% | -०.७% | ६१ | ४४ | -१७ |
| बसप | ४.८% | २.४% | -२.४% | ० | ० | ० |
| मनसे | ४.१% | ५.७% | १.६% | ८ | १३ | ५ |
| अपक्ष आणि इतर | १७.०% | २४.२% | ७.२% | २७ | ४१ | १४ |
| महाराष्ट्र | १९८९-९० | |||||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | ||||
| कॉंग्रेस | ४५.४% | ३८.२% | -७.२% | |||
| भाजप | २३.७% | १०.७% | -१३.०% | |||
| शिवसेना | १.२% | १५.९% | १४.७% | |||
| जनता दल | १०.९% | १२.७% | १.८% | |||
| अपक्ष आणि इतर | १८.८% | २२.५% | ३.७% | |||
| मध्य प्रदेश | १९८९-९० | |||||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | ||||
| कॉंग्रेस | ३७.७% | ३३.४% | -४.३% | |||
| भाजप | ३९.७% | ३९.१% | -०.६% | |||
| जनता दल | ८.३% | ७.७% | -०.६% | |||
| अपक्ष आणि इतर | १४.३% | १९.८% | ५.५% |
In reply to मस्तच! by विकास
पण २००९ ची निवडणूक युपिए कसे जिंकू शकलेहे थोडे अवांतर होत आहे.तरी माझ्या मते युपिए २००९ मध्ये जिंकले यामागे पुढील कारणे असावीत--- १. २००४ ते २००९ या काळात भाजपने अत्यंत कमजोर विरोधी पक्षाची भूमिका निभावली. एकतर पक्षामध्ये मोठ्या प्रमाणावर धुसफुसी होत्या.उमा भारती पक्षाबाहेर पडल्या. २००४ चा पराभव झाल्यानंतर अटलबिहारी वाजपेयींना पक्षाने अडगळीतच टाकले.त्यातच प्रमोद महाजनांची दुर्दैवी हत्या झाली. अडवाणींचे जीना प्रकरण झाले.या सगळ्या भानगडीत अडवाणींचे नेतृत्व अगदी पूर्णपणे अक्षम ठरले. १९९० च्या दशकातले फायरब्रॅन्ड विरोधी पक्षनेते अडवाणी आणि २००४-०९ मधले अडवाणी यात अगदी जमीन-अस्मानाचा फरक होता.त्यामुळे लोकांच्या नजरेत भरावे असे भाजपने काहीच केले नाही. २. युपीए-१ मध्ये युपीए कडे २१७ च जागा होत्या तर बाकी डावे पक्ष (६०), समाजवादी पक्ष (३६) आणि बसप (२३) जागा यांच्या बाहेरून पाठिंब्यावर सरकार तगले होते. युपीए-१ हे त्यामानाने बरेच स्थिर सरकार होते. एम.डी.एम.के आणि तेलंगण राष्ट्र समिती सोडून इतर कोणताही पक्ष आघाडीबाहेर पडला नव्हता.त्यामुळे आघाडीतल्या घटक पक्षांमध्ये भांडणे होत आहेत, घटक पक्ष स्वतःचे अजेंडे पुढे रेटत आहेत अशा स्वरूपाचे चित्र २००४-०९ मध्ये नव्हते. त्यामुळे २००९ मध्ये युपीएला नक्कीच फायदा झाला. ३. मनमोहनसिंगांनी स्वतःचे सरकार पणाला लावून डाव्या पक्षांच्या विरोधाला न जुमानता अमेरिकेबरोबर अणुकरार केला. त्यामुळे शहरी मध्यमवर्गीयांची सहानुभूती काँग्रेसला मिळाली. हा वर्ग अमेरिकेला अनुकूल असतो हे नक्कीच.तसेच मनमोहनसिंगांकडे या वर्गाचा विरोध असलेले गांधी घराण्याचे बॅगेज नव्हते.त्यामुळे या वर्गाला काँग्रेसला मते देण्यात काहीच अडचण नव्हती. २००९ मध्ये बंगलोर आणि अहमदाबाद सोडून इतर सगळ्या मोठ्या शहरांमध्ये युपीएने दणक्यात विजय मिळवला त्यामागे हे कारण असावे. ४. २००८ मध्ये अमेरिकेत आलेल्या आर्थिक संकटाच्या पार्श्वभूमीवर मनमोहनसिंगांसारखा अर्थतज्ञ नेतेपणी असणे हे पण काही अंशी युपीएला फायद्याचे ठरले.अर्थातच सामान्य मतदाराला अमेरिकेत नक्की काय झाले आणि त्याचा परिणाम काय होणार याचे तांत्रिक मुद्दे कळले नसतील.पण काहीतरी झाले होते आणि त्याचा भारतावर काहीतरी परिणाम होणार हे तरी मतदारांना नक्कीच कळले होते. अशावेळी अडवाणींपेक्षा एक अर्थतज्ञ पंतप्रधानपदी असावा असे मतदारांना वाटले असावे.
