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२६/११ आठवतंय कां?

लेखक सुधीर काळे यांनी मंगळवार, 25/08/2009 15:09 या दिवशी प्रकाशित केले.
http://timesofindia.indiatimes.com/news/india/Jaswant-likely-to-visit-P… Jaswant likely to visit Pak for launch of his book आता बोला! जसवंत-जी, २६/११ हा दिवस आठवा!!!

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प्रतिक्रिया 57

प्रतिक्रिया

नाही. आता सवय झाली आहे. हल्ले बघायची आणि विसरायची.

In reply to by सखाराम_गटणे™

सध्या चर्चेत स्वाइन फ्लु आहे. नंतरचं नंतर पाहू. ----------------------------------------------------------------- तुम्ही जिंकलात का हारलात याला काहिच महत्व नाही. मी जिंकलो का हरलो हे महत्वाचे. -----------------------------------------------------------------

In reply to by सखाराम_गटणे™

आता सुदर्शन साहेब सुद्धा जाणार आहेत बाबा ए कौम संत जिन्नाच्या दर्ग्यावर चादर चढवायला. पास हा शब्द जर इंग्रजी असेल तर नापास हा शब्द कोणत्या भाषेतला आहे

प्रकाशन सोहळा कसाबच्या आई वडिलांच्या उपस्थितीत पार नाही पाडला म्हणजे मिळवले. माजी सरसंघचालक सुदर्शन ह्यांनाही आता जीना प्रेमाचे भरते आले आहे-http://timesofindia.indiatimes.com/Jinnah-was-committed-to-undivided-In… जीनांवर स्तुतीसुमने उधळताना ह्यां लोकांचे खरे टार्गेट नेहरु-गांधी (आणि आता पटेल) आहेत हे आता कळून चुकले आहे. भेन्डि क्ष्^न + य्^न = झ्^न

In reply to by चिरोटा

एकंदरीतच या संदर्भात न्या. रानडे यांच्या १०१व्या जयंतीच्या निमित्ताने बाबासाहेब आंबेडकरांनी केलेले आणि नंतर रिसर्च पेपर सारखे छापले गेलेले भाषण (१९४३), आत्ताच शोधताना मिळाले. वेळ असल्यास सगळे अवश्य वाचा. पण त्यातील गांधी आणि जिनांच्या बाबतीतील एक भाग खाली जसाच्या तसा लावतो: संदर्भः RANADE GANDHI & JINNAH, ADDRESS DELIVERED ON THE 101ST BIRTHDAY CELEBRATION OF MAHADEV GOVIND RANADE HELD ON THE 18TH JANUARY 1943 IN THE GOKHALE MEMORIAL HALL, POONA By The Hon'ble Dr. B. R. AMBEDKAR, M.A., Ph.D., D.Sc., BARRISTER-AT-LAW Member, Governor-General's Executive Council BOMBAY THACKER & CO, LTD. 1943
Who are the present-day politicians with whom Ranade is to be compared? Ranade was a great politician of his day. He must therefore be compared with the greatest of today. We have on the horizon of India two Great Men, so big that they could be identified without being named—Gandhi and Jinnah. What sort of a history they will make may be a matter for posterity to tell. For us it is enough that they do indisputably make headlines for the Press. They hold leading strings. One leads the Hindus, the other leads the Muslims. They are the idols and heroes of the hour. I propose to compare them with Ranade. How do they compare with Ranade? It is necessary to make some observations upon their temperaments and methods, with which they have now familiarized us. I can give only my impressions of them, for what they are worth. The first thing that strikes me is that it would be difficult to find two persons who would rival them for their colossal egotism, to whom personal ascendancy is everything and the cause of the country a mere counter on the table. They have made Indian politics a matter of personal feud. Consequences have no terror for them; indeed they do not occur to them until they happen. When they do happen they either forget the cause, or if they remember it, they overlook it with a complacency which saves them from any remorse. They choose to stand on a pedestal of splendid isolation. They wall themselves off from their equals. They prefer to open themselves to their inferiors. They are very unhappy at and impatient of criticism, but are very happy to be fawned upon by flunkeys. Both have developed a wonderful stagecraft, and arrange things in such a way that they are always in the limelight wherever they go....Each of course claims to be supreme. If supremacy was their only claim, it would be a small wonder.

In reply to by विकास

फॅण्टॅस्टिक, दो नॉट शॉकिंग... गांधीजींबद्दल महादेवभाईंनीच लिहिलेलं आहे म्हणे "सकाळी पेपरात नाव नसेल तर नाराज होतो म्हातारा (ओल्ड मॅनचे भाषांतर)" पण अतिशय समर्पक विवेचन. लेख मुळातून वाचेनच. फक्त एकच वाटतंय, केवळ लेखकाचं नाव आंबेडकर आहे म्हणून गदारोळ नाही होणार. दुसरंच काही नाव असतं तर? बिपिन कार्यकर्ते

In reply to by बिपिन कार्यकर्ते

वर दिलेल्या प्रतिसादात अनावधानाने हा दुवा देयचा राहीला. तो या वेगळ्या प्रतिसादात तसे मूळ प्रतिसादात पण देत आहे.

