मला वाटते हा लेख आपण हिंदी भाषेतून एखाद्या हिंदी संस्थळावर लिहावा. कारण याचा खरा फायदा तिथेच होईल.
महाराष्ट्रातील नेत्यांनी आधी विदर्भाच्या विकासाकडे लक्ष द्यावे आणि मग इतरांचे घर सावरायला जावे असे माझे वैयक्तिक मत आहे.
कर्मण्ये वाधिकारस्ते | मां फलकेशू कदाचनं
: कार्यकर्त्यांनी कर्म करीत रहावे,आपल्या नावाचे फलक लागतील अशी अपेक्षा करु नये.
-इनोबा म्हणे-मराठमोळे वॉलपेपर
भौ साहेब , तुमचे स्वप्नरंजन आवडले ... अजुन येउन द्या
मराठी मुले बिहारी मुलीशी जर लग्न करणार असतील तर सांस्कृ्तिक बंधन अजूनही घट्ट होतील, अर्थातच यावर प्रामाणिक विचार व्ह्यायला हवा.
=)) =)) =)) अंमळ करमणूक झाली .... आता काय बोलू आणिक ?
सत्यस्थिती : लव्ह मॅरेज करा म्हणत असाल तर कोणी पोरगी बिहारी असावी (परत प्रेम करण्या पुर्वीच्या अटी जसे मंजुळ अवाज , गोड चेहरा इ.इ.) त्यात लालूच्या सोडल्या तर अजुन किती पोरी क्वालिफाय होतील यात नवल आहे. (स्वप्न पहा, एक बिहारनच्या चुकून प्रेमात पडलेला, ति त्याला म्हणते "अरे ओ बिरजु, हमका सनिमा दिखाव , पाणिपुरी-हलवा खिलाव ..." आग्गाग्गागा तो तिला लग्न करून घरी नेईल की तिथंच हासून येडा होउन हिमालयात जाईल ?
जर अरेंज मॅरेज म्हणाल , तर च्यामारी शेजारच्याच्या पोरीशी लग्न होउ देताना एवढी महाभारतं होतात, कोणी सुचवलेल्या मुलीची १० विश्वसनिय ठिकाणाहून रिपोर्ट काढतात .... आणि लोकं डायरेक्ट चला बिहारला , पोरगी पहायला ... असं करतील ? अवघड आहे ..
|| जगदंब जगदंब ||
बाकी आपली पोरगी सोडून याने पोरासाठी बिहारी पोरगी आणली हे खाणदाणी वाद सुरू होतील तेंव्हा आपण काय स्वप्न बघणार हो ?
मग बाकी इनो काकांशी सहमत ...
--टाराज ठाकरे
(मिसळपाव नवनिर्माण सेना)
मी मिपाचा , मिपा माझा
अहो साहेब,
मी अनेक मार्ग सुचविले त्यातील हा एक मार्ग आहे. २०/२५ वर्षापूर्वी आंतरजातीय विवाह अशक्यच समजले जात होते. आज मराठी / तामिळ/ अग्रवाल इतके लग्नाला मी स्वत हजर होतो.
समजा, एखाद्या मराठी मुलाने चांगल्यातल्या चांगल्या बिहारी मुलीशी लग्न केले तर, या प्रक्रियेत या सर्व अडचणीचा फडशा पडेल ना?
पूर्वीचे राजेलोक अनेक इतर प्रांतीय मुलीशी लग्न करत होतेच ना? उदा. धुतराष्ट्र - गांधारी, कृष्ण - सत्यभामा, भीम - हिडिंबा इत्यादी.
शेवटी विवाह संकरातून असा सांस्कृतिक संकर होत होता आणि होऊ शकेल अशा विचारातुन ही कल्पना मांडली आहे.
द्वारकानाथ कलंत्री.
( आपणास इतर मुद्दे पटले का? असतील तर या मुद्द्या कडे दुर्लक्ष करा ही विनंती)
इथं अफ्रिकेत एक नाही बरीच भारतीय लोक्स आहेत ... अफ्रिकन महिलेशी विवाहं करून ३-४ पोरं आहेत .. अंमळ सुखी आहेत ...
