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मनकर्णिका

Published on मंगळवार, 27/11/2012
तिचे नाव मनकर्णिका. साताऱ्याची. अस्सल कऱ्हाडे ब्राह्मण घर. आज तिचा वाढदिवस. 19 नोव्हे. वय २९ - तेही एका युवतीचे - फार नव्हे. फारतर वय २९ असेल. म्हणजे तरुणाईच्या वसंताचा बहर. आज तिची मला आठवण येते. बहुदा दरच वर्षी. तिच्या आठवणीने उभारी येते. रक्त सळसळून उठते.उत्साह संचारतो. विषेत: मी खिन्न असतो तेव्हा. अगणीतांचे, अगतीकांचे हिसकावून घेवून फक्त स्वत:च्याच तुंबड्या भरणाऱ्या अमानवी माणसांना सभोवताली बघतो तेव्हा, कुंपणाला शेत खाताना आणि बुजगावण्याला पक्षांशी पार्टी करताना पाहतो तेव्हा, भयाण दलदलीत सापडलोय आता इथेच संपायचे अशा नैराशाचे ढग भोवती धिंगाणा घालून बिभत्स नाचत असतात तेव्हा मनूची फक्त आठवण प्रचंड दिलासा देते. नैराश्यवादी माझ्या कडे तुच्छतेने पहायला भाग पाडते. मनु स्वत:च किती खमकी ! वयाच्या चवथ्या वर्षी आई गेली. तेविसाव्या वर्षी चारच महिन्याचा मुलगा गेला. मुलगा जाण्याचे दु:ख सहन न होवून वयाच्या अवघ्या पंचविसाव्या वर्षी नवरा गेला. पण बाई ठाम, खंबीर. नवरा असताना दत्तक घेतल्या बाळाला - दामोदरला- इस्ट इंडिया कंपनीचा डलहौशी वारस म्हणून मान्यता देईना. त्याने सरळ ६० हजार रुपये घेवून गाव, वाडा, घोडे सगळे वैभव वगैरे सोडून निघून जा नाईतर बळजबरी करून, हल्ला करून तिचे सर्व काही ताब्यात घेवू अशी धमकी दिली. पण बाई ठाम, खंबीर - वयाच्या २६ व्या वर्षी ! पठ्ठीने इंग्रज वकीलच पैसे देवून कंपनीशी भांडायला कोर्टात लावला. पेन्शन घेवून वाड्यात मुक्काम करू देण्याची मुभा डलहौशी ला द्यावी लागली. जोखण बागेत इंग्रजांच्या काही अधिकाऱ्यांची त्यांच्या बायका मुलासह १८ जून १८५७ च्या दिवशी मोठ्या प्रमाणात तिने अमानुष कत्तल केल्याचे एक प्रकरण आजही वादग्रस्त आहे. ह्यु रोझ ने झांशीला वेढा टाकला पण बाई सुटल्या आणि न थांबता ग्वालेरचा किल्ला जिंकला. ह्यु रोझ म्हणाला "rani "remarkable for her beauty, cleverness and perseverance" had been "the most dangerous of all the rebel leaders" " पण अवघ्या एकोणतिसाव्या वर्षी या गदारोळात बाई गेल्या - लढता लढता.! ..........फक्त गीधाडेच बघायची सवय लागलेल्या माझ्या डोळ्यांना बाई तुमच्या आठवणीने तरतरी येते, तुमच्या आठवणीने या देशातल्या गोंधळाचे निमित्त करून सतत तक्रार करणाऱ्या माझ्या स्वरांची मला लाज वाटते.
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प्रतिक्रिया

सुभद्राकुमारींची कविता कशी विसरता येईल? सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी, बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी, गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी, दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी। चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। ............ जाओ रानी याद रखेंगे ये कृतज्ञ भारतवासी, यह तेरा बलिदान जगावेगा स्वतंत्रता अविनासी, होवे चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी, हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झाँसी। तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी, बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झाँसी वाली रानी थी।। ........... आणि भा. रा. तांबे यांची रे हिंदबांधवा, थांब या स्थळी अश्रु दोन ढाळी, ती पराक्रमाची ज्योत मावळे इथे झाशिवाली तांबेकुलवीरश्री ती, नेवाळकरांची किर्ती हिंदभूध्वजा जणू जळती मर्दानी राणी लक्ष्मीबाई मूर्त महाकाली ! घोड्यावर खंद्या स्वार, हातात नंगि तरवार खणखणा करिती ती वार गोर्‍यांची कोंडी फोडित, पाडित वीर इथे आली कडकडा कडाडे बिजली, शत्रुंची लष्करे थिजली मग कीर्तिरूप ती उरली ती हिंदभूमिच्या पराक्रमाची इतिश्रीच झाली मिळतील इथे शाहीर, लववितील माना वीर तरू, झरे ढाळतिल नीर ह्या दगडां फुटतिल जिभा कथाया कथा सकळ काळी

रावबहादूर पारसनीसांनी लिहिलेले राणीचे डीटेल चरित्र वट्ट ५० रुपयांना मिळेल टिळक स्मारकसमोरच्या पुस्तक प्रदर्शनात- जर ते अजून चालू असेल तर.

