(गलका!) — केशवसुमार , Fri, 07/31/2009 - 19:53 प्रतिक्रिया द्या 💬 प्रतिसाद (5) हाहाहाहा श्रावण मोडक Fri, 07/31/2009 - 20:02 नवीन वा. सुरेख. "जागा झाला माझ्यामधला आज बेरकी "केश्या"..." आज? की नेहमीच? गलका आवडला ! प्रा.डॉ.दिलीप बिरुटे Fri, 07/31/2009 - 20:04 नवीन मौन आमचे घरात असते, घरात असता पत्नी... ती माहेरी गेल्यावरती घरी मित्रांचा गलका! पत्नी पिडितांची संख्या वाढते आहे, हे मात्र खरे आहे. :) (ह. घ्या) छान सुनील Fri, 07/31/2009 - 20:24 नवीन मस्त. प्रदीप कुलकर्णी यांची मूळ गझलदेखिल छानच! Doing what you like is freedom. Liking what you do is happiness. मस्त चेतन Sat, 08/01/2009 - 10:20 नवीन गुरुजी एकदम फक्कड जमलयं वाचुन एकदम ठसका लागला __ /\__ चेतन वा! क्रान्ति Sat, 08/01/2009 - 15:33 नवीन मूळ गझलइतकंच सरस विडंबन! क्रान्ति सजदे में सर झुकाया तो मैंने सुनी सदा | कांटों में भी फूलो़ को खिलाता ही चला जा अग्निसखा रूह की शायरी
हाहाहाहा श्रावण मोडक Fri, 07/31/2009 - 20:02 नवीन वा. सुरेख. "जागा झाला माझ्यामधला आज बेरकी "केश्या"..." आज? की नेहमीच?
गलका आवडला ! प्रा.डॉ.दिलीप बिरुटे Fri, 07/31/2009 - 20:04 नवीन मौन आमचे घरात असते, घरात असता पत्नी... ती माहेरी गेल्यावरती घरी मित्रांचा गलका! पत्नी पिडितांची संख्या वाढते आहे, हे मात्र खरे आहे. :) (ह. घ्या)
छान सुनील Fri, 07/31/2009 - 20:24 नवीन मस्त. प्रदीप कुलकर्णी यांची मूळ गझलदेखिल छानच! Doing what you like is freedom. Liking what you do is happiness.
वा! क्रान्ति Sat, 08/01/2009 - 15:33 नवीन मूळ गझलइतकंच सरस विडंबन! क्रान्ति सजदे में सर झुकाया तो मैंने सुनी सदा | कांटों में भी फूलो़ को खिलाता ही चला जा अग्निसखा रूह की शायरी
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