In reply to by विकास

गांधी आणी जीनांच्या व्यक्तिमत्त्वाचा इतक्या थेट शब्दातला उभा छेद हा फक्त आंबेडकरांसारखा माणूसच करु शकतो. अत्यंतिक टोकाच्या अवहेलनांमधून ते वर आले असल्याने, अस्पृश्यतेच्या भीषण वास्तवाशी लढत असल्याने गांधींच्या हरिजनकळवळ्या आडचा आणी देशभक्तीच्या मागचा खरा चेहेरा त्यांनी जोखला ह्यात नवल नाही. (का कोण जाणे अंतू बर्व्याचे वाक्य इथे आठवते "अरे इथे निम्मे कोकण उपाशी, नीं सगळेच उघडें, त्यामुळे ना त्याच्या उपोषणाचे कोणास कौतुक ना पंचाचे, तो कशास येईल इकडे!") चतुरंग

In reply to by चतुरंग

गांधीजी (आणि जीनांबद्दलही) योग्य तो आणि योग्य तेवढा आदर ठेवून, चतुरंगशी सहमत. काळाच्या ओघात दैवतीकरण आणि उदात्तीकरण झाल्या की सत्य झाकोळले जाते. बिपिन कार्यकर्ते

In reply to by विकास

या माहितीबद्दल धन्यवाद! सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

जीना इसी का नाम है -------------------------------------------------- भविष्याच्या अंतरंगात डोकावण्यासाठी इथे टिचकी मारा

जसवंतसिंगांचा याबद्दल जितका निषेध करावा तितका कमीच. परंतु भाषणातील एका वाक्यावरून (भले ते संदर्भ सोडून घेतलेले का असेना) ओबामांना निषेधखलिते पाठवायच्या कल्पनेला अनुसरून जसवंत सिंग यांच्यावर अशा पत्रांचा भडिमार करण्याचा (आणि ओघाओघानेच याबद्दल अभिमान वाटून घेण्याचा) रामबाण उपाय कुणालाच का सुचला नाही बरं अजून? असो. ह्या दुव्यावर हे काम निवासी, अनिवासी, निवासी पण मनाने अनिवासी, अनिवासी आणि मनाने अनिवासी इ. इ. सगळ्या प्रकारच्या भारतीयांना विनामूल्य करता येईल.

नंदन
मराठी साहित्यविषयक अनुदिनी


In reply to by मिसळभोक्ता

वा , अतिशय सुरेख परिचय करून दिलाय दोन शब्दांत , आवडले , -टा.रा.

In reply to by नंदन

मी विचारच करत होतो कीं निषेध कुठे नोंदवायचा. तेवढ्यात तुमचा निरोप आला. त्याचे काय आहे कीं ओबामांच्या "मेलिंग लिस्ट"वर मी असल्यामुळे रिप्लायचे बटण दाबले कीं झाले. पण जसवंतसिंगाच्या बाबतीत ती सोय अजून नाही! म्हणून माहितीबद्दल धन्यवाद. सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by नंदन

