पडघम २०१४- भाग २: क्रिटिकल मास
या भागात आपण दुरंगी, तिरंगी किंवा चतुरंगी लढती होत असलेल्या राज्यांमध्ये बऱ्यापैकी (किमान २०%) जागा मिळविण्यासाठी किती टक्के मते लागतात हे बघू. कोणत्या परिस्थितीत एखाद्या राज्यात दुरंगी/तिरंगी किंवा चतुरंगी लढत आहे असे मी म्हणतो हे लेखामध्ये स्पष्ट होईलच.
दुरंगी लढतीमध्ये मी खालील दोन परिस्थितींचा अंतर्भाव करत आहे. एखाद्या राज्यात दोन मुख्य पक्ष/आघाडी यांना एकूण ९०% च्या आसपास मते मिळत असतील तर त्या राज्यांमध्ये मी ’थेट दुरंगी’ लढत आहे असे म्हणतो (उदा. १९८९,१९९१,१९९६ आणि २००९ मध्ये केरळ,१९८९ आणि १९९६ मध्ये पश्चिम बंगाल, १९९८ चा अपवाद वगळता गुजरात). समजा एखाद्या राज्यात दोन प्रमुख पक्ष/आघाडी यांना साधारण ८५% पेक्षा जास्त मते मिळाली आहेत आणि अनेकदा तिसरा पक्ष/आघाडी किमान ६-८% मते मिळवत असेल तर त्या राज्यात ’प्रामुख्याने दुरंगी लढत’ आहे असे मी म्हणतो.
थेट दुरंगी लढत
केरळमध्ये २००४ चा अपवाद वगळता १९८९ पासूनच्या प्रत्येक निवडणुकीत दोन प्रमुख आघाड्यांना (कॉंग्रेस आणि डावी आघाडी) किमान ९०% मते मिळाली आहेत. खाली दिलेल्या तक्त्यात राज्यात विविध लोकसभा निवडणुकांमध्ये मिळालेली मतांची टक्केवारी आणि लोकसभा निवडणुकांमध्ये मिळालेल्या जागा दिल्या आहेत.
तक्ता क्रमांक १
तसेच पश्चिम बंगालमध्ये १९८९ आणि १९९६ च्या निवडणुकांमध्ये थेट दुरंगी सामना झाला होता (दोन प्रमुख आघाड्यांना जवळपास ९०% मते). तक्ता क्रमांक २ मध्ये या निवडणुकांमध्ये विविध पक्षांना मिळालेली मतांची टक्केवारी आणि मिळालेल्या जागा दिल्या आहेत.
तक्ता क्रमांक २
या दोन तक्त्यांवरून आपल्या एक गोष्ट ध्यानात येते:
१. थेट दुरंगी लढतीत दोन पक्षांना साधारण सारखीच मते मिळत असतील (किंवा मतांमधील फरक फार नसेल--उदाहरणार्थ केरळ १९९६ आणि १९९८) तर दोन पक्षांना साधारण सारख्याच जागा मिळतात.
२. थेट दुरंगी लढतीत दोन पक्षांमधील मतांचा फरक ५% पेक्षा जास्त असेल तर अधिक मते मिळविणारा पक्ष जोरदार विजय मिळवतो तर कमी मते मिळविणाऱ्या पक्षाला थोड्या जागांवर समाधान मानावे लागते. पश्चिम बंगालमध्ये इतकी वर्षे डावी आघाडी मोठ्या प्रमाणावर जागा मिळवत होती. कॉंग्रेस आणि डाव्या आघाडीच्या मतांमध्ये फरक ८-९% असायचा पण लोकसभा निवडणुकांमध्ये डाव्या आघाडीला कॉंग्रेसपेक्षा ५-६ पटींनी जास्त जागा मिळत असत.विधानसभा निवडणुकांमध्ये हा फरक अधिक pronounced असायचा.
तेव्हा थेट दुरंगी लढत असलेल्या राज्यात ४०-४१% मते मिळाली तर त्याचा फार उपयोग नाही.पण जशी मतांची टक्केवारी ४५% च्या पुढे वाढते तशी जागांची संख्या व्यस्त प्रमाणात वाढत जाते.
