आवडलेलं काही...
In reply to एकेक शेर असा तब्येतीने by एस
In reply to शेरांबद्दलची माझी एक आठवण... by चांदणे संदीप
In reply to याच्यासाठी लक्षात राहिला का? by तुषार काळभोर
In reply to पैलवानदादा by चांदणे संदीप
In reply to Sand=वाळू=रेत by प्यारे१
In reply to याच्यासाठी लक्षात राहिला का? by तुषार काळभोर
In reply to वा छानच! by बोका-ए-आझम
In reply to गुलफाम...मी घरी मागे लागून by असंका
In reply to तुमचे सर्व शेर प्रचंड आवडले!! by जव्हेरगंज
In reply to rekhta.org.... DO VISIT !! by झकास
In reply to हम आँह भी भरते है तो हो जाते by दिवाकर कुलकर्णी
In reply to ही मला सर्वात जास्त आवडलेली.. by जव्हेरगंज
आवाज़ भी जख्मी है , और गीत भी गाना हैवाह!
In reply to कल रात चाँद बिकुल उनके जैसा by मधुमति
In reply to कल रात चाँद बिकुल उनके जैसा by मधुमति
In reply to तू बेइन्तेहा बरस के तो देख... मिट्टी की बनी हूं, महक उठूंगी... by माधुरी विनायक
बारीशों मे भिगना
गुजरे जमाने की बात हो गई
कपडो की किमतें
मस्ती से कही ज्यादा हो गई...
अब मै राशन की कतारो मे खडा नजर आता हु
अपने खेतो से बिछडने की सजा पाता हु.
ऐ चाँद, तू किस मजहब का है
ईद भी तेरी और करवा चौथ भी तेरी...
हर जर्रा चमकता है अनवार- ए- इलाही से
हर शै ये कहती है के हम है तो खुदा भी है
हंगामा है क्यों बरपा थोड़ी सी जो पी ली है
डाका तो नहीं डाला चोरी तो नहीं की है।
उस मय से नहीं मतलब दिल जिससे हो बेगाना
मकसूद है उस मय से दिल ही में जो खिंचती है।
सूरज में लगे धब्बा फ़ितरत के करिश्मे हैं
बुत हमको कहें काफ़िर अल्लाह की मरज़ी है।
पुछा हाल शहर का
तो उसने सर झुका कर कहा
लोग तो जिंदा है,
जमिरों का पता नही...
ये दिल, ये पागल दिल मेरा क्यों बुझ गया ... आवारगी
इस दश्त में इक शहर था वो क्या हुआ ... आवारगी
कल शब मुझे बेशक्ल सी आवाज़ ने चौंका दिया
मैंने कहा तू कौन है, उसने कहा ... आवारगी
ये दर्द की तनहाइयाँ, ये दश्त का वीराँ सफ़र
हम लोग तो उकता गये अपनी सुना ... आवारगी
लोगों भला उस शहर में कैसे जियेंगे हम
जहाँ हो जुर्म तनहा सोचना, लेकिन सज़ा ... आवारगी
इक अजनबी झोंके ने जब पूछा मेरे ग़म का सबब
सहरा की भीगी रेत पर मैंने लिखा ... आवारगी
एक तू कि सदियों से मेरे हमराह भी हमराज़ भी
एक मैं कि तेरे नाम से ना-आश्ना ... आवारगी
ले अब तो दश्त-ए-शब की सारी वुस-अतें सोने लगीं
अब जागना होगा हमें कब तक बता ... आवारगी
कल रात तनहा चाँद को देखा था मैंने ख़्वाब में
‘मोहसिन’ मुझे रास आएगी शायद सदा ... आवारगी
In reply to 'हम' क्यों नहीं है ? by मधुमति
कभी मुस्कुराती आँखें भी कर देती हैं, कई दर्द बयां,
हर बात को रो कर ही बताना जरूरी तो नहीं.
यादो की बौछारो से जब पलके भीगने लगती है
कितनी सौंधी लगती है तब मांझी की रुसवाई भी.
एक पुराना मौसम लौटा, याद भरी पुरवाई भी
एसा तो कम ही होता है , वो भी हो तनहाई भी.
गुलजार - अलबम -मरासिम- जगजीत सिंग
कहना बहुत कुछ है, अल्फाज़ जरा कम हैं...
खामोश से तुम हो, गुमसुम से हम हैं
मुह की बाते सुने हर कोई दिल के दर्द को जाने कौन
आवाजो के बाजारो मे खामोशी पहचाने कौन
निदा फाजली - नीम का पेड सीरीयल च टायटल साँग- जगजीत सींगज़िन्दगी का फ़लसफ़ा भी कितना अजीब है, ......
शामें कटती नहीं, और साल गुज़रते चले जा रहे हैं....!!
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो
न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए !
बशीर बद्र
कुछ यूँ बसर होती है जिंदगी ..................
हम ढूंढ़ लेते हैं हर चेहरे में अक्स उनका.......!!
पानी से डरे है सगगजीदा जिस तरह
डरता हु आईने से मै के मर्दुमगजीदा हु मै.
मिर्जा गालिब.
सगगजीदा- कुत्ते का काटा हुआ इन्सान
मर्दुमगजीदा- माणसांनी चावलेला ( म्हणजे माणसांनी दुखावलेला/ व्यथित केलेला या अर्थाने )
कुत्रा चावलेला माणुस जसा पाण्याला घाबरतो तसा माणसांनी दुखावलेला स्वतःच्या अक्स (आरशातील प्रतिबिंबा ला घाबरतो.)
मिट चले मेरी उम्मीदों की तरह हर्फ़ मगर,
आज तक तेरे ख़तों से तेरी ख़ुशबू न गई!
तुझ को छु लु तो फिर ए जान-ए-तमन्ना
मुझको देर तक अपने बदन से तेरी खुशबु आये.
प्यार का पहला खत लिखने मे वक्त तो लगता है
नये परिंदो को उडने मे वक्त तो लगता है
देके खत मुह देखता है नामाबर
कुछ तो पैगाम-ए-जुबानी और है
नामाबर- संदेशवाहक
कोइ दिनगर जिन्दगानी और है
दिल मे हमने अपने ठानी और हे
हो चुकी गालिब बलाए सब तमाम
एक मर्ग-ए-नागहानी और है.
मर्ग-ए-नागहानी- अचानक ओढवणारा अपघात/ मृत्यु.
In reply to सुंदर धागा ! by मारवा
In reply to तू भी नही मैं भी नहीं by मधुमति
In reply to गलत फहमियों ने कर दी दोनो मैं by प्यारे१
In reply to तू भी नही मैं भी नहीं by मधुमति
In reply to हल्की-फुल्की सी है जिंदगी, बोझ तो ख्वाहिशों का है... by माधुरी विनायक
बिन धागे की सुई सी है ये जिंदगी सिलती कुछ नही, बस चुभती जा रही है...वाहवा. वाहवा.
In reply to rekhta.org.... DO VISIT !! by झकास
In reply to धन्यवाद... by माधुरी विनायक
In reply to धन्यवाद झकास by मधुमति
एकेक शेर असा तब्येतीने