नंदन-जी, धन्यवाद! वाचा खालील पोस्ट!! खरोखरच चकटफू! सुधीर काळे ============================ जसवंतसिंग-जी, मैं आपकी तरफ बहुत अभिमानके साथ देखता था। भारतीय भूसेनादलका अफसर, भूतपूर्व संरक्षणमंत्री, भूतपूर्व वित्तमंत्री और भूतपूर्व परराष्ट्रमंत्री इस तरहके बडे-बडे पदोंपर आपने काम किया और बहुत अच्छी और शानदार तरहसे किया। आपके भाषणभी बहुत आशयपूर्ण होते थे, बहुत "to-the-point" होते थे और सवाल करनेवालेको निरुत्तर कर सकते थे। तीन आतंकवादियोंको कंदाहार पहुंचानेका शर्मनाक काम आपके ऊपर सौंपा गया वोभी आपने बहुतही गौरवके साथ किया और उसके बाद मेरे मनमें आपकी प्रतिमा कुछ औरही उज्ज्वल हुई। आपके आजतकके कामका जो गौरवपूर्ण इतिहास है उसे आपने जिन्नासाहबपर किताब लिखके क्यूँ मिट्टीमें मिला दिया? मैंने किताब पढी नहीं क्यूँकि मैं दूर जकार्तामें रहता हूँ और् यहाँ ये किताब मैंने अभीतक देखीभी नाहीं है। मगर अगर देखूँभी तोभी मैं नहीं खरीदूँगा क्यूँ कि मैं मेरी अमदनीका एक पैसाभी किसी गद्दारकी जेबमें नहीं जाने देना चाहता। जिन्नासाहब अच्छे आदमी थे कि खराब आदमी थे ये मुझे मालूम नहीं। एक मिनटके लिये मानके चलें कि जो आपने लिख्खा है वो सहीभी है। मगर जो हमारे देशका दुष्मन है उसके बारेमें हम अच्छा क्यूँ लिख्खें? ऐसे मामलेमें चुप रहनाही जादा उचित है। मगर आपने तो जिन्नासाहबको नायक बनाते हुए हमारे देशके बडे-बडे नेताओंको खलनायक बना दिया है। ऐसा करनेवालेको हम गद्दार नहीं कहें तो और क्या कहें? "भाजपा" जैसे हिंदूधर्मपर गौर करनेवाले राजकीय पक्षमें होते हुए आपने ऐसा क्यूँ किया? अगर ये किताब कोई पाकिस्तानी लिखता तो मैं समझता, कोई काँग्रेसवाला लिखता तोभी मैं समझता, क्यूँ कि मुस्लिम मतदारोंके अनुनय करनेवाली नीतीका गलत इस्तेमाल करते हुएही ये पार्टी आज भारतपर इतने साल राज कर रही है। मनमोहनजी जब बोले कि भारतकी राष्ट्रीय संपत्तीपर पहला हक ("बराबर"का हक नहीं, "पहला" हक) अल्पसंख्यांकोंका है तो मुझे कुछ आश्चर्य नहीं हुआ, क्योंकि काँग्रेस पक्ष तो हमेशा यही नीतीका पालन करते आये हैं। मगर आपभी? भारतीय लोगोंको इस तरहसे "आ बैल मुझे मार" कहनेकी जैसे आदतही लगी है। आपने ये किताब लिखके पैसेके अलावा क्या कमाया और क्या गँवाया इसका हिसाब आप खुदही फुर्सतसे कीजियेगा। क्या आपको नेहरू, बल्लभभाई पटेल जैसे उत्तुंग व्यक्तिमत्ववाले नेताओंको इस तरहसे मलीन बनाकर पैसे कमाने थे? अमरीकी सेनाने अल-घारिब जेलमें कैदियोंपर कुछ अत्याचार किये, मगर उसे दुनियाके सामने लानेवाले अमरीकी वार्ताहरही थे। उन्होंनेभी पैसेके लियेही अपनी माँको (अमरीकाको) बेच डाला। उनको जेलसे फोटो भेजनेवालेभी ऐसेही गद्दार थे। जो कैदी थे वो सद्दामके राजमें खुदही सामान्य जनतापर महाभयंकर अत्याचार करनेवाले लोग थे। उनके लिये क्यूँ सहानुभूती होनी चाहिये? अमरीकी मीडियाकी इस हरकतसे पूरी दुनियामें इज्जत तो उनके देशकीही गयी! जो अत्याचार किये गये वो सही या गलत ये सवाल अलग है। अपनेही देशकी इस तरहसे इज्जत निकालनेके बारेमें मैं बोल रहा हूँ! सद्दामसाहबने, इरानके शहासाहबके सावाक लोगोंने, अहमदिनेजादसाहबके अनुयायिओंने, हमारे सुहार्तोसाहबके अनुयायिओंने खूब अत्याचार किये थे! अगर जेम्स क्लेवेलकी लिख्खी "Whirlwind और Escape इन किताबोंमें लिख्खे हुए अत्याचार ५० प्रतिशतभी सही हो तोभी दिल काँप उठता है। ऐसे लोगोंको उन्हीकी दवा थोडीसा पिला दी तो क्या गलत है उसमें? जैसे ये अमरीकी मीडियावाले गद्दार है उसी तरह हमारी नजरमे आपभी हैं। मेरे जवानीके दिनोंमें एक "काँचकी गुडिया" नामकी पिक्चर आयी थी। उसमे नायिका थी सईदा खान। उस फिल्ममें वो एक वेश्याका रोल अदा करती हैं। वो अपने दलालको कहती है, "तुझे अगर पैसे मिलते तो तू तो अपनी अम्मीकोभी बेच देता!"। बस!! आपके किताबके बारेमें जब मैंने रिपोर्ट पढे तो मुझे यह संभाषण याद आया। आज अपने देशमें लोकतंत्र है इसलिये हम कुछभी कह सकते हैं, कुछभी बोल सकते हैं और कुछभी लिख सकते हैं। इसलिये चंद चार पैसोंके कोईभी कुछभी लिखें तो उसको कौन रोक सकता है? मगर क्या ऐसा करना अपनीही मातृभूमीको बेचना नहीं है? ऐसा करना कानूनन ठीक होभी सकता है, मगर क्या ये उचित है? कोईभी देशभक्त आदमीने ऐस नहीं करना चाहिये। सिर्फ इसलिये कि हमें भाषणस्वतंत्रता मिली है इसलिये अपने खुदके देशके हितके खिलाफ इस तरहसे बिल्कुल नहीं लिखना चाहिये। ये अनुचित काम आपके हाथसे हो गया है इसलिये हम आपका निषेध करते हैं। हम राजकारणी नहीं हैं। हम एक नौकरी करनेवाले मामुली इंजिनियर हैं। मगर हमें आपका ये कृत्य बहुत दुख दे गया। आपने जो लिख्खाहै वो सहीभी हो सकता है। सही है कि नहीं इसका फैसला तज्ञ लोग करेंगे। मगर देशभक्ती और् देशद्रोहके बीचका फरक मैं समझ सकता हूँ! आप तो राजकीय नेता हैं। आपके गाडीके चारों चक्के जमीनको स्पर्श करते हैं। तो इस तरहसे धर्मराज बननेकी क्या जरूरत थि? इसलिये हम आपके कृत्यका निषेध करते हैं। ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by सुधीर काळे

मस्त! सुधीरराव!! आपल्याला आवडली तुमची प्रतिक्रिया!!! सांगा नंदनराव, आणि मिभोराव!! सांगा आता!!! यावर काय म्हणणं आहे तुमचं!!! लावा आता तुमच्या त्या लाडक्या अ‍ॅक्सेलरॉडला लिफाफ्यांना थुंकी लावायला!!!! तिच्यायला, जीभ कोरडी पडेल त्याची!!!! :)

In reply to by पिवळा डांबिस

खरंय काका.
उन्होंनेभी पैसेके लियेही अपनी माँको (अमरीकाको) बेच डाला। उनको जेलसे फोटो भेजनेवालेभी ऐसेही गद्दार थे।
- हे वाक्य वाचून भडभडून आलं. कुणी पैशापाठी धावणारा आयटी प्रोफेश्नल म्हणेल याची पर्वा न करता गदगदलो. (अंमळ हळवा)

नंदन
मराठी साहित्यविषयक अनुदिनी


In reply to by नंदन

गदगदण्याची परिसीमा झाली... कोरडा पडलो... हिरव्या नोटांनी जरावेळ वारा घेतला.. आता बरे वाटते आहे... आता पैशामागे धावून येतो जरा... (पैधाआप्रो) -- मिसळभोक्ता

In reply to by पिवळा डांबिस

काळेकाकांना "अनावृत्त पत्रलेखकशिरोमणी" असा पुरस्कार देण्यात यावा, अशी मी आग्रहाची विनंती करतो. (पत्र अनावृत्त, लेखकाविषयी कल्पना नाही.) -- मिसळभोक्ता

अहो काळे साहेब म्हणुन तर मी या लोकांना " भंजाळलेल्या जनांचा पक्ष ' किंवा "भरकटलेल्या जनांचा पक्ष "म्हणावा म्हणुन गोंधळलो आहे.