मुख्यत्वे दुरंगी लढत
राजस्थानात १९८९ ते २००९ या काळातही मुख्यत्वे दुरंगी सामने झाले होते. १९८९ मध्ये भाजप-जनता दल युती (तक्त्यात भाजपमध्ये मते आणि जागा धरल्या आहेत) तर १९९१ ते २००९ या काळात भाजप विरूध्द कॉंग्रेस असा दुरंगी सामना होता. राजस्थानात इतरांना मिळालेली मते केरळ आणि पश्चिम बंगालपेक्षा जास्त आहेत.पण ही मते मुख्यत्वे अपक्ष आणि लहान पक्षांमध्ये विखुरलेली आहेत.त्यामुळे राजस्थानातही दुरंगी सामना होता असे म्हणायला हरकत नसावी. खालील तक्त्यात राजस्थानात विविध पक्षांना मिळालेली मते आणि जागा दिल्या आहेत.
तक्ता क्रमांक ३
मध्य प्रदेशात १९८९ ते २००९ या काळात (१९९६ चा अपवाद वगळता) मुख्यत्वे दुरंगी सामने झाले होते. तक्ता क्रमांक ४ मध्ये मध्य प्रदेशातील आकडेवारी दिली आहे.
तक्ता क्रमांक ४
यावरून असे कळते की मुख्यत्वे दुरंगी सामने असलेल्या राज्यांमध्येही थेट दुरंगी लढतीप्रमाणेच:
१. दोन पक्षांना मिळालेल्या मतांमध्ये फार फरक नसेल तर जागांमध्येही फार फरक नसतो.
२. पण दोन पक्षांना मिळालेल्या मतांमध्ये ५% पेक्षा जास्त फरक असेल तर मात्र जास्त मते मिळालेला पक्ष बऱ्याच प्रमाणात अधिक जागा जिंकतो.
फरक इतकाच की थेट दुरंगी लढतील जो फायदा ४८-४९% मते मिळून होतो तोच फायदा मुख्यत्वे दुरंगी लढतीत ४२-४३% पर्यंत मते मिळाली तरी बघायला मिळतो.अशा मुख्यत्वे दुरंगी लढतील कुठल्या पक्षाला ४७-४८% मते मिळाली तर तो पक्ष मात्र खूपच मोठा विजय मिळवतो (मध्य प्रदेश-२००४)
तिरंगी लढत
समजा एखाद्या राज्यात दोन मोठ्या पक्षांना/आघाड्यांनंतर तिसऱ्या पक्षाला/आघाडीला किमान १०-१५% मते आणि उरलेली मते अपक्ष आणि इतर लहान पक्षांमध्ये विखुरली जाणे याला तिरंगी लढत म्हणता येईल.
पुढील तक्त्यात पश्चिम बंगालमध्ये १९९१,१९९८,१९९९ आणि २००४ मध्ये मिळालेली मते आणि जागा दिल्या आहेत.
तक्ता क्रमांक ५
महाराष्ट्रात १९९९ मध्ये सेना-भाजप युती, कॉंग्रेस आणि राष्ट्रवादी अशी तिरंगी लढत झाली होती.त्या निवडणुकांमधील आकडे खाली दिले आहेत.
तक्ता क्रमांक ६
ओरिसामध्ये २००९ मध्ये बिजू जनता दल, कॉंग्रेस आणि भाजप यांच्यात तिरंगी लढत झाली होती. त्या राज्यातील आकडेवारी खाली दिलेल्या तक्त्यात दिली आहे.
तक्ता क्रमांक ७
तिरंगी लढत असते त्या राज्यांमध्ये पुढील गोष्टी बघायला मिळतात:
पहिल्या क्रमांकाची मते मिळविलेल्या पक्षाला निश्चितपणे मतांच्या तुलनेत व्यस्त प्रमाणात जास्त जागा मिळतात. तर दुसऱ्या क्रमांकाची मते मिळविलेल्या पक्षाला मतांच्या तुलनेत व्यस्त प्रमाणात कमी जागा मिळतात. दुसऱ्या आणि तिसऱ्या क्रमांकाच्या पक्षांमध्ये मतविभागणी झाल्याचा बराच फायदा पहिल्या क्रमांकाच्या पक्षाला होतो. तिसऱ्या पक्षाला मात्र स्वत:चा ठसा उमटविण्यासाठी बराच मोठा पल्ला गाठावा लागतो. ओरिसात २००९ मध्ये भाजपला जवळपास १७% मते मिळाली तरी एकही जागा मिळाली नाही. स्वत:चा ठसा उमटवायला या तिसऱ्या क्रमांकाच्या पक्षाला किमात ६-८% अधिक मते मिळवावी लागतील.
