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स्मशान

लेखक अत्रुप्त आत्मा यांनी रविवार, 29/09/2024 08:04 या दिवशी प्रकाशित केले.
शमशान . . . मुझे खुद में दिखाई दिए वो, जिन्हें मैं पागल समझता था ! एक दिन पता चला , वह साले बड़े सयाने थे ! धरम की अंधेरी खाइयों मे सेवादार बनके जीता हू । लोग जिन्हे श्रद्धा सुमन कहेते है उन्हे शराब बनाकर पीता हूँ आप हसोगे मुझे , कहोगे , "वाह क्या सच्चाई देखते हो ! " मै कभी आपको समझा नही सकूंगा , की मुझे झूठ भी कैसे ( ?) दिखाई देता है !? जिंदगी जीने के इस झमेले मे अब खुद को कुछ भी कभी नही कहूंगा जन्मा था इन्सान बन के फिर इन्सान होकर ही मरूंगा । ------------ अतृप्त . . .
काव्यरस
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मराठी भाषेचा विजय विजय असो ! Mipamarathi0234 आजच मराठी भाषेला अभिजात भाषेचा दर्जा मिळाल्याबद्दल मिपाकर लेखक, कवि, भटकंतीकार, प्रवासवर्णनकार, मिपावाचक आणि मिपा विशेषांक कार्यकर्ते, संपादक मं आणि मिपा मालकांचे हार्दिक हार्दिक अभिनंदन !