त्यांचे नाव मनिकर्णिका असे होते (मनकर्णिका नव्हे). तसेच त्यांचा जन्म बनारसचा. घराणे मूळ सातारचे असेलही पण त्या कधी सातारला आल्या असाव्यात असे वाटत नाही. बाकी लेख फारच त्रोटक वाटला.

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सुंदर, अश्या रणरागिणिला कोटि कोटी प्रणाम

वरती पैसाताईंनी बहुधा वेळेअभावी partially दिलेली सुभद्राकुमारींची वीरश्रीपूर्ण दीर्घ कविता माझा मुलगा लहानपणी संपूर्ण आणि पूर्ण आवेशात म्हणत असे (आणि आजही म्हणतो), ती इथे तशीच पूर्ण स्वरूपात द्यायचा मोह आवरला नाही, शब्दां-शब्दांतून जोश आणणारं अप्रतिम काव्य आहे: सिंहासन हिल उठे राजवंशों ने भृकुटी तानी थी बूढ़े भारत में आई फिर से नयी जवानी थी गुमी हुई आज़ादी की कीमत सबने पहचानी थी दूर फिरंगी को करने की सबने मन में ठानी थी चमक उठी सन सत्तावन में, वह तलवार पुरानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी कानपूर के नाना की, मुँहबोली बहन छबीली थी लक्ष्मीबाई नाम, पिता की वह संतान अकेली थी नाना के सँग पढ़ती थी वह, नाना के सँग खेली थी बरछी ढाल, कृपाण, कटारी उसकी यही सहेली थी वीर शिवाजी की गाथायें उसकी याद ज़बानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी लक्ष्मी थी या दुर्गा थी, वह स्वयं वीरता की अवतार देख मराठे पुलकित होते उसकी तलवारों के वार नकली युद्ध व्यूह की रचना और खेलना खूब शिकार सैन्य घेरना, दुर्ग तोड़ना ये थे उसके प्रिय खिलवाड़ महाराष्टर कुल देवी उसकी भी आराध्य भवानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी हुई वीरता की वैभव के साथ सगाई झांसी में ब्याह हुआ रानी बन आयी लक्ष्मीबाई झांसी में राजमहल में बजी बधाई खुशियाँ छायी झांसी में सुघट बुंदेलों की विरुदावलि सी वह आयी झांसी में चित्रा ने अर्जुन को पाया, शिव से मिली भवानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी उदित हुआ सौभाग्य, मुदित महलों में उजयाली छायी किंतु कालगति चुपके चुपके काली घटा घेर लायी तीर चलाने वाले कर में उसे चूड़ियाँ कब भायी रानी विधवा हुई, हाय विधि को भी नहीं दया आयी निसंतान मरे राजाजी रानी शोक समानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी बुझा दीप झाँसी का तब डलहौज़ी मन में हर्षाया राज्य हड़प करने का उसने यह अच्छा अवसर पाया फ़ौरन फौजें भेज दुर्ग पर अपना झंडा फहराया लावारिस का वारिस बनकर ब्रिटिश राज्य झांसी आया अश्रुपूर्ण रानी ने देखा झांसी हुई बिरानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी अनुनय विनय नहीं सुनती है, विकट फिरंगी की माया व्यापारी बन दया चाहता था जब यह भारत आया डलहौज़ी ने पैर पसारे, अब तो पलट गई काया राजाओं नव्वाबों को भी उसने पैरों ठुकराया रानी दासी बनी, बनी यह दासी अब महरानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी छिनी राजधानी दिल्ली की, लखनऊ छीना बातों बात कैद पेशवा था बिठुर में, हुआ नागपुर का भी घात उदैपुर, तंजौर, सतारा, कर्नाटक की कौन बिसात? जबकि सिंध, पंजाब ब्रह्म पर अभी हुआ था वज्र-निपात बंगाले, मद्रास आदि की भी तो वही कहानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी रानी रोयीं रनवासों में, बेगम ग़म से थीं बेज़ार उनके गहने कपड़े बिकते थे कलकत्ते के बाज़ार सरे आम नीलाम छापते थे अंग्रेज़ों के अखबार नागपूर के ज़ेवर ले लो लखनऊ के लो नौलख हार यों परदे की इज़्ज़त परदेशी के हाथ बिकानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी कुटियों में भी विषम वेदना, महलों में आहत अपमान वीर सैनिकों के मन में था अपने पुरखों का अभिमान नाना धुंधूपंत पेशवा जुटा रहा था सब सामान बहिन छबीली ने रण चण्डी का कर दिया प्रकट आहवान हुआ यज्ञ प्रारम्भ उन्हें तो सोई ज्योति जगानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी महलों ने दी आग, झोंपड़ी ने ज्वाला सुलगाई थी यह स्वतंत्रता की चिन्गारी अंतरतम से आई थी झांसी चेती, दिल्ली चेती, लखनऊ लपटें छाई थी मेरठ, कानपूर, पटना ने भारी धूम मचाई थी जबलपूर, कोल्हापूर में भी कुछ हलचल उकसानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी इस स्वतंत्रता महायज्ञ में कई वीरवर आए काम नाना धुंधूपंत, ताँतिया, चतुर अज़ीमुल्ला सरनाम अहमदशाह मौलवी, ठाकुर कुँवरसिंह सैनिक अभिराम भारत के इतिहास गगन में अमर रहेंगे जिनके नाम लेकिन आज जुर्म कहलाती उनकी जो कुरबानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी इनकी गाथा छोड़, चले हम झाँसी के मैदानों में जहाँ खड़ी है लक्ष्मीबाई मर्द बनी मर्दानों में लेफ्टिनेंट वाकर आ पहुँचा, आगे बड़ा जवानों में रानी ने तलवार खींच ली, हुया द्वन्द्ध असमानों में ज़ख्मी होकर वाकर भागा, उसे अजब हैरानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी रानी बढ़ी कालपी आयी, कर सौ मील निरंतर पार घोड़ा थक कर गिरा भूमि पर गया स्वर्ग तत्काल सिधार यमुना तट पर अंग्रेज़ों ने फिर खायी रानी से हार विजयी रानी आगे चल दी, किया ग्वालियर पर अधिकार अंग्रेज़ों के मित्र सिंधिया ने छोड़ी राजधानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी, खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी विजय मिली पर अंग्रेज़ों की, फिर सेना घिर आई थी अबके जनरल स्मिथ सम्मुख था, उसने मुहँ की खाई थी काना और मंदरा सखियाँ रानी के संग आई थी युद्ध श्रेत्र में उन दोनों ने भारी मार मचाई थी पर पीछे ह्यूरोज़ आ गया, हाय घिरी अब रानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी तो भी रानी मार काट कर चलती बनी सैन्य के पार किन्तु सामने नाला आया, था वह संकट विषम अपार घोड़ा अड़ा नया घोड़ा था, इतने में आ गये सवार रानी एक शत्रु बहुतेरे, होने लगे वार पर वार घायल होकर गिरी सिंहनी उसे वीरगति पानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी रानी गयी सिधार चिता अब उसकी दिव्य सवारी थी मिला तेज से तेज, तेज की वह सच्ची अधिकारी थी अभी उम्र कुल तेइस की थी, मनुष नहीं अवतारी थी हमको जीवित करने आयी, बन स्वतंत्रता नारी थी दिखा गई पथ, सिखा गई हमको जो सीख सिखानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी जाओ रानी याद रखेंगे हम कृतज्ञ भारतवासी यह तेरा बलिदान जगायेगा स्वतंत्रता अविनाशी होये चुप इतिहास, लगे सच्चाई को चाहे फाँसी हो मदमाती विजय, मिटा दे गोलों से चाहे झांसी तेरा स्मारक तू ही होगी, तू खुद अमिट निशानी थी बुंदेले हरबोलों के मुँह हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी

In reply to by बहुगुणी

सलाम झाशीच्या राणीला. ईतकं सुंदर काव्य ईथे दिल्याबद्द्ल आभार बहुगुणी. पूर्ण कविता पहिल्यांदाच वाचली

इंदिरा गांधी यांच्या कारकीर्दीच्या सुरवातीस, त्यांचा गट म्हणजे indicate आणि जुन्या मातब्बर कॉंग्रेस नेत्यांचा गट म्हणजे syndicate , यांच्या राजकीय युद्धात इंदिरा गांधी विजयी झाल्या . या विजयावर टिप्पणी करणाऱ्या कोणी स्तंभ लेखकाने त्यांच्या विषयी असे लिहिले होते. -खूब लढी मर्दानी ये तो झासेवाली राणी थी-

हिंदुस्थानच्या इतिहासात रणरागिणी म्हणून प्रसिद्ध झालेल्या राणी लक्ष्मी बाईचा (मनुताई) आज जयन्ति (१९ नोव्हेंबर १८२८ ). त्यांना विनम्र प्रणाम

नुकताच नात-नातुंच्या शाळेत आजी-आजोबा दिवस साजरा करण्यात आला होता. बरेच आजी-आजोबा एकत्र झाले होते. अंताक्षरी सुरू होती. आमच्या गटावर " र " शब्द आला. मी खणखणीत आवाजात " रे हिंद-बांधवा थांब या स्थळी, अश्रू दोन ढाळी , ती पराक्रमाची ज्योत मावळे, इथे झांशीवाली " हे म्हटले आणि सर्वांनी मनापासुन टाळ्यांचा कडकडाट केला.