चतुरंगी लढत
उत्तर प्रदेशात १९९१ पासून चतुरंगी लढती होत आहेत.
तक्ता क्रमांक ८
चतुरंगी लढती खूपच इंटरेस्टिंग असतात. या लढतीतून आपल्याला पुढील गोष्टी समजतील:
१. एखाद्या पक्षाची मते किती विखुरलेली आहेत आणि किती एकत्र आहेत हा प्रश्न कोणत्याही निवडणुकीत महत्वाचा असतोच.पण चतुरंगी लढतीत हा प्रश्न अधिक महत्वाचा असतो.बसपाला मते विखुरली गेल्यामुळे मतांच्या तुलनेत जागा मिळत नाहीत असे दिसून येईल.
२. चतुरंगी लढतीत ३०% पेक्षा जास्त मिळालेली प्रत्येक % जास्त मते मतांच्या तुलनेत व्यस्त प्रमाणात बऱ्याच जास्त जागा मिळवून देतात. त्याउलट एखादा पक्ष २०% मतांमध्ये अडकला तर तितक्या प्रमाणावर जागा मिळत नाहीत.
आता पुढच्या भागापासून या आकडेवारीची आणि अनुमानांची पार्श्वभूमी लक्षात घेऊन विविध राज्यांमध्ये काय परिस्थिती असेल याविषयीचा माझा अंदाज लिहेन.
| केरळ | १९८९ | १९९१ | १९९६ | १९९८ | १९९९ | २००४ | २००९ | |||||||
| मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | |
| डावी आघाडी | ४३.२% | ३ | ४४.७% | ४ | ४५.०% | १० | ४४.६% | ९ | ४३.७% | ९ | ४६.१% | १८ | ४१.९% | ४ |
| कॉंग्रेस आघाडी | ४९.३% | १७ | ४९.३% | १६ | ४५.७% | १० | ४६.१% | ११ | ४६.९% | ११ | ३८.४% | १ | ४७.७% | १६ |
| भाजप आघाडी | ४.५% | ० | ४.६% | ० | ५.६% | ० | ८.०% | ० | ७.९% | ० | १२.१% | १ | ६.३% | ० |
| इतर | ३.०% | ० | १.५% | ० | ३.७% | ० | १.३% | ० | १.५% | ० | ३.४% | ० | ४.१% | ० |
| एकूण | १००.०% | २० | १००.०% | २० | १००.०% | २० | १००.०% | २० | १००.०% | २० | १००.०% | २० | १००.०% | २० |
| पश्चिम बंगाल | १९८९ | १९९६ | ||
| मते % | जागा | मते % | जागा | |
| डावी आघाडी | ५१.४% | ३७ | ४९.१% | ३३ |
| कॉंग्रेस आघाडी | ४२.८% | ५ | ४०.१% | ९ |
| भाजप आघाडी | १.७% | ० | ६.९% | ० |
| इतर | ४.१% | ० | ४.०% | ० |
| एकूण | १००.०% | ४२ | १००.०% | ४२ |
| राजस्थान | १९८९ | १९९१ | १९९६ | १९९८ | १९९९ | २००४ | २००९ | |||||||
| मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | |
| भाजप | ५५.३% | २५ | ४०.९% | १२ | ४२.४% | १२ | ४१.७% | ५ | ४७.२% | १६ | ४९.०% | २१ | ३६.६% | ४ |
| कॉंग्रेस | ३७.०% | ० | ४४.०% | १३ | ४०.५% | १२ | ४४.५% | १८ | ४५.१% | ९ | ४१.५% | ४ | ४७.२% | २० |
| इतर | ७.७% | ० | १५.१% | १७.१% | १ | १३.८% | २ | ७.७% | ० | ९.५% | ० | १६.२% | १ | |
| एकूण | १००.०% | २५ | १००.०% | २५ | १००.०% | २५ | १००.०% | २५ | १००.०% | २५ | १००.०% | २५ | १००.०% | २५ |
| मध्य प्रदेश | १९८९ | १९९१ | १९९८ | १९९९ | २००४ | २००९ | ||||||
| मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | |
| भाजप | ४८.०% | ३१ | ४१.९% | १२ | ४५.७% | ३० | ४६.६% | २९ | ४८.१% | २५ | ४३.४% | १६ |
| कॉंग्रेस | ३७.७% | ८ | ४५.३% | २७ | ३९.४% | १० | ४३.९% | ११ | ३४.१% | ४ | ४०.१% | १२ |
| बसपा | ४.३% | ३.५% | १ | ८.७% | ० | ५.२% | ० | ४.८% | ० | ५.९% | १ | |
| इतर | १०.०% | १ | ९.३% | ६.२% | ० | ४.३% | ० | १३.०% | ० | १०.६% | ० | |
| एकूण | १००.०% | ४० | १००.०% | ४० | १००.०% | ४० | १००.०% | ४० | १००.०% | २९ | १००.०% | २९ |
| पश्चिम बंगाल | १९९१ | १९९८ | १९९९ | २००४ | ||||
| मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | |
| डावी आघाडी | ४८.१% | ३७ | ४६.८% | ३३ | ४६.७% | २९ | ५०.७% | ३५ |
| कॉंग्रेस आघाडी | ३६.२% | ५ | १६.४% | १ | १३.३% | ३ | १५.३% | ६ |
| भाजप आघाडी | ११.७% | ० | ३४.६% | ८ | ३७.९% | १० | २९.१% | १ |
| इतर | ४.०% | ० | २.२% | ० | २.०% | ४.८% | ||
| एकूण | १००.०% | ४२ | १००.०% | ४२ | १००.०% | ४२ | १००.०% | ४२ |
| महाराष्ट्र | १९९९ | |
| मते % | जागा | |
| भाजप-सेना | ३८.१% | २८ |
| कॉंग्रेस | २९.७% | १० |
| राष्ट्रवादी | २४.६% | ८ |
| इतर | ७.६% | २ |
| एकूण | १००.०% | ४८ |
| ओरिसा | २००९ | |
| मते % | जागा | |
| बिजद | ३७.२% | १५ |
| कॉंग्रेस | ३२.७% | ६ |
| भाजप | १६.९% | ० |
| इतर | १३.२% | ० |
| एकूण | १००.०% | २१ |
| उत्तर प्रदेश | १९८९ | १९९१ | १९९६ | १९९८ | १९९९ | २००४ | २००९ | |||||||
| मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | मते % | जागा | |
| भाजप | ८.२% | ९ | ३२.८% | ५२ | ३४.४% | ५३ | ३८.०% | ६० | २९.१% | ३१ | २३.०% | ११ | २०.८% | १५ |
| कॉंग्रेस | ३१.८% | १५ | १८.०% | ५ | ८.१% | ५ | ६.०% | ० | १७.२% | १२ | १२.०% | ९ | १८.३% | २१ |
| जनता दल | ३७.७% | ५८ | २१.३% | २२ | ||||||||||
| जनता दल (स)/सपा | १०.५% | ४ | २६.१% | १८ | २८.७% | २० | २४.१% | २६ | ३१.२% | ३८ | २३.३% | २३ | ||
| बसपा | ९.९% | २ | ८.७% | १ | २०.६% | ६ | २०.९% | ४ | २२.१% | १४ | २४.७% | १९ | २७.४% | २० |
| इतर | १२.४% | २ | ८.७% | १ | ११.८% | ३ | ६.४% | १ | ७.५% | २ | १४.४% | ३ | १०.२% | १ |
| एकूण | १००.०% | ८५ | १००.०% | ८५ | १००.०% | ८५ | १००.०% | ८५ | १००.०% | ८५ | १००.०% | ८० | १००.०% | ८० |
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प्रतिक्रिया
23
सर्वच भाग माहितीपूर्ण आणि रोचक! तुर्तास वाचत आहे. अनुमान बघण्यात जास्त उत्सुकता आहे! :)
प्रस्तावना सेट झाली आहे, पुढिल अनुमान बघायला अधिक उत्सुक
रोचक विदा.. आणि तुमचे परिश्रम नक्कीच स्तुत्य आहेत. मानलं बुवा तुम्हाला.!
