दागे उल्फत का जलाना
आज आखिर कुछ लहू से, ऐसे गुजर रहा है..
कोइ पूछे तो कहेंगे, जनाजा गुजर रहा है..
बात कुछ ऐसी अनकहीसी, थी कही किसीने ..
गूंज लेके अब-तलक, ये दिल संभल रहा है..
कुछ पलों की बस जवानी, कुछ समेटी यादें..
इतनाही सामां बचा था, अब के ये जल रहा है..
दागे उल्फत का जलाना, जुल्मे-फित्रत नही "सागर"
जी के जलना, जलके जीना, सिलसिला ये चल रहा है..
--सागरलहरी.
मिसळपाव