In reply to by हरकाम्या

यथार्थ वर्णन. अडवाणींनाही घरी बसवावे व नरेंद्र मोदी किंवा सुषमा स्वराज्य यांच्याभोवती नवीन भाजप उभारावा! सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

नरेंद्र मोदी किंवा सुषमा स्वराज्य यांच्याभोवती नवीन भाजप उभारावा! सुधीर साहेब तुम्ही ही तुमचे नाव सुधींद्र असे एक्स्टेन्ड कराच आता. नरेंद्र मोदी किंवा सुषमा स्वराज यांचा आक्रस्तळेपणा कदाचित भाजप ला निवडणूकीत तारून नेईल असे वाटते का? ज्या संजय गांधीना टोकाचा विरोध केला त्यांच्याच मुलाला भाजपने तशाच आयडीयॉलॉजीसाठी प्रातःस्मरणीय ठरवले यावरून त्यांची वैचारीक दिवाळखोरी लक्षात येतेच की. नमो किंवा सुषमा बाई फार वेगळे असे काय करणार आहेत पास हा शब्द जर इंग्रजी असेल तर नापास हा शब्द कोणत्या भाषेतला आहे

विकास, दिलेल्या दुव्यांबद्दल धन्यवाद.
The first thing that strikes me is that it would be difficult to find two persons who would rival them for their colossal egotism, to whom personal ascendancy is everything and the cause of the country a mere counter on the table. They have made Indian politics a matter of personal feud
आंबेडकर आणि गांधी ह्यांत १९३२ पासुन मतभेद होते.गांधींच्या हरिजन शब्दाला आंबेडकरांचा आक्षेप होता असे वाचले होते.दलितंसाठी वेगळे मतदारसंघ असण्याला गांधींचा विरोध होता.तेव्हा आंबेडकरांच्या वरील भाषणाबद्दल आश्चर्य वाटण्यासारखे काही नाही.असो. १९२० पर्यंतच्या जीनांना मोठेपण देवून ईतर भारतिय नेत्यांना खलनायक ठरवायचा जसवंतसिंग ह्यांचा उघड प्रयत्न आहे.१९४६ साली जीना ह्यानी "We will either have a divided India or a destroyed India'' हे विचार सिंग ह्याना माहित असतीलच. १९४६ सालीच जीनांच्या मुस्लिम लीगने 'Direct Action Day' जाहीर केला.कलकत्यात ६००० स्त्रिया,पुरुष्,मुलांची हत्या करण्यात आली.बंगालमध्ये मुस्लिम लीग सत्तेवर असल्याने हुसेन सुरावर्दी ह्यांनी दंगल होत असताना संपुर्ण दुर्लक्ष केले्. जीना ह्यांचा हा डागाळलेला ईतिहास जसवंत सिंग्,सुदर्शन्,अडवाणी ह्यांना माहित नाही असे कोण म्हणेल? भेन्डि क्ष्^न + य्^न = झ्^न

In reply to by चिरोटा

त्या (आंबेडकरांच्या) दुव्याचे कारण इतकेच होते की गांधींवर टिका केली म्हणून संघावर एक टिका होते. वास्तवीक तसे होण्याचे काहीच कारण नसावे. म्हणून संघाशी संबंधीत नाही पण कर्तुत्ववान आणि स्वातंत्र्यचळवळीतील म्हणून आंबेडकरांचा संदर्भ दिला. योगायोगाने तो देताना त्यात त्यांनी त्यांची तुलना जीनांशी केली होती म्हणून तो अधिकच भावला आणि द्यावासा वाटला. (केवळ नावे ठेवली म्हणून टाळ्या पिटायला भावला नाही!). आता मधला भाग थोडा अधिक अवांतर होणार आहे पण तो महत्वाचा वाटतो म्हणून येथे लिहीत आहे. आंबेडकर आणि गांधी ह्यांत १९३२ पासुन मतभेद होते.गांधींच्या हरिजन शब्दाला आंबेडकरांचा आक्षेप होता असे वाचले होते.दलितंसाठी वेगळे मतदारसंघ असण्याला गांधींचा विरोध होता.तेव्हा आंबेडकरांच्या वरील भाषणाबद्दल आश्चर्य वाटण्यासारखे काही नाही.असो. हे विधान फारतर अर्धसत्य आहे. आंबेडकर असले सवंग नव्हते की केवळ स्वतःला हवे तसेच झाले नाही म्हणून त्यांनी टिका केली असती. या भाषणाच्या प्रकाशनात त्यांनी स्पष्ट म्हणले आहे की, "If I am against them, it is because I want a settlement. I want a settlement of some sort, and I am not prepared to wait for an ideal settlement. Nor can I tolerate [for] anyone on whose will and consent settlement depends, to stand on [his] dignity and play the Grand Moghul" मात्र त्याच आंबेडकरांवर या भाषणाच्या बाबतीत (त्यांच्या शब्दात) जी काँग्रेसप्रेस ने टिका केली त्याला आणि एकंदरीत या भाषणाची प्रस्तावना सांगताना म्हणाले आहेत ते आपण सगळ्यांनी सगळ्यावेळीच लक्षात ठेवण्यासारखे आहे: However strong and however filthy be the abuses which the Congress Press chooses to shower on me, I must do my duty. I am no worshipper of idols. I believe in breaking them. I insist that if I hate Mr. Gandhi and Mr. Jinnah—I dislike them, I do not hate them—it is because I love India more. That is the true faith of a nationalist. I have hopes that my countrymen will some day learn that the country is greater than the men, that the worship of Mr. Gandhi or Mr. Jinnah and service to India are two very different things and may even be contradictory of each other. आता परत मूळ मुद्यांसंदर्भातः १९२० पर्यंतच्या जीनांना मोठेपण देवून ईतर भारतिय नेत्यांना खलनायक ठरवायचा जसवंतसिंग ह्यांचा उघड प्रयत्न आहे. मी काही जीनांची भलावण करत नाही हे माझ्या आधीच्या प्रतिसादांवरून समजेल. जसवंतसिंग ह्यांनी हे पुस्तक लिहीताना का लिहीले, त्याच्या प्रकाशनासाठी निवडलेली वेळ वगैरे याचा विचार करता लक्षात येते की ते पुस्तक इतिहास म्हणून लिहीण्याऐवजी राजकारण म्हणून लिहीले आहे. जीना ह्यांचा हा डागाळलेला ईतिहास जसवंत सिंग्,सुदर्शन्,अडवाणी ह्यांना माहित नाही असे कोण म्हणेल? मला वाटते अडवाणी आणि सुदर्शनजींनी काही त्यांची भलावण केली असे वाटत नाही. अडवाणींचे भाषण आधी देऊन झाले आहेच आणि त्यासंदर्भात मला काय वाटते ते सुद्धा...