परंतु स्पष्टीकरण अजून आले असते तरी चालले असते असे वाटून राहिले.
ही जर प्रस्तावना असेल तर आता नक्कीच पुढील भागांच्या प्रतिक्षेत!!
In reply to रोचक विदा.. आणि तुमचे परिश्रम by हाडक्या
तुमचे परिश्रम नक्कीच स्तुत्य आहेत. मानलं बुवा तुम्हाला...!+१११११
पुढील भागांच्या प्रतिक्षेत!!+१
मस्त..बरीच नवीन माहिती मिळाली. धन्यवाद.
भरपुर पेशन्स आहे साहेब तुमच्यात्..एवढी माहिती गोळा करुन त्याचा विदा द्यायचा..कमाल..
एकदम मस्त!
माहीती साठी धन्यवाद.
सर्वांना धन्यवाद. मिपाकरांचे प्रतिसाद नेहमी उत्साह वाढवणारे असतात.
दोन राहिलेले मुद्दे
१. मिपाकर सराटा यांनी खरडीतून विचारले की उत्तर प्रदेशात २००९ मध्ये भाजप आणि राष्ट्रीय लोकदल यांची युती होती तेव्हा दोन पक्षांची मते आणि जागा एकत्र करून तक्त्यात दाखवल्या आहेत का. त्याचे उत्तर हो असे आहे. १९८९ मध्ये भाजप आणि जनता दल यांची मध्य प्रदेश आणि राजस्थानात युती होती.त्या दोन पक्षांच्या जागा आणि मते एकत्र करून भाजपच्या अकाऊंटला दाखविल्या आहेत.
२. १९९८ च्या लोकसभा निवडणुकांमध्ये महाराष्ट्रात काँग्रेस-रिपब्लिकन पक्ष-समाजवादी पक्ष विरूध्द भाजप-सेना युती असा दुरंगी सामना झाला होता.त्यावेळी काँग्रेस-रिपब्लिकन-समाजवादी युतीला ५०% मते आणि ३७ जागा मिळाल्या होत्या. तर भाजप-सेना युतीला ४२% मते मिळून १० जागा मिळाल्या होत्या. वर म्हटल्याप्रमाणे तिरंगी लढतीत ४२% मते मिळाली तर तो पक्ष बरेच मोठे यश मिळवतो (अनेकदा अगदी स्वीपही करतो) पण दुरंगी लढतीत ४२% मतांचा फार उपयोग होत नाही. ही मते किमान ४५% हवीत तरच उल्लेखनीय प्रमाणात जागा मिळू शकतात.
| महाराष्ट्र-१९९८ | मते % | जागा |
| कॉंग्रेस-रिपब्लिकन-सपा | ५०.४% | ३७ |
| भाजप-सेना | ४२.१% | १० |
| इतर | ७.५% | १ |
| एकूण | १००.०% | ४८ |
नेहमी प्रमाणेच प्रचंड अभ्यास करुन लिहिलेला लेख आणि चपखल विश्लेषण.
सॉलिड आभ्यास करुन लिहिलय.
क्लिंटन, जबरदस्त लेख राव.... पुढला भाग लवकर येऊ द्यात :)
मस्त विश्लेषण!
हा भाग खूप आवडला. मी पहिल्या दोन तक्त्यांतले आकडे घेऊन टक्केवारी जागा विरुद्ध टक्केवारी मतं असे आलेख एक्सेलवर काढून बघितले. त्यावरून दुरंगी लढतीत चाळीस ते अठ्ठेचाळीस टक्के मतांमध्ये जागांची टक्केवारी दहापासून सुमारे नव्वदपर्यंत जाताना दिसते. म्हणजे छोट्याशा स्विंगमुळे जागांची संख्या प्रचंड प्रमाणात बदलते. हा मुद्दा इतक्या छान आकडेवारीनुसार सांगितल्याबद्दल धन्यवाद.