In reply to कारणे by क्लिंटन
In reply to नेहमी प्रमाणे by लाल टोपी
| पश्चिम बंगाल | १९९१ | ||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | |
| डावी आघाडी | ४७.०% | ४७.४% | ०.४% |
| कॉंग्रेस | ३४.९% | ३५.१% | ०.२% |
| भाजप | ११.७% | ११.३% | -०.४% |
| अपक्ष आणि इतर | ६.४% | ६.२% | -०.२% |
| पश्चिम बंगाल | १९९६ | ||
| लोकसभा मते% | विधानसभा मते% | मतांमधील फरक | |
| डावी आघाडी | ४८.७% | ४८.६% | -०.१% |
| कॉंग्रेस | ४०.१% | ३९.५% | -०.६% |
| भाजप | ६.९% | ६.४% | -०.५% |
| अपक्ष आणि इतर | ४.३% | ५.५% | १.२% |
In reply to चांगले संकलन व मांडणी. by ऋषिकेश
In reply to हे तर खरेच आहे, आणि संयुक्तिक by आनन्दा
In reply to शिवसेनेसारख्या आकाराने by ऋषिकेश
In reply to हे झाले जागांचे.. पण by आनन्दा
In reply to चांगले संकलन व मांडणी. by ऋषिकेश
लोकसभा निवडणुकांत लागणारा प्रचंड पैसा! मोठे मतदारसंघ पिंजून काढायला लागणारी वाहन व्यवस्था, मोठ्या नेत्यांना विविध मतदारसंघात जायला आवश्यक जलद वाहने (विमाने, हेलिकॉप्टर्स) इत्यादींवर होणारा खर्च, मिडीया मॅनेजमेंट यातच राष्ट्रीय पक्ष मोठे मैदान मारतात. लहान पक्ष, अपक्ष उमेदवारांना मोठ्यापक्षांइतका "रीच" मिळवणे कठीण असते.हे अपक्ष किंवा अगदी लहान पक्ष--एका किंवा दोन-चार जिल्ह्यांपुरते असलेले पक्ष (उदाहरणार्थ विनय कोरेंचा जनसुराज्य पक्ष) यांना नक्कीच पटण्यासारखे आहे. पण इतर प्रादेशिक पक्ष (तेलुगु देसम, बिजू जनता दल, समाजवादी पक्ष, बहुजन समाज पक्ष, आय.एन.एल.डी) इत्यादींकडे पैसा कमी अशी परिस्थिती नक्कीच नाही. तरीही हे पक्ष लोकसभा निवडणुकांमध्ये तितकी चांगली कामगिरी करत नाहीत पण विधानसभेत त्यामानाने अधिक चांगली कामगिरी करतात हा कल अनेकदा बघायला मिळालेला आहे.तेव्हा या परिस्थितीत पैशाची कमतरता हे कारण असावे याची शक्यता थोडी कमीच वाटते. तसेच एकत्र विधानसभा आणि लोकसभा निवडणुका होतात त्यावेळीही हाच कल का बघायला मिळत असावा?
