< < < मजबूरी है > > >
लेखनविषय:
काव्यरस
पैजारबुवा के पाऊल पे पाऊल डालते हुए मयभी इधर अपनी एक मजबूर रचना प्रस्तुत करती हूँ. मिकादादा, पैजारबुवा, एसभाय, और अपने मोहल्ले के आन बान शान अभ्या दो डॉट सबकी माफी पयलेसे ले लेती हूँ. दुनियाकी हर एक औरत अपने नवरे का सबसे ज्यादा म्हणजे लयच गुस्सा कब करती मालूम? जब वो घोरता है तब. इसलिये मैने यइच टॉपिकपे फटाफट सटासट एक कविता लिखही डाली.
ठहेरे हुए पानी मे
किसीने डाले पत्थरकी तरह
होता है तेरा घोरना
कहेने को तो पत्थरकी आवाज
चूल्लूक इत्तीसीच होती है
बस पानी में उस चूल्लूककी
अनगिनत तरंगें उठती है
जैसे तू
रात के सन्नाटेको चीरती तुम्हारी घूर्र
दिमाग की सतहको बार बार छूकर
रूह की तह तक पहुँच जाती है
तेरा यही हुनर
मुझे तुम्हारा नाक दबाके
तुम्हारी नींद खराब करनेपे
मजबुर कर देता है
घोरते रेहना
तेरी मजबुरी है
नाक दबाके उठाना
मेरी मजबुरी हैी.
वाचन
3990
प्रतिक्रिया
10
हाहा मस्तच हे पण !
=))
In reply to =)) by प्रचेतस
गुरुबिन कौन बताये बाट!
प्रत्यक्षाहुनी प्रतिमा उत्कट!
In reply to प्रत्यक्षाहुनी प्रतिमा उत्कट! by मिसळलेला काव्यप्रेमी
आपका ह्रुदय बहुत बोले तो
अ र्र् र र....
In reply to अ र्र् र र.... by नीलमोहर
सोप आहे...
हे व्हर्जनही आवडले...
मस्त मजबुरी
वा