In reply to by चिरोटा

१९४६ साली जीना ह्यानी "We will either have a divided India or a destroyed India'' हे विचार सिंग ह्याना माहित असतीलच.
माझे भाजपविषयीचे मत २००१ पासूनच वाईट होत होते.२००५ मध्ये अडवाणींनी जीनांवर स्तुतीसुमने उधळल्यानंतर ते कायमचे वाईट झाले आणि त्यानंतर मी उद्विग्नतेतून माझ्या अनुदिनीवर दोन लेख लिहिले होते. त्याकाळी गुगलची अनुदिनी मला माहित नव्हती.म्हणून ते इतरत्र लिहिले होते.पण नंतरच्या काळात तेच माझ्या गुगलवरील अनुदिनीवर उतरवून घेतले. त्या दोन लेखांचे दुवे पुढीलप्रमाणे पहिला लेख दुसरा लेख सध्या कार्यबाहुल्यामुळे मिपावर येणे अजिबात होत नाही. खरा तर माझा हा जिव्हाळ्याचा विषय आहे आणि त्यावर अधिक लिखाण करणे मला आवडले असते. पण काय करणार. असो --------- विल्यम जेफरसन क्लिंटन वसतीगृह क्रमांक १९ खोली क्रमांक ८ भारतीय प्रबंधन संस्थान वस्त्रापूर अहमदाबाद-३८००१५ गुजरात ---------

In reply to by क्लिंटन

ब्रावो, गिरिश. मला वाटते कीं खोटे-खोटे निधर्मी (pseudo-secular) हा शब्द जिन्नासाहेबांच्याकडे पहात-पहात टांकसाळीत करायला टाकला असावा (coin झाला असावा). दोन्ही लेख आवडले. लिहीत जा. सुधीर काळे ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

हं! एखाद्याने केलं आपलं फाळणीवरील/भोवतीचं /जीनांवरील पुस्तक पाकिस्तानात प्रकाशित केले तर नक्की चुक काय आहे असे चर्चाप्रस्तावकाला/प्रकाशनाच्या विरोधकांना वाटते? भारतीय जनतादेखील जर पुस्तक प्रकाशनावर इतका बिनबुडाचा/मुद्दे न मांडता गजहब करू लागली तर पाकिस्तानी जनतेत आणि भारतीयांच्यात फरक तो काय? शिवाय प्रकाशनाचा २६/११शी संबंधही कळला नाहि. असो. ऋषिकेश ------------------ दूपारचे ४ वाजले आहेत. चला आता ऐकूया एक सुमधूर गीत "अजिंक्य भारत अजिंक्य जनता...."

In reply to by ऋषिकेश

असेच म्हणतो , आणि जसे मनमोहन सिंग म्हणाले आहेत , आपण आपले शेजारी बदलू शकत नाही.एखाद्याने पुस्तक पाकिस्तानात प्रकाशित करावे असे म्हटले , तर ह्यात मला काही आक्षेपार्ह वाटत नाही . अवांतर : जसवंत सिंग यांनी फक्त जीनांचा उदो उदो केलेला नाही. त्यांच्या शब्दात सांगायच तर , "I was attracted by Personality ,Charater of man , and his determination ,but his politics after 1940 was abhorrent"

In reply to by ऋषिकेश

ऋषिकेश-जी, जसवंतसिंगांनी हे पुस्तक लिहिले ते बरोबर की चूक यबद्दल आपली मते भिन्न असतील (आहेतच),पण २६/११ च्या जखमा अजूनही ओल्या असताना त्या पुस्तकाच्या 'प्रोमो'साठी पाकिस्तानात जाणे याबद्दलही आपल्याला कांहीं वाटत नसेल तर मग बोलणंच खुंटलं! ज्या पक्षात परवा-परवापर्यंत जसवंतसिंग होते त्या पक्षानेच मनमोहन सिंग यांनी "इतर विषयांवर पाकिस्तानशी चर्चा करायला संमती दिली" या मुद्द्यावरून लोकसभेत गदारोळ माजवला तेच जसवंतसिंग आज चार पैसे जास्त मिळतील ("चंद चार टुकडोंके लिये" हे हिंदीतील वाक्य जास्त छान वाटते) या आशेने पाकिस्तानात चाललेत याचे कांहींच वैषम्य वाटत नाहीं आपल्याला? हर!हर!! सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by सुधीर काळे

