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लेखक कर्नलतपस्वी यांनी गुरुवार, 11/02/2021 09:11 या दिवशी प्रकाशित केले.
मे भी एक बाप हूँ........ वो था तो कोई गम न था। नही है तो आँखे नम होती है। उसकी यादोमे अक्सर राते गमगीन होती है। नसीहत जो कभी मुसीबत लगती थी। आज वही मुसीबत मे नसीहत लगती है। रोकता था टोकता था। अक्सर मन सोचता था ये ऐसा क्युं है। आज नही है तो दिल उसीको खोजता क्युं है। बरगद का साया था। हर राझ सिखाया था। परवरीश मे जिसने अपना तन मन धन गवांया था। था वो तो हर मुकाम मुक्कमल हुआ। जिंदगी के हर पादान पर पहाड सा खडा हुआ। बाप बनके देखो बाप क्या चिज होती है। उसकी यादोमे आज भी आँखे नम होती है। मै भी एक बाप हूँ। आज भी कमी महसुस होती है। कभी अकेला होता हूँ तो अटलजी की कवीता याद आती है। " उठो द्रोपदी वस्त्र संम्भालो अब गोबिन्द न आयेंगे।" 16-12-2020
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