त्यावरून एक विचार आला. निवडणुकांपूर्वी जनमताचा कौल आजमावणारे पोल सर्वसाधारणपणे ३ टक्के एरर सांगतात. ही एरर जागांच्या संख्यांसाठी असते की मतांच्या हे शोधून काढणं रोचक ठरेल. कारण मतांत ३ टक्के फरक पडत असला तर जागांमध्ये महाप्रचंड फरक पडू शकेल.
In reply to हा भाग खूप आवडला. मी पहिल्या by राजेश घासकडवी
निवडणुकांपूर्वी जनमताचा कौल आजमावणारे पोल सर्वसाधारणपणे ३ टक्के एरर सांगतात. ही एरर जागांच्या संख्यांसाठी असते की मतांच्या हे शोधून काढणं रोचक ठरेल. कारण मतांत ३ टक्के फरक पडत असला तर जागांमध्ये महाप्रचंड फरक पडू शकेल.मला वाटते की हा ३% ची एरर मार्जिन म्हणजे ३ पर्सेंटेज पॉईंटची एरर नसते. समजा एखाद्या पक्षाला ३०% मते मिळतील असे या पोलमध्ये प्रोजेक्ट केले असेल तर ३०% च्या ३% म्हणजे ०.९% इतकी एरर मार्जिन म्हणजे २९.१% ते ३०.९% या दरम्यान मते असतील असे पोल प्रोजेक्ट करतात असे वाटते.अगदी २००४ मध्येही मतांच्या टक्क्यांच्या प्रोजेक्शनमध्ये फार चूक नव्हती असे वाचल्याचे आठवते. पण जागांच्या अंदाजांमध्ये मात्र पूर्णच उलटेपालटे झाले.या क्षणी जुने दुवे नाहीत. मतांच्या टक्केवारीत ३ पर्सेटेन्ज पॉईंटची एरर असेल तर जागांचे अंदाज २००४ मध्ये चुकले त्यापेक्षा अनेक पटींनी जास्त चुकतील. मला वाटते की मतांच्या टक्केवारीवरून जागांचे प्रोजेक्शन करण्यात जास्त मोठी चूक होते आणि पब्लिक डोमेनमध्ये मतांच्या टक्केवारीपेक्षा जागांच्या अंदाजाला अधिक महत्व मिळते आणि ओपिनिअन पोल सगळेच रद्दड असे चित्र उभे राहते.ओपिनिअन पोलच्या मर्यादा आहेतच पण तरीही त्याविरूध्द इतके टोकाचे मतही अयोग्य आहे असे वाटते.
In reply to ओपिनिअन पोल by क्लिंटन
ओपिनिअन पोलच्या मर्यादा आहेतच पण तरीही त्याविरूध्द इतके टोकाचे मतही अयोग्य आहे असे वाटते.नाही, त्यांच्याविरुद्ध मत नाही. त्यांचं काम किती महाप्रचंड कठीण आहे हे सांगण्याचा प्रयत्न आहे. मला टेनिसच्या बॅटचं उदाहरण सुचतं. किती वेगाने, कुठच्या कोनात बॅट बॉलवर आपटणार हे आपल्याला कदाचित थोड्या एररसकट प्रेडिक्ट करता येईल. पण त्या लहान एररमुळे प्रत्यक्षात बॉल कुठे जाऊन पडेल यात प्रचंड मोठी एरर येते. एक प्रकारचा अॅंप्लिफिकेशन फॅक्टर आहे. (मी तो एक्सेल चार्ट सेव्ह करून इथे डकवायला हवा होता - पण तुम्हाला जमलं तर करून बघा. पार्टी कुठची आहे याकडे दुर्लक्ष करून पर्सेंट सीट्स अॅज अ फंक्शन ऑफ पर्सेंट व्होट प्लॉट केला तर प्रचंड स्टीप स्लोप येतो. साधारण एक टक्का कमी मतं मिळाली तर सीट्स सुमारे दहा टक्क्यांनी कमी होतात) ओपिनियन पोल्स कसे काम करतात हे समजावून सांगणारा एक अतिशय छान लेख.