लहान पक्षांचा प्रभाव हा पॉकेट्समध्ये अधिक असतो. मात्र लोकसभा मतदारसंघ ७-८ विधानसभा मतदारसंघांचा बनलेला असतो. त्यापैकी बहुतांश मतदारसंघात एकाच स्थानिक पक्षाने बढत घेण्याची शक्यत्रा मोठ्या आकारामुळे कमी होते.हो म्हणूनच लोकांना आपले मत फुकट घालवायचे नसते म्हणून विधानसभेत जरी अशा पक्षांना मते दिली तरी लोकसभेत लोक राष्ट्रीय पक्षांना अधिक प्रमाणात मते देतात असे म्हटले आहे.अर्थातच हा माझा तर्क झाला.खरेखोटे नक्की माहित नाही. एक उदाहरण म्हणून मध्य प्रदेशातील लहान पक्ष--गोंडवन गणतंत्र पक्षाचे उदाहरण घेऊ. या पक्षाचा जो काही प्रभाव आहे तो मध्य प्रदेशातील जंगलांच्या प्रदेशातल्या भागात आहे. या पक्षाने २००३, २००८ आणि २०१३ च्या विधानसभा निवडणुकांमध्ये अनुक्रमे २%,१.७% आणि १% मते मिळवली. तर २००४ आणि २००९ च्या लोकसभा निवडणुकांमध्ये अनुक्रमे ०.२% आणि ०.१% मते मिळवली.२००३ आणि २००८ च्या विधानसभा निवडणुका आणि २००४ आणि २००९ च्या लोकसभा निवडणुका यांच्यात चार महिन्यांचे अंतर होते.या चार महिन्यात पूर्वी पक्षाला मते देणारे जवळपास ९०% मतदार कमी होतात यामागे पैशाची कमतरता हे महत्वाचे कारण असेल असे मला तरी वाटत नाही. हा पक्ष लहान असल्यामुळे त्याचा प्रभाव छोट्या पॉकेट्स मध्ये असेल आणि लोकसभा निवडणुक जिंकणे या पक्षाला कठिण जाईल हे लक्षात येऊन लोकांनी आपली मते लोकसभा निवडणुकांमध्ये या पक्षाला दिली नसावीत असा माझा तर्क. इतर प्रश्नांना आज रात्री उत्तरे देतो.
In reply to अपक्ष-लहान पक्षांना मान्य करण्याजोगे by क्लिंटन
हो म्हणूनच लोकांना आपले मत फुकट घालवायचे नसते म्हणून विधानसभेत जरी अशा पक्षांना मते दिली तरी लोकसभेत लोक राष्ट्रीय पक्षांना अधिक प्रमाणात मते देतात असे म्हटले आहे.ह्म्म असे होणे शक्य आहे. मान्य. पैशाचा तितकाच महत्त्वाचा पुरवणी मुद्दा कायम ठेऊनही तुम्ही केलेल्या प्राथमिक कारणाशीसुद्धा सहमती दर्शवतो. पैशाचा मुद्दा मांडताना केवळ स्थानिक पक्ष डोळ्यासमोर होते. (बसपा, डावे हे खरोखरच राष्ट्रीय पक्ष म्हणता यावेत, नुसते कागदावर नाही तर एकाहून अधिक राज्यांत राज्यांतही सीट्स जिंकतात व कित्येकदा डिपॉझिट जप्त न होण्याइतकी कामगिरी करतात). फक्त सपा आणि तमिळ कळघम (दोन्ही) या नियमाला अपवाद ठरावेत. बाकी एन्सीपी, रालोद पासून बिजद, शिवसेना यांची आर्थिक क्षमता या राष्ट्रीय पक्षांच्या मनाने बरीच कमी आहे व ते त्यांचा रीच कमी असण्याचे एक मुख्य कारण आहे असे मात्र म्हणावेसे वाटते.