तात्पर्य : योगायोगाने झालं तर कै म्हणनं नै .. पण खास कोणी अफ्रिकेत येउन अफ्रिकन बाईशी लग्न करायची योजना कोणी आखली नसेल
जरासं स्पष्टीकरण : भाषेमुळे किंवा लेखकाबद्दलच्या पुर्वग्रहांमुळे काही गैरसमज झाले असावेत , आज्जी देखील खरड करून हे काहिहि आहे असे म्हणाला. आम्ही बिहारी मुली सरसकट वाईट आहे असे म्हणालो नाही , एक क्षणिक विनोद केला होता... परंतु लैच जड घेतलं .. असो तर सांगायचं असं ..योगाने जर कोणाला कोण पसंत पडली/ला तर ठिक .. पण जसं मामाची पोरगी (बहुतांश टेकन ऍज ग्रांटेड ) जशी लग्नासाठी विचारात घेतली जाते तशी बिहारची पोरं पोरी कोणी विचारात घेइल आणि त्याने काही फरक पडेल असं वाटत नाही ...
मुळात हे प्रॅक्टिकल नाही वाटत ..
बाकी मुद्देही स्पप्नवत वाटले ! वैयक्तिक मत आहे. वाद घालायची इच्छा नाही !
(वस्तुनिष्ठ) टारशास्त्री
वाद घालायची इच्छा नाही !
हे वाक्य मात्र आवडले नाही. आपण तरुण आहात आणि आपल्याला आपले मत ठेवण्याचा, मांडण्याचा आणि बदलण्याचाही पूर्ण आधिकार आहे. आपले कोणतेही पत्र अथवा कोणाचेही पत्र / प्रतिसाद मी वाद म्हणून घेत नाही / समजत नाही.
वाद,विवाद आणि संवाद अशी प्रक्रिया असते आणि मतांतर हाही त्याचा टप्पा असतो.
शेवटी लग्नाच्या गाठी स्वर्गातच बांधल्या जातात असे समजले जाते. शेवटी आपल्या मताला किती किमत असते? यावरुन खालचा किस्सा आठवला.
महात्मा गांधीनी काही चिंतन करुन काही लिखाण करुन ठेवले होते आणि त्याची ते प्रकाशित करण्याचीही इच्छा होती. पण हे लिखाण पूर्णही नाही हे जाणवत होते. त्यांच्या मनातले द्वंद त्यांनी एकदा विनोबांना सांगितले व प्रकाशित करु का थांबु असे विचारले. विनोबा झटकन म्हणाले की तुम्हाला जे लिहायचे आहे ते लिहा / प्रकाशित करा. शेवटी लोक त्यांना जे करायचे असतात तेच करतात. असे ऐकल्यावर गांधीनी निश्वास टाकला आणि सांगितले आज माझी मी काही चूकीच्या आधारावर तर मार्गदर्शन करत नाही ना या काळजीतून सूटका झाली.
बिहार ही समस्या न समजता संधी म्हणुन समजली तर.... यात भ्रष्ट नेत्यांची आहुती देता आली तर
काय राव जोक करताय तुम्ही किति जरी बिहारी ना सुधारायचा प्रयत्न कराल तो कमीच आहे राव
ज्या बिहार मधे जयप्रकाश नारायण कही करु शकले नाही तो काय सुधारनार
संगणकिय विषाणु तयार करणे त्यावर नियंत्रण ठेवणे
त्यांच्यात विध्वंसक क्षमता तपासणे आणी त्याचा वापर पुरेपुर करणे
यात आम्ही सध्या प्रगती पथावर आहोत
मिपावर लिहिलेले निदान कोणा हिंदी भाषकाला कळले असे म्हणायचे. Smile
राज ठाकरे की चिंतायें जायज हैं, तरीका गलत है…
"नीम का पत्ता कड़वा है, राज ठाकरे भड़वा है" (सपा की एक सभा में यह कहा गया और इसी के बाद यह सारा नाटक शुरु हुआ) यह नारा मीडिया को दिखाई नहीं दिया, लेकिन अमरसिंह को "मेंढक" कहना और अमिताभ पर शाब्दिक हमला दिखाई दे गया (मीडिया हमेशा इन दोनों शख्सों को हाथोंहाथ लेता रहा है)। अबू आजमी जैसे संदिग्ध चरित्र वाले व्यक्ति द्वारा "मराठी लोगों के खिलाफ़ जेहाद छेड़ा जायेगा, जरूरत पड़ी तो मुजफ़्फ़रपुर से बीस हजार लाठी वाले आदमी लाकर रातोंरात मराठी और यह समस्या खत्म कर दूँगा" एक सभा में दिया गया यह वक्तव्य भी मीडिया को नहीं दिखा। (इसी के जवाब में राज ठाकरे ने तलवार की