In reply to ओपिनिअन पोलच्या मर्यादा आहेतच by राजेश घासकडवी
पर्सेंट सीट्स अॅज अ फंक्शन ऑफ पर्सेंट व्होट प्लॉट केला तर प्रचंड स्टीप स्लोप येतो. साधारण एक टक्का कमी मतं मिळाली तर सीट्स सुमारे दहा टक्क्यांनी कमी होतात)या लेखाचा उद्देश नेमकी हीच माहिती देणे हा आहे :) चतुरंगी लढतीमध्ये आणखी जास्त स्लोप येईल. अर्थात मते किती एकवटलेली/विखुरलेली आहेत हा मुद्दा चतुरंगी लढतीत बराच जास्त महत्वाचा असतो. बाकी ओपिनिअन पोलवरचा लेख वाचतोच.
In reply to पर्सेंट सीट्स अॅज अ फंक्शन ऑफ by क्लिंटन
सर्वांच्या प्रोत्साहनाबद्दल परत एकदा आभार मानतो.
चतुरंगी लढतीमध्ये आणखी जास्त स्लोप येईल.यात दुरूस्ती हवी आहे. दुरंगी लढतीत हा आलेख एक लाईन असेल.तर चतुरंगी लढतीत हा बराचसा एक्स्पोनेन्शिअल आलेख असेल.म्हणजे साधारण २०% मतांपर्यंत फार जागा नाहीत पण त्यानंतर जागांचे मिळणारे प्रमाण वाढत जाणे आणि ३०-३२% मतांच्या वर खूप जास्त स्लोप असणे असे या आलेखाचे स्वरूप असेल.
In reply to दुरूस्ती by क्लिंटन
हे तितकंसं पटलं नाही. तुम्ही दिलेल्या टेबलातच काही ठिकाणी फक्त आठ टक्के मतं पडूनही काही जागा मिळालेल्या दिसतात. मला वाटतं चतुरंगी लढतींमध्ये प्रत्येक जागेसाठी चार जणांत तीव्र लढत नसते हा आणखीन एक किचकटपणाचा भाग झाला. म्हणजे प्रत्येक पार्टीचे काही मतदारसंघ असतात, आणि तितकेच लढवले तरीही त्या पार्टीला काही जागा मिळू शकतात. त्यामुळे चतुरंगी लढतींसाठी तोच आलेख जरा कमी चढाचा होईल असं वाटतं. आत्ता वेळ नाही, जमेल तेव्हा काही चार्ट्स तयार करून पेस्ट करतो. दरम्यान तुम्हीही तपासून पहा.
याचा फायदा असा होईल की जिथे चतुरंगी लढती आहेत तिथे स्लोप कमी असल्यामुळे ओपिनियन पोल्सचे अंदाज कदाचित जास्त बरोबर येऊ शकतील. (हाही माझा अंदाजच आहे, पण तपासून बघण्याजोगा वाटतो)
In reply to हे तितकंसं पटलं नाही. तुम्ही by राजेश घासकडवी
तुम्ही दिलेल्या टेबलातच काही ठिकाणी फक्त आठ टक्के मतं पडूनही काही जागा मिळालेल्या दिसतात.' चतुरंगी लढतीत एक आकडी टक्क्यांमध्ये मते मिळाली तर फारशा जागा मिळत नाहीत याचा अर्थ एकही जागा मिळत नाही असा नक्कीच नाही.पण ८% मते जिंकून राज्यातील १५-२०% जागा जिंकल्या असेही होताना दिसणार नाही. याउलट २०% मते मिळून त्या प्रमाणात इन्क्रिमेन्टल जागा मिळतात असे चित्र दिसत नाही.पण एकदा ३०-३२% पेक्षा जास्त मते मिळाली की मात्र मोठ्या प्रमाणात फायदा त्या पक्षाला होतो.उदाहरणार्थ उत्तर प्रदेशात १९८९ मध्ये जनता दलाला (मित्रपक्षांसह) ३७.७% मते आणि ५८ जागा, १९९१ मध्ये भाजपला ३२.८% मते आणि ५२ जागा, १९९६ मध्ये भाजपला ३४.४% मते आणि ५३ जागा, १९९८ मध्ये ३८% मते आणि ६० जागा (मित्रपक्षांसह) असे चित्र दिसते.