In reply to वा ! by नितिन थत्ते
| १९९० | १९९५ | १९९८ | |
| भाजप | २६.८% | ४२.५% | ४४.८% |
| कॉंग्रेस | ३०.६% | ३२.९% | ३४.८% |
| जनता दल | २९.३% | २.८% | २.६% |
| राष्ट्रीय जनता पक्ष (वाघेला) | ११.७% | ||
| अपक्ष/इतर | १३.३% | २१.८% | ६.१% |
| २००८ | २०१३ | फरक | |
| कॉंग्रेस | ४०.३% | २४.५% | -१५.८% |
| भाजप + अकाली दल | ३६.८% | ३४.०% | -२.८% |
| बसप | १४.०% | ५.३% | -८.७% |
| आम आदमी पक्ष | २९.५% | २९.५% | |
| अपक्ष/इतर | ९.४% | ६.७% | -२.७% |
In reply to खरं तर या निवडणुकीच्या by आतिवास
In reply to खरं तर या निवडणुकीच्या by आतिवास
महानगरपालिका/ग्रामपंचायत आणि विधानसभा आणि संसद यांची कार्यक्षेत्रं कुठं सुरु होतात आणि कुठं संपतात याविषयी स्पष्टतेचा अभाव हे निवडणूक निकाल फिरण्यातलं एक महत्त्वाचं कारण आहे असा माझा एक समज झालाय.बहुसंख्य ठिकाणी राष्ट्रीय पक्ष विधानसभा निवडणुकांपेक्षा लोकसभा निवडणुकांमध्ये चांगली कामगिरी करतात आणि प्रादेशिक पक्ष लोकसभा निवडणुकांपेक्षा विधानसभा निवडणुकांमध्ये अधिक चांगली कामगिरी करतात यातून बहुसंख्य मतदारांच्या मनात तरी दोन्हींच्या कार्यकक्षांच्या बाबतील कोणताही संभ्रम नाही असे अनुमान काढले तर ते फार चुकीचे ठरू नये. लोकसभा आणि विधानसभा निवडणुका एकत्र झाल्या तरी यात बदल होत नाही हे एका प्रतिसादात बघितलेच आहे. बहुसंख्य मतदारांना जरी ९७ विषयांची केंद्रीय सूची, ६६ विषयांची राज्य सूची आणि ४७ विषयांची सामायिक सूची (आणि केंद्राकडे शेषाधिकार असतात) ही तांत्रिकता माहिती नसली तरी कोणता उमेदवार केंद्रात आणि कोणता उमेदवार राज्यात निवडून द्यावा हे त्यांना कळते हे नक्की.
In reply to नमस्कार क्लिंटनजी by प्रमोद देर्देकर
आपण मत कोणाला द्यायचे ते सांगा.मत देताना मी काही मुद्दे लक्षात घेत असतो.त्यात पक्षाची आर्थिक धोरणे, चांगले सरकार कसे द्यावे याविषयी त्या पक्षाकडे कल्पना आहेत का आणि त्याहूनही महत्वाचे म्हणजे ते प्रत्यक्षात आणण्याची क्षमता त्या पक्षात्/नेत्यात आहे का, पंतप्रधान कोण असणार इत्यादी. तसेच प्रत्येक मुद्द्याला किती महत्व द्यायचे हे पण प्रत्येक निवडणुकीत सारखेच असेल असे नक्कीच नाही. २००९ मध्ये तत्कालीन आर्थिक परिस्थितीत पक्षाच्या आर्थिक धोरणांना माझ्या लेखी १९९९,२००४ पेक्षा बरेच जास्त महत्व होते.प्रत्येकाचे असे विचारात घ्यायचे मुद्दे वेगळे असू शकतील/असतीलच. या मुद्द्यांवरून २००९ मध्ये माझे मत काँग्रेसला होते. मध्यंतरी आय.पी.सी मधील कलम ३७७ चा मुद्दा चर्चेत होता त्यावेळी या मुद्द्यावर भाजपची भूमिका पटली नाही म्हणून त्या पक्षाला मत देणार नाही असे अनेक लोकांनी म्हटले होते हे मी फेसबुकवर बघितले होते.हा मुद्दा त्यांच्या दृष्टीने महत्वाचा होता.माझ्या दृष्टीने तो मुद्दा महत्वाचा असला तरी इतर अधिक महत्वाचे मुद्दे असताना या मुद्द्यावरून मत कोणाला द्यावे याचा निर्णय घ्यावा इतका तरी हा मुद्दा मला महत्वाचा वाटत नाही. तेव्हा तुम्हाला नक्की कोणते मुद्दे महत्वाचे वाटतात आणि त्यासाठी कोणता पक्ष अधिक योग्य आहे हे बघून कोणाला मत द्यावे हे ठरवा. भारताच्या प्रत्येक नागरिकाला मत कोणाला द्यावे हे ठरवायचा हक्क आहे.ते इतरांनी सांगणे योग्य नाही. इतर प्रश्नांना आज रात्रीपर्यंत उत्तरे देतो.
In reply to मुद्दे by क्लिंटन
In reply to क्लिंटन, by जयंत कुलकर्णी
महत्वाचा मुद्दा : भारताचे हित.नक्कीच. निदान मिसळपाववर चर्चेत भाग घेणार्यांपैकी कोणालाही भारताचे अहित व्हावे असे वाटत नसेल याविषयी खात्री आहे. पण कळीचा मुद्दा हा की भारताचे हित म्हणजे नक्की काय आणि ते कशात आहे हा. याविषयी अगदी टोकाचे मतभेद असू शकतात्/असतात.