भाषा की थी), लेकिन मीडिया को दिखाई दिया बड़े-बड़े अक्षरों में "अमिताभ के बंगले पर हमला…" जबकि हकीकत में उस रात अमिताभ के बंगले पर एक कुत्ता भी टांग ऊँची करने नहीं गया था। लेकिन बगैर किसी जिम्मेदारी के बात का बतंगड़ बनाना मीडिया का शगल हो गया है। अमिताभ यदि उत्तरप्रदेश की बात करें तो वह "मातृप्रेम," "मिट्टी का लाल", लेकिन यदि राज ठाकरे महाराष्ट्र की बात करें तो वह सांप्रदायिक और संकीर्ण… है ना मजेदार!!! मैं मध्यप्रदेश में रहता हूँ और मुझे मुम्बई से कोई लेना-देना नहीं है, लेकिन मीडिया, सपा और फ़िर बिहारियों के एक गुट ने इस मामले को जैसा रंग देने की कोशिश की है, वह निंदनीय है। समस्या को बढ़ाने, उसे च्यूइंगम की तरह चबाने और फ़िर वक्त निकल जाने पर थूक देने में मीडिया का कोई सानी नहीं है। सबसे पहले आते हैं इस बात पर कि "राज ठाकरे ने यह बात क्यों कही?" इस बात से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जबसे (अर्थात गत बीस वर्षों से) दूसरे प्रदेशों के लोग मुम्बई में आने लगे और वहाँ की जनसंख्या बेकाबू होने लगी तभी से महानगर की सारी मूलभूत जरूरतें (सड़क, पानी, बिजली आदि) प्रभावित होने लगीं, जमीनों के भाव अनाप-शनाप बढ़े जिस पर धनपतियों ने कब्जा कर लिया। यह समस्या तो नागरिक प्रशासन की असफ़लता थी, लेकिन जब मराठी लोगों की नौकरी पर आ पड़ी (आमतौर पर मराठी व्यक्ति शांतिप्रिय और नौकरीपेशा ही होता है)
तब उसकी नींद खुली। लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। वक्त के मुताबिक खुद को जल्दी से न ढाल पाने की बहुत बड़ी कीमत चुकाई स्थानीय मराठी लोगों ने, उत्तरप्रदेश और बिहार से जनसैलाब मुम्बई आता रहा और यहीं का होकर रह गया। तब सबसे पहला सवाल उठता है कि उत्तरप्रदेश और बिहार से लोग पलायन क्यों करते हैं? इन प्रदेशों से पलायन अधिक संख्या में क्यों होता है दूसरे राज्यों की अपेक्षा? मोटे तौर पर साफ़-साफ़ सभी को दिखाई देता है कि इन राज्यों में अशिक्षा, रोजगार उद्योग की कमी और बढ़ते अपराध मुख्य समस्या है, जिसके कारण आम सीधा-सादा बिहारी यहाँ से पलायन करता है और दूसरे राज्यों में पनाह लेता है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि उत्तरप्रदेश और बिहार से आये हुए लोग बेहद मेहनती और कर्मठ होते हैं (हालांकि यह बात लगभग सभी प्रवासी लोगों के लिये कही जा सकती है, चाहे वह केरल से अरब देशों में जाने वाले हों या महाराष्ट्र से सिलिकॉन वैली में जाने वाले)। ये लोग कम से कम संसाधनों और अभावों में भी मुम्बई में जीवन-यापन करते हैं, लेकिन वे इस बात को जानते हैं कि यदि वे वापस बिहार चले गये तो जो दो रोटी यहाँ मुम्बई में मिल रही है, वहाँ वह भी नहीं मिलेगी। इस सब में दोष किसका है? जाहिर है गत पच्चीस वर्षों में जिन्होंने इस देश और इन दोनो प्रदेशों पर राज्य किया? यानी कांग्रेस को छोड़कर लगभग सभी पार्टियाँ।सवाल उठता है कि मुलायम, मायावती, लालू जैसे संकीर्ण सोच वाले नेताओं को उप्र-बिहार के लोगों ने जिम्मेदार क्यों नहीं ठहराया? क्यों नहीं इन लोगों से जवाब-तलब हुए कि तुम्हारी घटिया नीतियों और लचर प्रशासन की वजह से हमें मुंबई क्यों पलायन करना पड़ता है?
