लदाख सायकल ने : पांग ते शो-कार मोड (भाग ९)
शेती जास्त प्रमाणात होत नाही म्हणून मांस जास्त खातात. लद्दाख सारख्या ठिकाणी तर हे गरजेचं आहे. ते तिघे यात्रेकरू होते. तिसरा शेजारच्या तंबू मध्ये खात पीत होता. त्यानंतर नाच गाणी सुरु झाली. एक गोलाकार चक्कर मारून नाच सुरु झाला. ती बाई इतके हळू हळू पाय उचलीत होती कि जशी काय झोपली नाचता नाचता. मी पण एक तास कार्यक्रम पाहिला आणि झोपायला गेलो. आज २८ किमी सायकल चालवली.
दिवस अकरावा
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| पांग च्या पुढे चढाई आहे. |
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| डोंगरावरून दिसणारं पांग |
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| सोनेरी छटा मध्ये उजळून निघालेलं लढाख |
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| उन पडल्यावरती लढाख चे डोंगर सोनेरी होतात. |
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| मोरे मैदान |
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| हा फोटो माझ्या लैपटॉपचा स्क्रीन सेवर आहे. |
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| मेंढ्या चारणाऱ्या मेंढपाळ वाल्यांच ठिकाण |
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| १५ किमी अश्याच रस्त्यांनी जावे लागले. खूप खडे होते |
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| शो-कार मोड |
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| शो-कार मोडला जानारा रस्ता |
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| पाणी आणि गवत असल्याने मेंढ्यांची मज्जा |
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| शो-कार एक छोटासा तलाव आहे. लांबूनच दिसू लागतो. |
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| पुर्थ्वी च्या भोवती वातावरण सारख्याच उंचीवर आहे. पण जमीन खाली-वर आहे. लढाख मध्ये ढगांची सावली डोंगरावर पडते. काळा डाग म्हणजे ढगाची सावली आहे. |
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| लढाखी गाढव त्यालाच क्यांग म्हणतात. |
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| शो-कार च्या शेजारी वसलेलं गाव |
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| वरती दिसणारं गोम्पा आणि खाली वसलेलं गाव |
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| राहण्यासाठी आणि खाण्यासाठी स्थानिक लोकांनी लावलेलं तंबू. |
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| गाढवांचा (क्यांग) कळप |
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Nehami pramanech mast!!
आपल्या प्रतिसादबद्दल अनेक धन्यवाद !!
क्या बात! डोगर/ पर्वतरांगा,
झक्कास. आवड्यास.
स्वर्गीय प्रदेश आहे हा!
सुंदर लेख!!
फोटो सुंदर च लेख ही पुभाप्र.
अप्रतिम फोटो !
भयंकर सुंदर.
Khoopch sundar.