मतदारांनी कन्सलटंट म्हणून तुमच्या मार्गदर्शनाची अपेक्षा केली तर त्यात चूक काययात एक थोडा फरक आहे. कंपन्यांमध्ये कन्सल्टन्ट जातात त्यांची स्वतःची मते ते जी उत्तरे देतात त्याच्या आड येत नाहीत.इथे मी मत कोणाला द्यायचे हे नक्की केले आहे तेव्हा मी माझ्याच मताविरूध्द तर नक्कीच सांगणार नाही.आणि मी माझ्याच मताला अनुसरून असे काही सांगितले तर ते कन्सल्टींग होणार नाही तर प्रचार होईल. योग्य मतदानास मदत व्हावी म्हणून विविध विषयांवर वेगवेगळ्या पक्षांची मते काय आहेत यावर निरंजन यांचा भाजपचे परराष्ट्र धोरण यावर धागा आला आहे तशा प्रकारची चर्चा घडल्यास नक्कीच चांगले असेल. त्यातून सर्वांना एक informed decision घेता येईल. तरीही कोणत्या मुद्द्याला किती महत्व द्यायचे हे प्रत्येक मतदारावर अवलंबून असल्यामुळे तो निर्णय ज्याचा त्यानेच घ्यायचा.वेळ मिळेल त्याप्रमाणे मी निरंजन यांच्या किंवा अशा स्वरूपाच्या चर्चांमध्ये भाग नक्कीच घेईन. कदाचित एखादी चर्चा मी स्वतः सुध्दा सुरू करू शकेन.
In reply to थोडा फरक by क्लिंटन
In reply to उत्तम चर्चा! by पैसा
तरीही श्रीपाद नाईक यांची अतिशय सौम्य, स्वच्छ माणूस म्हणून जी वैयक्तिक लोकप्रियता आहे, तिचा मोठा हात त्यांना निवडून आणण्यात आहे असे मानावे लागेलनक्कीच.असे निस्पृह आणि निगर्वी कार्यकर्ते ही भाजपची खरी ताकद आहे.सत्ता मिळवायच्या नादात या ताकदीचीच काही प्रमाणात हानी होत आहे असे सध्याचे चित्र आहे. १९९८-९९ च्या चुका परत केल्या जात आहेत.असो. मला वाटते की एखादा कार्यकर्ता पूर्णपणे आपल्या बळावर महापालिकेची निवडणुक जिंकू शकतो.पण पूर्ण स्वबळावर विधानसभा निवडणुक जिंकणे कठिण होते आणि लोकसभा निवडणुक जिंकणे अजून कठिण होते.कुठेतरी पक्षाची गरज कार्यकर्त्यांना पडतेच.गुहागरमधून भाजपचे श्रीधर नातू हे असेच एक निष्ठावान आणि निस्पृह कार्यकर्ते होते.ते १९७८,१९८५ आणि १९९० मध्ये विधानसभेवर निवडून गेले.त्यांचा मुलगा विनय नातू एकतर वडलांच्या पुण्याईवर आणि स्वत: डॉक्टर असल्यामुळे गावांमधील जनसंपर्काच्या जोरावर १९९३ ची पोटनिवडणुक, १९९५,१९९९ आणि २००४ मध्ये निवडून आला.पुढे २००९ मध्ये बंडखोरी करून अपक्ष म्हणून निवडणुक लढवली त्यात तेच डॉ.विनय नातू चौथ्या क्रमांकावर फेकले गेले.इतर अनेकांविषयी हीच गोष्ट लिहिता येईल. २०१४ मध्ये जसवंतसिंगांचेही बारमेरमध्ये तेच होईल असे वाटते.
