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आरोग्य विमा आणि बदललेली मेडिकल प्रॅक्टिस !

Published on बुधवार, 30/11/2016
१) “अहो, हे बघा तुम्हाला अपेंडिक्स आहे आणि त्याच्या ओपरेशन चा खर्च अमुक अमुक होईल.” “सर, आमचा विमा आहे पण तो दीड वर्षापूर्वी उतरवलाय.” “नवीन असेल तर दोन वर्षे त्यात काही उपचार बसत नाहीत, तुम्ही एक करा ह्या गोळ्या घ्या , सहा महिने तुम्हाला काही होणार नाही, तोपर्यंत इन्शुरन्स ला देखील दोन वर्षे पूर्ण होतील मग करू ओपरेशन.” “चालेल.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- २) “सर, त्या अमुक अमुक पेशंट ला आज डिस्चार्ज दिला तरी चालेल, त्यांच्या डॉक्टरांनी देखील सांगितलय.” “त्यांना दोन एक दिवस अजून ठेवा, त्यांची कंपनी आपल्याला स्टे चे पैसे जास्त देते नावापुरतं काहीतरी चढवा, मी बोलतो कन्सल्टंट शी.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ३) “सर, अमुक अमुक पेशंट क्रिटीकल झालंय, त्यांना वेन्टीलेटर सपोर्ट.....” “आजीबात नाही, ते सरकारी योजनेतले आहेत शिवाय अफोर्डींग पण नाहीत सरळ त्यांना सरकारी हॉस्पिटल ला पाठवायचं सोबत आपलीच अ‍ॅम्ब्युलन्स द्यायची त्यांना वाटायला नको कि आपण मदत नाही केली म्हणुन, निट समजवा.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ४) “सर, १०३ पेशंट इस नो मोअर.” “बरं, त्यांच्या नातेवाईकांना सांगू नका, उद्या दुपारी डिक्लेअर करू तोपर्यंत २४ तास होताहेत, जरी ह्यांनी पेमंट नाही दिलं तरी इन्शुरन्स कंपनी देईल.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ५) “अहो डॉ साहेब सगळ्या रिपोर्ट्स नॉर्मल असल्या तरी मला विचारल्याशिवाय पेशंट ला नका सांगत जाऊ.” ड्युटी डॉ : “सर मी तर फक्त....” “हे बघा मी त्यांच्याशी बोलतो तुम्ही फक्त आणखी काही टेस्ट सांगा. त्याची फाईल पाठवलीय इन्शुरन्स कंपनी ला येईल अपृवल, दोन दिवस ठेऊ, मग द्या खुशाल डिस्चार्ज.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ६) ड्युटी डॉ : “सर मेडिक्लेम ला फाईल पाठवायची आहे अमुक अमुक पेशंट ची पण काही कम्प्लेंट नाही उगाच ‘कसतरी होतंय’ म्हणून आलंय.” “टाक वायरल फिवर.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ७) “सर, अमक्या पेशंट चं बिल एवढं झालंय..” “वाढवा, तो तमक्या कंपनीचा पेशंट आहे ते जास्त पेमंट करत नाही आधीच जास्त लावा.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ८) स्टाफ : “सर, त्या डॉ चं नाव आपल्याला दाखवता येणार नाही मेडिक्लेम साठी.” “का रे बाळा.” “ते एम बी बी एस नाहीत ना” “अरे हो मग एक करा त्यांच्या पेशंट च्या फाईल वर अमुक अमुक डॉ चे नाव लिहित जा आणि फाईल वर एखादी खूण करत जा, डॉ शी मी बोलतो.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ९)”सर आपण अमुक पेशंट साठी एका सर्जरी चं अपृवल घेतलं होतं पण डॉ नी दुसरं ऑपरेशन केलं, जे स्कीम मध्ये कवर होत नाही.” “हो ते ऑन टेबल बदलावं लागलं, आणि पेशंट पण ओळखीचा आहे पैसे मागितले तर फुक्कट ची बदनामी होईल, मी बोललोय सर्जन शी ते आपल्याला हव्या तशा ऑपरेशन नोट्स लिहून देतील.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- १०)”सर त्या अमुक पेशंट साठी तो महागडा इम्पोर्टेड इम्प्लांट मागवला होता तो काही वेळेवर येणार नाही.” “त्याला काही सांगू नका. तो मागच्या पेशंट च्या इम्प्लांट चा बॉक्स असेल न? तो प्राइवेट पेशंट होता त्याचा बॉक्सच्या डीटेल्स इन्शुरन्स वाल्यांना द्या पाठवून आणि ह्याला लोकल इम्प्लांट बसवा तो काही बॉडी ओपन करून बघणार नाही, पेशंट ला मी सांगतो.” --------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------------- ११)”अहो डॉ तुम्ही लिहिलेलं हे डायग्नोसिस वर कंपनी वाले नाही अपृवल देत नाहीत, डायग्नोसिस बदला जरा.” ==================================================================== हे सगळं अगदी असंच होत असतं असं नाही पण हे घडतंय. सगळी कडे चूक डॉक्टरांचीच किंवा हॉस्पिटल कर्मचार्यांची आहे असंही नाही इन्शुरन्स कंपनी वाले सुद्धा ह्या पळवाटा सुचवतात, जेणे करून पेशंट वाढावे त्यांचे इन्शुरन्स प्रोडक्ट विकले जावे, ई. हे सगळं एथिकल नाही असं नेहेमी वाटतं.