२६/११ च्या जखमा अजूनही ओल्या असताना त्या पुस्तकाच्या 'प्रोमो'साठी पाकिस्तानात जाणे ..
ह्या बाबतीत शिवसेनेची पाकिस्तानशी सर्वप्रकारचे संबंध तोडुन टाकण्याची भूमिका योग्य वाटते.गेले २० वर्षे आपण सारखे बघतोय- एकीकडे 'काश्मीर प्रश्न चर्चेनेच सुटेल असे म्हणायचे' ,दोन्ही बाजुंच्या राजकारण्यांनी हसत हसत एकमेकांशी हास्तांदोलन करतानाचे फोटो बघायचे.मग बाँबस्फोट झाल्यावर ईशारे देत बसायचे. भेन्डि क्ष्^न + य्^न = झ्^न

In reply to by चिरोटा

ब्राव्हो, भेंडी बाजार! माझ्याहून जास्त चांगल्या प्रकारे माझ्या भावना व्यक्त झाल्या आपल्या पोस्टमध्ये! सुधीर तुमच्या टोपणनावातली र्‍हस्व "डि" जरा खुपते बुवा (भेंडि)! ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by चिरोटा

ह्या बाबतीत शिवसेनेची पाकिस्तानशी सर्वप्रकारचे संबंध तोडुन टाकण्याची भूमिका योग्य वाटते. व्वा!!!!!! भेन्डी बाजार... व्वा!!!!!!!!!!!!!!! आता भेन्डीबाजार नाव बदलुन.. दादर, लालबाग असे ठेवायला हरकत नाही.. मा. शिवसेनाप्रमुखांनी हि भुमिका मांडली तेव्हा सर्वधर्म-समभाव वाल्यांचा जळफळाट झाला होता.. म्हणे शिवसेना राजकारण करतेय.. वैगरे वैगरे.. असो. एक मात्र खर भाजपवाल्यांच 'जीना' हराम होत चाललय...

In reply to by सुधीर काळे

सुधीर भाऊ, मला मुळीच वैषम्य वाटत नाही. आता जसवंत सिंग तर पक्षातही नाहीत,ते केवळ लेखक म्हणून जातील .एका राजकीय पक्षाचे पुढारी म्हणून नाही. आणि न जाऊन तरी काय होणार ? पुस्तक तर लिहिले आहे , ते प्रकाशितही होणार .त्यांच्या जाण्याने फरक कसा काय पडतो? आणि काय पूर्ण संवाद बंद करावा असं तुमचं मत आहे का?

In reply to by सुधीर काळे

एखाद्या लेखकाने आपले पुस्तक विविध देशांत प्रकाशित करणे यांत चूक ते काय. २६/११ मधील हल्ला, हानी वगैरे निंदनीय आहेच. त्याबद्दल गुन्हेगारांना शिक्षा झालीच पाहिजे. मात्र (सध्या) भारताची अधिकृत भूमिका पाकिस्तानशी संवाद साधण्याची आहे. तसेच गुन्ह्याचा पाठपुरावा देखील समांतरपणे चालु आहे. संवाद हा फक्त नेतेच करतात असे नाहि तर प्रत्येक नागरीक वेगवेगळ्या रुपात अक्रून भारतीय भूमिकेला पाठबळ देत असेल तर चुकीचे ते काय? जसवंतसिंहांच्या जीनांबद्दलच्या मतांशी मी सहमत आहे किंवा नाहि हा सर्वस्वी वेगळा मुद्दा आहे. मी अगदी असहमत नसेन नव्हे त्यांच्या मतांचा कट्टर/जाज्वल्य वगैरे विरोधक असेन पण म्हणून ते पुस्तक त्यांनी पाकिस्तानात प्रकाशित करू नये असे का वाटावे हे कळले नाहि. माझ्या विरोधी मते आहेत म्हणून त्यांना वर येऊच द्यायचे नाहि, व्यक्तच होऊ द्यायचे नाहि, पकाशात येऊ द्यायचे नाहि हा अट्टाहास का? आता हे पुस्तक वाचावे की वाचु नये हा निर्णय जनतेच असला तरी ते प्रकाशित करावे की करू नये हा निर्णय लेखक व प्रकाशकाच्या अखत्यारित येतो व त्या स्वातंत्र्यावर अश्या 'झुंडशाहिने' रोख बसु नये इतकीच इच्छा. बाकी, जसवंतसिंगांनी हे पुस्तक लिहिले हेच मुळात बरोबर की चूक ही चर्चा वांझोटी वाटाते कारणे त्यांनी ते लिहिले आहे हे सत्य आहे त्यात चुक बरोबर ते काय असायचे? (स्पष्ट)ऋषिकेश

In reply to by ऋषिकेश

मला जे कळले त्यावरून हे पुस्तक पाकिस्तान्यांनी लिहायला हवे होते ते इंडियन लीडरने लिहिले त्याचा राग सुधिरभाऊंना आलेला वाटतो. ते. रा.

