किशन बिहारी नुर....३ ( रोमेंटीक ) अ — अश्फाक, गुरुवार, 12/30/2010 - 19:08 Book traversal links for किशन बिहारी नुर....३ ( रोमेंटीक ) ‹ किशन बिहारी नुर....२ Up प्रतिक्रिया द्या 2213 वाचन 💬 प्रतिसाद (4) मज़ा तो जब है कि मेरी कमी उसे मदनबाण गुरुवार, 12/30/2010 - 19:16 नवीन मज़ा तो जब है कि मेरी कमी उसे भी खलें! कभी मैं बिछडूँ तो ऐ 'नूर' याद आऊँ उसे. वाह !!! :) यहाँ पे भी तो उसी के करम का गणेशा गुरुवार, 12/30/2010 - 21:55 नवीन यहाँ पे भी तो उसी के करम का हूँ मोहताज़! किसी गज़ल में ढले वो तो गुनगुनाऊँ उसे !! किती सुंदर आहेत या ओळी ... कीती रोमँटीक कीती तरल खुपच सही .. क्रुपया प्रत्येक शायरच्या वेगवेगळ्या शायरी देताना त्यांच्या मागच्या शायरीची (गझलची) लिंक देत चला हि विनंती सुरेख!! प्राजु Fri, 12/31/2010 - 01:03 नवीन सुरेख!! अजीब तरह की शरतें लगाई हैं यशोधरा Fri, 12/31/2010 - 08:44 नवीन अजीब तरह की शरतें लगाई हैं उसने, मैं अपने आप को छोडूँ कहीं तो पाऊँ उसे... सुरेख!
मज़ा तो जब है कि मेरी कमी उसे मदनबाण गुरुवार, 12/30/2010 - 19:16 नवीन मज़ा तो जब है कि मेरी कमी उसे भी खलें! कभी मैं बिछडूँ तो ऐ 'नूर' याद आऊँ उसे. वाह !!! :)
यहाँ पे भी तो उसी के करम का गणेशा गुरुवार, 12/30/2010 - 21:55 नवीन यहाँ पे भी तो उसी के करम का हूँ मोहताज़! किसी गज़ल में ढले वो तो गुनगुनाऊँ उसे !! किती सुंदर आहेत या ओळी ... कीती रोमँटीक कीती तरल खुपच सही .. क्रुपया प्रत्येक शायरच्या वेगवेगळ्या शायरी देताना त्यांच्या मागच्या शायरीची (गझलची) लिंक देत चला हि विनंती
अजीब तरह की शरतें लगाई हैं यशोधरा Fri, 12/31/2010 - 08:44 नवीन अजीब तरह की शरतें लगाई हैं उसने, मैं अपने आप को छोडूँ कहीं तो पाऊँ उसे... सुरेख!
मज़ा तो जब है कि मेरी कमी उसे
यहाँ पे भी तो उसी के करम का
सुरेख!!
अजीब तरह की शरतें लगाई हैं