| साहित्य प्रकार | शीर्षक | लेखक | प्रतिक्रिया |
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| जनातलं, मनातलं | अर्धा कप दुध... | कर्नलतपस्वी | 18 |
| जनातलं, मनातलं | गाढ झोपेतलं माझं स्वप्नं. | श्रीकृष्ण सामंत | 0 |
| जनातलं, मनातलं | निसर्ग सृष्टीचं सादरीकरण | श्रीकृष्ण सामंत | 0 |
| जनातलं, मनातलं | शिकार... | जयंत कुलकर्णी | 7 |
| जनातलं, मनातलं | संगीत | श्रीकृष्ण सामंत | 0 |
| जनातलं, मनातलं | लागट बोलणं | श्रीकृष्ण सामंत | 24 |
| जनातलं, मनातलं | “आनंदी असणं म्हणजे काय हो भाऊसाहेब?” | श्रीकृष्ण सामंत | 3 |
| जनातलं, मनातलं | सोनचाफ्याची फुलं आणि तो स्पर्श(भाग २) | श्रीकृष्ण सामंत | 0 |
| जनातलं, मनातलं | आतुरतेने वाट पाहत आहे तो चित्रपट | चौकस२१२ | 7 |
| जनातलं, मनातलं | समुद्राच्या लाटांवर माझ्या विचारांची खलबल. | श्रीकृष्ण सामंत | 1 |
| जनातलं, मनातलं | ( लपविलास तू तगडा खंबा – डोम्बलडन ) | चौथा कोनाडा | 26 |
| जनातलं, मनातलं | न्यूत की द्यूत? | माहितगार | 19 |
| जनातलं, मनातलं | वाट पहाणं | श्रीकृष्ण सामंत | 0 |
| जनातलं, मनातलं | समाजात वावरताना इतरांशी सामना कसा करावा | श्रीकृष्ण सामंत | 2 |
| जनातलं, मनातलं | नात्यांचं भावस्पर्शी इंद्रधनुष्य- काहे दिया परदेस | मार्गी | 0 |
| जनातलं, मनातलं | ब्रम्हांडं आणि कृष्णविवर (ब्ल्याक होल) | श्रीकृष्ण सामंत | 4 |
| जनातलं, मनातलं | सोनचाफ्याची फूलं आणि तो स्पर्श | श्रीकृष्ण सामंत | 6 |
| जनातलं, मनातलं | प्रकाश नारायण संत | चौकस२१२ | 0 |
| जनातलं, मनातलं | (मी आणि बार) | अहिरावण | 0 |
| जनातलं, मनातलं | मिपा वाचकापैकी काही टीकाकारानो, माझ्यावर तुम्ही--- | श्रीकृष्ण सामंत | 27 |
| जनातलं, मनातलं | पुन्हा एकदा कोकणातला पाऊस | श्रीकृष्ण सामंत | 0 |
| जनातलं, मनातलं | काळ्या अमावास्या रात्री पाहिलेलं तारांगण | श्रीकृष्ण सामंत | 0 |
| जनातलं, मनातलं | माझी नर्मदा परिक्रमा : इंद्रावती नदीत गोमातेकरवी वाचवले प्राण | Narmade Har | 10 |
| जनातलं, मनातलं | प्रो.देसाई एक वल्ली | श्रीकृष्ण सामंत | 11 |
| जनातलं, मनातलं | वय निघून गेले | श्रीकृष्ण सामंत | 4 |
| जनातलं, मनातलं | हृदयसंवाद (४) : हृदयविकाराचे प्रकार | हेमंतकुमार | 0 |
| जनातलं, मनातलं | एका मधमाशीचं प्रेत | श्रीकृष्ण सामंत | 13 |
| जनातलं, मनातलं | एकटेपणा | श्रीकृष्ण सामंत | 15 |
| जनातलं, मनातलं | समुद्र किनाऱ्यावर वाळूत पाय खुपसून बसायला मला आवडतं. | श्रीकृष्ण सामंत | 0 |
| जनातलं, मनातलं | महात्मा गांधीं म्हणालेत, "डोळ्याच्या बदल्यात डोळा घेणं संपूर्ण जगाला आंधळं बनवेल” | श्रीकृष्ण सामंत | 36 |