In reply to तरीही श्रीपाद नाईक यांची by क्लिंटन
In reply to डॉ. नातू by पैसा
प्रश्न हा की १९७८ पासून सतत ३० वर्षे ज्या लोकांचं काम आहे त्यांच्याकडून ती जागा काढून घेऊन अचानक शिवसेनेला देण्याचं कारण काय होतंयाचे कारण रामदास कदमांचा पारंपारिक मतदारसंघ-खेड मतदारसंघांच्या पुनर्रचनेत गुहागर आणि चिपळूणमध्ये विभागला गेला.त्यामुळे त्यांचे पुनर्वसन करायचे होते. आणि नारायण राणे यांच्या बंडानंतर रामदास कदम हे विधानसभेतले विरोधी पक्षनेते होते.त्यामुळे त्या दृष्टीने ते वरीष्ठही होते.तरीही विनय नातूंचे तिकिट कापायची काय गरज होती हे समजले नाही.नाहीतरी चिपळूणमधून शिवसेनेचाच उमेदवार उभा होता.त्याऐवजी तिथे रामदास कदमांना उमेदवार करता आलेच असते की.पडद्यामागे काहीतरी झाले असावे हे नक्की. २००९ ची महाराष्ट्र विधानसभा निवडणुक मी स्वत: अन्य कामांमध्ये प्रचंड व्यस्त असल्यामुळे पाहिजे तितकी ट्रॅक करता आली नव्हती.त्यामुळे इतर निवडणुकांप्रमाणे या निवडणुकीतले डिटेल मला सांगता येणार नाहीत.
In reply to विनय नातू by क्लिंटन
लोक सर्वसाधारणपणे अजूनही त्यांच्या गटाच्या नेत्याने दिलेल्या पांठींब्याकडे पाहुन मत देत असावेत.एखाद्या उमेदवाराचे अगदी कट्टर समर्थक सोडले तर इन जनरल लोक एखादा उमेदवार विजयी व्हायची शक्यता किती याची चाचपणी करून मत देतात असा माझा मुद्दा आहे. वर गोंडवन गणतंत्र पक्षाचे उदाहरण दिले आहे.त्या पक्षाचे उमेदवार लोकसभा निवडणुकांनाही उभे राहतात पण विधानसभेपेक्षा ते बरीच कमी मते मिळवतात.लोकसभेतही त्या पक्षाला मत देणारे त्या पक्षाचे कार्यकर्ते आणि इतर कट्टर समर्थक असावेत पण इतर मतदारांना हा उमेदवार लोकसभेत निवडून जाणे शक्य नाही हे समजते म्हणून ते आपले मत त्या उमेदवाराला देत नाहीत असा माझा दावा आहे. बाकी असे लोकल नेते मधूनमधून फतवे काढत असतात.लोक अशा फतव्यांचे फारसे पालन करत नसावेत असे वाटते. २००४ मध्ये रजनीकांतने भाजप-अण्णा द्रमुक युतीला अप्रत्यक्ष पाठिंबा दिला होता (त्याने म्हटले होते की पी.एम.के सामील असलेल्या आघाडीचा पराभव करा). तरी झाले काय? त्याच्या बरोबर उलटे--भाजप-अण्णा द्रमुक आघाडीचा पूर्ण पराभव झाला तर पी.एम.के असलेल्या आघाडीला सगळ्या जागा मिळाल्या. १९९६ मध्ये तामिळनाडूत जयललिताविरोधी वातावरण होते तेव्हा त्याने "लोकांनी जयललितांना मत दिल्यास देवही लोकांना माफ करणार नाही" असे काहीसे म्हटले आणि लोकांना जयललितांविरूध्द मत द्यायचे आवाहन केले. तसे आवाहन त्याने केले नसते तरी लोकांनी जयललितांना चोप दिला असताच. तरीही त्यावेळी जयललितांच्या पराभवात "रजनीकांत" हा मोठा मुद्दा आहे असे चित्र उभे केले गेले होते.तसेच जामा मशिदीतून निघत असलेल्या फतव्यांप्रमाणे खरोखरच मतदान होते का हा पण अभ्यासाचाच विषय आहे. बहुदा लोक अशा फतवेबहाद्दरांना मानत असले तरी "अमुक एकाला मत द्या/देऊ नका" असे फतवे मानत नसावेत असे वाटते.
दुसरा एक भाग प्रादेशिक पक्षांशी राष्ट्रीय पक्षांच्या आघाडी/युती जागांच्या वाटाघाटी होताना व्यस्त प्रमाणाचे गणित मांडले जाण्याची शक्यता असते का;हो तामिळनाडूमध्ये असे होत आले आहे हे वर लाल टोपी यांच्या प्रतिसादाला दिलेल्या उत्तरात म्हटलेच आहे.
In reply to उत्तम by नंदन
सुंदर लेख