In reply to by तेन्नालीराम

प्रश्न राग येण्याचा नाहि. त्यांना राग येऊच शकतो आणि तो ते प्रकटही करू शकतात. मुद्दे मांडू शकतात. मात्र त्यांच्या विरोधी मते आहेत / किंवा त्यांना(अथवा अगदी बहुसंख्यांना) राग येणारी मते आहेत म्हणून पुस्तकच प्रकाशित करू नये अशी दडपशाहिची भाषा मला भारतासारख्या प्रगतीशील देशांत घडणे चुकीचे वाटते (दडपा)ऋषिकेश

In reply to by ऋषिकेश

ऋषिकेश-जी, प्रश्न माझ्याशी सहमती किंवा असहमतीचा नाहींच आहे. उदा. मी शिवसेनेवर लेख लिहिला त्यातही कांहीं लोक माझ्याशी सहमत होते तर कांहीं नव्हते. त्यावेळी मी असा पवित्रा घेतला नाहीं. पण माझी हरकत त्या पुस्तकात लिहिलेल्या मुद्द्यांबद्दल नसून आपणच आपल्या देशाला बदनाम करावे कीं नाहीं याबद्दल आहे. तेन्नालीराम यांना हा मुद्दा बरोबर कळलेला दिसतो. हे पुस्तक लिहिण्याची प्राथमिक जबाबदारी एकाद्या पाकिस्तानी लेखकाची आहे, आपली नाहीं. पण जाऊ द्या. हा मुद्दा एकतर समजतो नाहींतर समजत नाहीं. त्यामुळे मी या मुद्द्यावर बोलायचे थांबलो आहे. आता जसवंतसिंग काय उत्तर देतात ते बघू या. कारण प्रत्येक पत्राला ३ दिवसात उत्तर द्यायचा वायदा आहे त्यांचा. सुधीर काळे ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by सुधीर काळे

जसवंत सिंग यांच्या या (मी न वाचलेल्या) पुस्तकामुळे बदनाम होण्याएवढा माझा देश हलका नाही. अदिती

In reply to by ३_१४ विक्षिप्त अदिती

अगदी बरोबर. मेरा भारत महान! पण आपण भारत किती हलका आहे याबद्दल बोलत नसून जसवंतसिंगांच्या जडपणा वा हलकेपणाबाबत बोलत आहोत. सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by सुधीर काळे

एका जसवंत सिंगांच्या हलक्या(?) मनोवृत्ती, लिखाणामुळे भारत देश कसा काय बदनाम होतो ब्वॉ? प्रश्नचिह्न एवढ्यासाठीच की मी ते पुस्तक वाचलेलं नाही. अदिती

In reply to by ३_१४ विक्षिप्त अदिती

बाहेरच्या माणसाने लिहिले तर इतकी बदनामी होत नाहीं, पण घरभेद्याने असे केलेले झोंबते कारण आपल्याकडे उत्तर नसते. पण भारताची बदनामी असू दे एका बाजूला, बदनामी करणार्‍याचा निषेध तर केला पाहिजेच. सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by सुधीर काळे

व्यक्तीशः मला ही माझ्या देशाची बदनामी वाटत नाही. कोणीही येऊन काहीही बरळून गेला तर त्यात बरळणार्‍याचा अपमान होतो असं माझं मत आहे ... त्यामुळे निषेध कसला करायचा? कोणालाही काय उगाच महत्त्व द्यायचं? उद्या सत्ताधार्‍यांनी, देशाची अधिकृत भूमिका म्हणून असं काही(?) लिहीलं, जाहीर केलं तर मात्र निषेधाच्याही पुढे काही करायला लागेल. अदिती

In reply to by ३_१४ विक्षिप्त अदिती

अदिती, उद्या सत्ताधार्‍यांनी, देशाची अधिकृत भूमिका म्हणून असं काही(?) लिहीलं, जाहीर केलं तर मात्र निषेधाच्याही पुढे काही करायला लागेल.>> जसवंतसिंग हे आज जरी विरोधी प़क्षात बसत असले तरी ते एकेकाळी 'सरकार'च होते. म्हणून तर ते काय बरळतात त्याकडे लक्ष द्यायलाच हवं. भूदलातले भूतपूर्व अधिकारी (ex-Army officer), भूतपूर्व संरक्षणमंत्री, भूतपूर्व वित्तमंत्री व भूतपूर्व परराष्ट्रमंत्री अशी उच्च पदे भूषविलेले जसवंतसिंग सरकारपेक्षा कमी नाहींत. फक्त गृहमंत्री व प्रधानमंत्री व्हायचे राहिले होते! आज गादीवर नाहींत म्हणून ते बोलतात ते अधिकृत जरी नसले तरी ते उद्या सरकारात जाऊ शकतात (सुदैवाने या पुस्तकामुळे ती शक्यता जरी खूप कमी झाली असली तरी) व मग आपली "उरली-सुरली"ही निघेल असं नाहीं का वाटत तुला? सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by सुधीर काळे

हा मुद्दा एकतर समजतो नाहींतर समजत नाहीं.
तेच तर तुमचा मुद्दा मला समजावा म्हणून तर "अधिक स्पष्टीकरण" ह्या प्रतिक्रीयेत मी काहि प्रश्न विचारले होते. त्याची उत्तरे द्यायची सोडून तुम्हीच चर्चेतून पळ काढताय. मागे देखील नंदन वगैरें मिपाकरांनी काहि प्रश्न विचारले होते तेहा तुम्ही टँजंटमधे गेला होतात. :( मी इथेच आहे.. वाटले तर उत्तर द्यालच ऋषिकेश ------------------ काहिहि कळत नसल्याने रेडीयोचा आवाज बंद आहे