क्यों नहीं इन नेताओं का विकल्प तलाशा गया? क्या इसके लिये राज ठाकरे जिम्मेदार हैं? आज उत्तरप्रदेश और बिहार पिछड़े हैं, गरीब हैं, वहाँ विकास नहीं हो रहा तो इसमें किसकी गलती है?
क्या कभी यह सोचने की और जिम्मेदारी तय करने की बात की गई? उलटा हो यह रहा है कि इन्हीं अकर्मण्य नेताओं के सम्मेलन मुम्बई में आयोजित हो रहे हैं, उन्हीं की चरण वन्दना की जा रही है जिनके कारण पहले उप्र-बिहार और अब मुम्बई की आज यह हालत हो रही है। उत्तरप्रदेश का स्थापना दिवस मुम्बई में मनाने का तो कोई औचित्य ही समझ में नहीं आता? क्या महाराष्ट्र का स्थापना दिवस कभी लखनऊ में मनाया गया है? लेकिन अमरसिंह जैसे धूर्त और संदिग्ध उद्योगपति कुछ भी कर सकते हैं और फ़िर भी मीडिया के लाड़ले (?) बने रह सकते हैं। मुम्बई की एक और बात मराठियों के खिलाफ़ जाती है, वह है भाषा अवरोध न होना। मुम्बई में मराठी जाने बिना कोई भी दूसरे प्रांत का व्यक्ति कितने भी समय रह सकता है, यह स्थिति दक्षिण के शहरों में नहीं है, वहाँ जाने वाले को मजबूरन वहाँ की भाषा, संस्कृति से तालमेल बिठाना पड़ता है। कुल मिलाकर सारी बात, घटती नौकरियों पर आ टिकती है, महाराष्ट्र के रेल्वे भर्ती बोर्ड का विज्ञापन बिहार के अखबारों में छपवाने की क्या तुक है? एक तो वैसे ही पिछले साठ सालों में से चालीस साल बिहार के ही नेता रेलमंत्री रहे हैं, रेलें बिहारियों की बपौती बन कर रह गई हैं (जैसे अमिताभ सपा की बपौती हैं) मनचाहे फ़्लैग स्टेशन बनवा देना, आरक्षित सीटों पर दादागिरी से बैठ जाना आदि वहाँ मामूली(?) बात समझी जाती है, हालांकि यह बहस का एक अलग विषय है, लेकिन फ़िर भी यह उल्लेखनीय है कि बिहार में प्राकृतिक संसाधन भरपूर हैं, रेल तो उनके "घर" की ही बात है, लोग भी कर्मठ और मेहनती हैं, फ़िर क्यों इतनी गरीबी है और पलायन की नौबत आती है, समझ नहीं आता? और इतने स्वाभिमानी लोगों के होते हुए बिहार पर राज कौन कर रहा है, शहाबुद्दीन, पप्पू यादव, तस्लीमुद्दीन, आनन्द मोहन आदि, ऐसा क्यों?
एक समय था जब दक्षिण भारत से भी पलायन करके लोग मुम्बई आते थे, लेकिन उधर विकास की ऐसी धारा बही कि अब लोग दक्षिण में बसने को जा रहे हैं, ऐसा बिहार में क्यों नहीं हो सकता?
समस्या को दूसरी तरीके से समझने की कोशिश कीजिये… यहाँ से भारतीय लोग विदेशों में नौकरी करने जाते हैं, वहाँ के स्थानीय लोग उन्हें अपना दुश्मन मानते हैं, हमारी नौकरियाँ छीनने आये हैं ऐसा मानते हैं। यहाँ से गये हुए भारतीय बरसों वहाँ रहने के बावजूद भारत में पैसा भेजते हैं, वहाँ रहकर मंदिर बनवाते हैं, हिन्दी कार्यक्रम आयोजित करते हैं, स्वतंत्रता दिवस मनाते हैं, जब भी उन पर कोई समस्या आती है वे भारत के नेताओं का मुँह ताकने लगते हैं, जबकि इन्हीं नेताओं के निकम्मेपन और घटिया राजनीति की वजह से लोगों को भारत में उनकी योग्यता के अनुसार नौकरी नहीं मिल सकी थी, यहाँ तक कि जब भारत की क्रिकेट टीम वहाँ खेलने जाती है तो वे जिस देश के नागरिक हैं उस टीम का समर्थन न करके भारत का समर्थन करते हैं, वे लोग वहाँ के जनजीवन में घुलमिल नहीं पाते, वहाँ की संस्कृति को अपनाते नहीं हैं, क्या आपको यह व्यवहार अजीब नहीं लगता? ऐसे में स्थानीय लोग उनके खिलाफ़ हो जाते हैं तो इसमें आश्चर्य कैसा? हमारे सामने फ़िजी, मलेशिया, जर्मनी आदि कई उदाहरण हैं, जब भी कोई समुदाय अपनी रोजी-रोटी पर कोई संकट आते देखता है तो वह गोलबन्द होने लगता है, यह एक सामान्य मानव स्वभाव है। फ़िर से रह-रहकर सवाल उठता है कि उप्र-बिहार से पलायन होना ही क्यों चाहिये?
