मराठी साहित्य, संस्कृती आणि लेखनाचे व्यासपीठ

<काहीच्या काही ...> अर्थातच कैच्या कै

प्रभो · · जे न देखे रवी...
काव्यरस
आमची प्रेरणा आभास कविता कि पास कविता *त्यास कविता मिळालेली | हे शिडशीडीत ना फटफटीत ना धडधडीत साध्य कसे ? अर्थ गर्भ पोरी खिसा कशी जाळी गूढ कधी काळी घे जाणोनी | शब्दांचा कंटाळा अर्थांचा घोटाळा नि*धाचा पाचोळा फार झाला | तो श्वास, नि: श्वास लसणाचा वास सार बाजू त्यांस आज तूही | मागणी प्रमाणे प्रेम प्रसवावे मूढ प्रेमीस रे कोणी सांगा | चलनात नाणे मद्य आणि खाणे 'बार' ' बार' करणे एक सत्य | पाहिजे तनू जे पाहता स्तब्ध करी नाद लुब्ध समोरच्यास | आम्हा व्यथा फार नको पुन्हा भार जगू क्षण चार एकट्याने | जो घेई अर्जंटं होई डॉक्टरी पेशंट तो इंटेलिजंटं होई मोकळा | मग की बोर्डाचा उपयोग साचा बाळराजा खेळी त्यासंगे |

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चिरोटा Fri, 10/30/2009 - 00:11
मस्त कविता!. चलनात नाणे मद्य आणि खाणे 'बार' ' बार' करणे एक सत्य | खर आहे. भेंडी क्ष्^न + य्^न = झ्^न

टारझन Fri, 10/30/2009 - 00:49
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अवलिया Fri, 10/30/2009 - 11:10
चालू द्या... अमेरिकेला जाण्याआधी सगळं मनातलं होऊ द्या!!! --अवलिया ============ यॉर्कर भल्याभल्यांची दांडी उडवतो... म्हणुन पक्षपाती पंच त्याला नोबॉल ठरवतात.