याद्या 2491
प्रतिक्रिया 9

प्रतिक्रिया

कमी प्रमाणात असेल, पण असेल नक्कीच. कारणीभूत सगळेच, डॉक्टर्स, हॉस्पिटल्स, इन्शुरन्स कंपन्या, पेशंट, तुम्ही आणि आम्ही सुद्धा.

हा विषय आलाय ... साधारण पुढच्या प्रतिक्रियांचा प्रवास दिसु लागलाय मला

हे शक्य आहे. कारण मी स्वतः अशी "अंडर ऑबझर्वेशन" उगाच ३ दिवस हॉस्पिटलात पडून होते. अर्थात तेव्हा मी ९ महिन्यांची गरोदर बाई असल्याने, कुणीही काहिही रिस्क घ्यायला तयार नव्हतं. पण केवळ माझ्या कंपनीचा इन्शुरन्स पाहुन मला १ दिवस जास्तीचं तिथे ठेवलं हे अगदी स्पष्ट होतं. पण आपलं काय नुकसान आहे? त्यात पुन्हा बाळाच्या बाबतीत कोण रिस्क घेणार वगैरे मुळे घरच्यांनीसुद्धा हरकत घेतली नाही. अबीरच्या ऑपरेशनच्या वेळेलाही पैसे काढु डॉक्टरांचा अनुभव आहेच. पण सगळेच तसे नसतात हे ही खरंय. कदाचित आता थोडेच असतील, पण अत्यंत प्रामाणिक आणि विश्वासार्ह डॉक्टर्स आहेतच. आपण नीट रिव्ह्यु बघुन शक्यतो जावं.

विनंती सं. मं. कृपया शिर्षकाच्या शेवटी "प्रॅक्टिस" ही दुरुस्ती करावी ही.

बापरे! इस्पितळांचीच भिती वाटायला लागली आहे. त्यात ऑपरेशन वगैरे कधी करावे लागले तर बघायलाच नको. मलाही २००० साली एक ऑपरेशन करायला सांगितले होते परंतु मला त्याची भीती वाटत असल्याने मी ते पुढे ढकल्ले व नंतर गेलेच नाही( फायब्राईड साठी गर्भाशय काढणार होते). आ़जपर्यंत परत काहीही त्रास नाही. अर्थात हे सर्वांच्या बाबतीत खरे नसेल हे मला मान्य आहे. पण मी माझा अनुभव सांगितला.