In reply to by ऋषिकेश

तेच-तेच किती वेळा लिहिणार? ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by ऋषिकेश

भूदलातले भूतपूर्व अधिकारी (ex-Army officer), भूतपूर्व संरक्षणमंत्री, भूतपूर्व वित्तमंत्री व भूतपूर्व परराष्ट्रमंत्री अशी उच्च पदे भूषविलेले जसवंतसिंग सरकारपेक्षा कमी नाहींत. फक्त गृहमंत्री व प्रधानमंत्री व्हायचे राहिले होते!
असंच असेल तर देशात किती सरकारं, सत्तास्थानं आहेत हे तरी सांगा एकदा ... अदिती

In reply to by ३_१४ विक्षिप्त अदिती

सध्या ते सरकारात नाहींत, पण होते तेंव्हा heavyweight category त मोडत. आणि हे पुस्तक लिहिल्यामुळे तर बहुतेक ते मोडीतच जातील. जसवंतसिंगांचे उत्तर आल्यास त्याबद्दल पोस्ट करीन. एरवी इथेच पूर्णविराम. "शेवटचं वाक्य माझंच" असा माझा हट्टही नाहीं. सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

In reply to by ऋषिकेश

पुस्तक विविध देशांत प्रकाशित करणे यांत चूक ते काय>> पाकिस्तानात प्रकाशित करण्याबाबत दुमत नसून तिथे "प्रोमो"साठी जाण्याबाबतीत आहे. या पुस्तकाची अधिकृत आवृत्ती पाकिस्तानात खपणारच व जसवंतसिंगांना पैसे मिळणारच, त्याबद्दल आपण काय करणार? भारतात फक्त अनधिकृत प्रतीच खपू देत अशी माझी देवाकडे प्रार्थना आहे. पण खरं सांगू कां? मला असे वाटते कीं जसवंतसिंगांना उपरती होऊन त्यांचे मानधन त्यांनी पंतप्रधान रिलीफ फंडाला अर्पण करून पापक्षालन करावे. माझ्या विरोधी मते आहेत म्हणून >> पुन्हा एकदा सांगतो कीं मतभेद त्या पुस्तकात लिहिलेले खरे आहे की नाही याबाबत नसून आपण आपल्या शत्रूचे उदात्तीकरण करणे बरोबर आहे का हा आहे. ही चर्चा वांझोटी वाटाते कारणे त्यांनी ते लिहिले आहे >> मला तसे नाहीं वाटत. fait accompliचा मुद्दा बरोबर आहे, पण यापुढे असली पुस्तके लिहिणार्‍यांना धडा शिकविण्यासाठी अशा चर्चेची जरूरी आहे. झुंडशाही म्हणजे जसवंतसिंगाच्यावर हल्ला करणे. या वादाला झुंडशाही का म्हणता आपण? ही झुंडशाही नसून मतप्रदर्शन आहे हे विसरू नये. सुधीर ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

मला वाटत भा. ज. प. ने या सर्व प्रकरणात .. एका दगडात दोन (किंवा अनेक ) पक्षी ..की काय म्हणतात ना ती किमया साधली आहे. तुम्ही निषेध करा किंवा समर्थन करा ... त्यांचा फायदाच आहे. जसवंत सिंगावर जर पक्षा क्डून कारवाई झाली नसती तर त्यांचे पुस्तक कोणाच्या लक्षातही आले नसते ... त्यात त्यांनी काय लिहिले हे कळणे तर लांबची गोष्ट. सध्या भा ज प कडे काँग्रेस च्या विरुद्ध कुठलाही प्रभावी मुद्दा नाही. नेहरु आणि पटेलांचे आधी समर्थन केलेले त्या मुळे विरोध करता येत नाही ... मग हे त्यांना साधले सिंग यांच्या पुस्तकामुळे ... लोकांना हे कळले कि कॉग्रेस चे नेते नेहरु , पटेल यांच्या बद्दल अशीही काही मत आहेत.. जे सुजाण आहेत ते जास्त जाणून घेण्याचा प्रयत्न करतील ... पण असे लोक अल्पसंख्य असतात. त्यातही पटेलांच्या गुजराथ मधे पुस्तकावर बंदी ... मग तर उत्सुकता अजून वाढणार .. खेळी अचूक आणि योग्य वेळी झाली आहे . फक्त सिंग यांनी पाकीस्तानात जाउ नये ....

In reply to by मनीषा

मनिषा-जी, हा आपला नवा दृष्टिकोन भावला. पण तो बहुधा खरा नाहीं. कारण भाजपचे नेते ही घटना आपल्यावरच बूमरॅंगसारखी उलटून येईल हे न समजण्याइतके मूर्ख असतील असे वाटत नाहीं. सुधीर काळे ------------------------ छत्रपती शिवाजी आंतरराष्ट्रीय विमानतळावर मराठी भाषेतील फलक लागलेच पाहिजेत.

चांगली चर्चा चाललीये. अमरीकी सेनाने अल-घारिब जेलमें कैदियोंपर कुछ अत्याचार किये, मगर उसे दुनियाके सामने लानेवाले अमरीकी वार्ताहरही थे। उन्होंनेभी पैसेके लियेही अपनी माँको (अमरीकाको) बेच डाला। उनको जेलसे फोटो भेजनेवालेभी ऐसेही गद्दार थे। यात काहीतरी गफलत होतेय असे वाटते. पत्रकारांनी आपले कर्तव्य पार पाडले. यात त्यांनी काही चूक केली असे वाटत नाही. 'देश की इज्जत' पेक्षा गुन्हा उघडकीस येणे जास्त महत्वाचे आहे. "Great Power Comes With Great Responsibilities"