इतने बड़े-बड़े आंदोलनों का अगुआ रहा बिहार इन भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ़ आंदोलन खड़ा करके बिहार को खुशहाल क्यों नहीं बना सकता?
खैर… राज ठाकरे ने हमेशा की तरह "आग" उगली है और कई लोगों को इसमें झुलसाने की कोशिश की है। हालांकि इसे विशुद्ध राजनीति के तौर पर देखा जा रहा है और जैसा कि तमाम यूपी-बिहार वालों ने अपने लेखों और ब्लॉग के जरिये सामूहिक एकपक्षीय हमला बोला है उसे देखते हुए दूसरा पक्ष सामने रखना आवश्यक था। यह लेख राज ठाकरे की तारीफ़ न समझा जाये, बल्कि यह समस्या का दूसरा पहलू (बल्कि मुख्य पहलू कहना उचित होगा) देखने की कोशिश है। शीघ्र ही पुणे और बंगलोर में हमें नये राज ठाकरे देखने को मिल सकते हैं…
आपले प्रयत्न आणि दिशा वाया जाणार नाही हे सर्वांना मान्य करायलाच हवे. शेवटी हे प्रबोधन होणार हे नक्कीच.
आजपर्यंत वाचलेल्या प्रतिक्रियांवरुन असे दिसते की बरेच जण बिहारच्या समस्या समजाऊनच घेत नाहीयेत. सामान्य गरीब बिहारी भेदरलेल्या अवस्थेत लाचारीचे जिणे जगत आहे. पोटासाठी आणि सुरक्षिततेसाठी तो परक्या ठिकाणी जात आहे. दुसर्याच्या शेतांत गुरे घुसवणार्या लबाड मालकाला जाब न विचारता त्या गुरांनाच बेदम ठोकून काढण्यासारखे हे आहे.
माझा एक मित्र बैंकेत असतना त्याची बदली बिहारला झाली होती. त्यांना एक बिहारी नोकर मिळाला होता. तो सकाळपासून संध्याकाळपर्यंत स्वयंपाकापासून सर्व कामे करुन रोजच्या दोन रुपयांवर खुष होता. त्याला महिन्याचे पैसे एकदम देऊ केले (६० रु.) तर तो नको म्हणत असे ,कारण ते वाटेत कोणी लुबाडेल अशी त्याला भीति वाटे. अशा परिस्थितीत ही गरीब जनता वर्षानुवर्षे तिथल्या नेते व गुंडांकडून नागवली जात आहे.
माझ्या मते खरी समस्या ही असायला हवी की एकाच राष्ट्राच्या सर्व नागरिकांमध्ये स्नेह आणि समानता कशी निर्माण होऊ शकेल.
शेवटी वर्गाची प्रगती ढ मुलावरुन ठरते आणि राष्ट्राची प्रगती गरीब / दरिद्री माणसावरुन ठरायला पाहिजे.
बिहारी असो, आदिवासी, स्त्रीया, अनाथ, वृद्ध अथवा मागासलेले असो यांच्या मधे हक्क आणि जबाबदारीची भावना निर्माण होणे / करणे ही सर्वांचीच जबाबदारी आहे. तुर्त्त इतकेच...
प्रतिक्रिया
ह्म्म
अ रे बा प रे
वस्तुस्थिती.
वस्तुस्थिती.
खरी वस्तुस्थिती
हे मात्र आवडले नाही.
तेच्या पेक्षा.....
माझी सरळ
बिहार ही
हिंदीतील आलेले एक संगणकीय डाक / ढकल पत्र.
बिहार हा परका नाही
खरी समस्या....