तेव्हा चतुरंगी लढतीत ३०-३२% मते हा एक महत्वाचा टप्पा असतो.तो एकदा ओलांडला की त्या आलेखाचा स्लोप बराच जास्त स्टीप होतो.पण तोपर्यंत तो तितका स्टीप नसतो. (अवांतरः काही ओपिनिअन पोल उत्तर प्रदेशात भाजपला ३८% मते देत आहेत.पण जागा मात्र ४५ पर्यंत देत आहेत. भाजपने ३८% मते खरोखरच मिळविल्यास भाजप उत्तर प्रदेशात ५५ पर्यंत (कदाचित जास्तही) जागा मिळवेल. याचे कारण राज्यात भाजप-सपा-बसपा आणि काँग्रेस अशी चतुरंगी लढत आहेच.तसेच राज्याच्या पश्चिम भागात (दिल्लीजवळच्या) आआपही बर्यापैकी मते घेईल आणि त्या मतदारसंघांमध्ये पंचरंगी लढती होतील असे चित्र आहे.तशा परिस्थितीत त्या भागात ३०% मते जिंकणारा पक्ष तो भाग अगदी स्वीप करेल. नक्की काय ते १६ मे रोजीच कळेल). मते किती एकत्र झाली आहेत आणि किती विखुरलेली आहेत हा महत्वाचा मुद्दा नेहमीच असतो. आंध्र प्रदेशात इतकी वर्षे काँग्रेस विरूध्द तेलुगु देसम अशी दुरंगी लढत होत असे.तरीही हैद्राबादमधून एम.आय.एम हा स्थानिक पक्ष नेहमी जिंकत असतो.गेल्या अनेक निवडणुकांमध्ये हैद्राबादची जागा एम.आय.एम सोडून अन्य कोणी जिंकलेली नाही.या पक्षाला आंध्र मध्ये १% च्या आसपास मते मिळत असत.तेव्हा दुरंगी लढतीतही मते एकत्र झाली तर एक-सव्वा टक्का मतांमध्येही पक्ष जागा मिळवू शकतो.याउलट मध्य प्रदेशात १९८४ मध्ये भाजपला ३०% पेक्षा जास्त मते मिळाली पण एकही जागा मिळाली नाही.तेव्हा मते किती एकत्र आहेत आणि किती विखुरलेली आहेत हा मुद्दा महत्वाचा आहेच.तेव्हा या प्रकारचे विश्लेषण करायला मतांच्या टक्केवारीचे स्टॅन्डर्ड डिव्हिएशन तपासून बघायला हवे. मते काही मतदारसंघांमध्ये एकवटली आणि इतर मतदारसंघांमध्ये कमी असतील तर स्टॅन्डर्ड डिव्हिएशन जास्त येईल आणि सर्वत्र जवळपास सारखीच मते मिळाली तर स्टॅन्डर्ड डिव्हिएशन कमी येईल. हा प्रयोग मी केवळ कर्नाटकात केला आहे (कारण ते माझे आवडते राज्य आहे :) ) पण इतर राज्यात केला नाही. तो इथे प्रेझेन्टही केलेला नाही. बाकी या प्रकल्पासाठी टक्केवारी सोडून इतर आकड्यांचा वापर मी फारसा केलेला नाही.अंदाज व्यक्त करताना त्या राज्यातील राजकीय परिस्थिती आणि किती टक्के मते फिरतील हा सब्जेक्टिव्ह कॉल आणि थोडे गट फिलिंग यांचा आधार घेत आहे.
जमेल तेव्हा काही चार्ट्स तयार करून पेस्ट करतो.हो नक्की.वाट बघत आहे.
In reply to ओपिनिअन पोलच्या मर्यादा आहेतच by राजेश घासकडवी
छान लेखाची लिंक दिलीत. धन्यवाद!
लेखमाला वाचते आहे. विश्लेषण आवडते आहे.
इतका डेटा साठवून मग त्यांत डोकं घालून अर्थ काढण्याच्या शोधक वृत्तीसाठी ___/\__ . वाचतो आहे.
लेखमालेतील भाग आवडले. 'महाराष्ट्र' या भागाची वाट पाहत आहे.
वाचतोय!